कमरे के तापमान पर भी अमोनिया गैस का पता लगाएगा नया भारतीय सेंसर, दुर्घटनाओं से बचाने में होगा मददगार
Heterostructuring via oxidative transformation of transition metal dichalcogenides unveils new horizons for improving key sensor performance parameters, including sensitivity, selectivity, and stability, by leveraging the synergistic interplay of charge carrier dynamics and surface interactions at the interfaces.

-ज्योति रावत –
भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसा अत्याधुनिक गैस सेंसर विकसित किया है, जो कमरे के सामान्य तापमान पर ही हवा में मौजूद अमोनिया गैस की बेहद मामूली मात्रा का भी पता लगा सकता है। यह तकनीक उद्योगों, प्रयोगशालाओं, कोल्ड स्टोरेज, कृषि क्षेत्रों और अन्य स्थानों पर होने वाले अमोनिया रिसाव की समय रहते पहचान कर लोगों की जान बचाने और दुर्घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
अमोनिया का उपयोग उर्वरक निर्माण, रासायनिक उद्योग, कोल्ड स्टोरेज और कृषि सहित कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। लेकिन इसकी थोड़ी-सी अधिक मात्रा भी आंखों, त्वचा और श्वसन तंत्र के लिए बेहद नुकसानदायक हो सकती है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। ऐसे में अमोनिया की लगातार निगरानी करना बेहद जरूरी है।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (सीईएनएस), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने एक नई पीढ़ी का अत्यधिक संवेदनशील गैस सेंसर तैयार किया है।

बेहद कम मात्रा में भी पहचानने की क्षमता
यह सेंसर हवा में मौजूद अमोनिया की 319 पार्ट्स प्रति बिलियन (पीपीबी) जैसी अत्यंत कम सांद्रता का भी पता लगाने में सक्षम है। यह स्तर कार्यस्थलों के लिए निर्धारित सुरक्षा सीमा से भी काफी नीचे है। इसका मतलब है कि गैस के खतरनाक स्तर तक पहुंचने से पहले ही चेतावनी मिल सकती है।
सेंसर की एक और बड़ी खासियत यह है कि यह केवल अमोनिया पर ही प्रतिक्रिया देता है। अन्य सामान्य गैसों की मौजूदगी में भी इसकी सटीकता प्रभावित नहीं होती। लगातार उपयोग और 10 सप्ताह से अधिक समय तक परीक्षण के दौरान भी इसका प्रदर्शन स्थिर और भरोसेमंद पाया गया।
बिना गर्म किए करेगा काम
अधिकांश पारंपरिक गैस सेंसरों को काम करने के लिए अधिक तापमान या अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जबकि यह नया सेंसर कमरे के सामान्य तापमान पर ही प्रभावी ढंग से काम करता है। इससे बिजली की खपत कम होगी और इसे कहीं भी आसानी से लगाया जा सकेगा।
खतरा होने पर तुरंत देगा चेतावनी
शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक पोर्टेबल चेतावनी प्रणाली के रूप में भी विकसित किया है।
यदि अमोनिया की मात्रा तय सुरक्षा सीमा से अधिक हो जाती है तो यह उपकरण तुरंत अलर्ट जारी करता है। साथ ही यह वातावरण को सुरक्षित (Safe), चेतावनी (Warning) और खतरे (Danger) जैसी श्रेणियों में स्वतः वर्गीकृत कर देता है, जिससे बिना किसी तकनीकी जानकारी के भी व्यक्ति स्थिति को आसानी से समझ सकता है।
बिना बिजली के भी करेगा काम
वैज्ञानिकों ने इस सेंसर को एक विशेष पीजोइलेक्ट्रिक नैनोजेनरेटर से भी जोड़ा है। यह तकनीक चलते-फिरते या शरीर की सामान्य गतिविधियों से उत्पन्न यांत्रिक ऊर्जा को बिजली में बदल देती है। यानी यह उपकरण बिना बाहरी बिजली स्रोत के भी अमोनिया गैस का पता लगा सकता है।
यह सुविधा दूर-दराज़ और सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में पर्यावरण निगरानी के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।
स्मार्ट बैंड और कपड़ों में भी लगाया जा सकेगा
वैज्ञानिकों ने इस सेंसर के लचीले और पहनने योग्य संस्करण भी तैयार किए हैं। इन्हें पॉलिमर, कागज और कपड़े जैसे लचीले पदार्थों पर लगाया गया है। मोड़ने, झुकाने या तह करने के बाद भी इनकी कार्यक्षमता बनी रहती है।
इसी तकनीक के आधार पर स्मार्ट बैंड, स्मार्ट होम अलर्ट सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक कपड़ों (ई-टेक्सटाइल) के प्रोटोटाइप भी विकसित किए गए हैं। भविष्य में इनका उपयोग व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों और स्मार्ट पर्यावरण निगरानी प्रणालियों में किया जा सकेगा।
इस शोध का नेतृत्व प्रोफेसर अंगप्पने सुब्रमणियन ने किया। उनकी टीम में डॉ. विष्णु जी. नाथ, अंकुर वर्मा, अभिजीत पॉल और डॉ. सुभाष चेरुमन्निल करुमुथिल शामिल थे।
यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका एसीएस सेंसर्स (ACS Sensors) में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में गैस रिसाव की निगरानी को अधिक सुरक्षित, सस्ता, ऊर्जा-कुशल और आम लोगों के लिए उपयोगी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।
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प्रकाशन लिंक: https://doi.org/10.1021/acssensors.5c02600

