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अरंडी के तेल से बना अधिक प्रभावी और पर्यावरण-अनुकूल लुब्रिकेंट विकसित, घर्षण में 42 प्रतिशत तक कमी

चित्र : (ए) अरंडी के तेल में बोरोफेन के स्थिर फैलाव का इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप चित्र। (बी) बोरोफेन के साथ घर्षण गुणांक में कमी दर्शाने वाला आरेख। (सी) लुब्रिकेशन के बाद सतह के खुरदरेपन में कमी दर्शाने वाली संपर्क सतहों का इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप चित्र।

Reducing friction and wear in industrial systems is crucial for enhancing energy efficiency, machinery longevity, and environmental sustainability. For the first time, this study explores borophene, a two-dimensional (2D) nanomaterial, as an additive in castor oil for lubrication applications. Borophene’s electron-deficient surface and unique 2D morphology facilitate strong interactions with castor oil’s ricinoleic acid, promoting stable dispersion without surface functionalization.

By- Jyoti Rawat

वैज्ञानिकों ने पहली बार अरंडी के तेल में बोरोफेन नामक द्वि-आयामी (2डी) नैनो पदार्थ का उपयोग कर एक उच्च-प्रदर्शन वाला और पर्यावरण-अनुकूल लुब्रिकेंट विकसित किया है। यह उपलब्धि टिकाऊ (सस्टेनेबल) लुब्रिकेशन तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। इससे भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, समुद्री उद्योग, हरित विनिर्माण (ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग) और मशीनों की ऊर्जा दक्षता बढ़ाने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है।

उद्योगों में मशीनों के विभिन्न हिस्सों के बीच होने वाला घर्षण (फ्रिक्शन) ऊर्जा की बर्बादी और उपकरणों के जल्दी घिसने या खराब होने का प्रमुख कारण है। इसलिए ऐसे लुब्रिकेंट विकसित करना वैज्ञानिकों की बड़ी चुनौती रही है, जो घर्षण और टूट-फूट दोनों को प्रभावी ढंग से कम कर सकें। अरंडी का तेल पहले से ही एक नवीकरणीय और जैव-अपघटनीय (बायोडिग्रेडेबल) लुब्रिकेंट माना जाता है, लेकिन इसकी कार्यक्षमता को और बेहतर बनाने की आवश्यकता थी।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान, गुवाहाटी स्थित उन्नत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी अध्ययन संस्थान (आईएएसएसटी) के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया कि यदि अरंडी के तेल में केवल 0.1 प्रतिशत बोरोफेन मिलाया जाए, तो उसके लुब्रिकेशन गुणों में उल्लेखनीय सुधार हो जाता है। परीक्षणों में यह पाया गया कि इससे शुद्ध अरंडी के तेल की तुलना में घर्षण लगभग 42 प्रतिशत तक कम हो गया।

यह शोध प्रोफेसर देवाशीष चौधरी के नेतृत्व में किया गया, जबकि इंस्पायर सीनियर रिसर्च फेलो श्री उज्जिबित बरूआ इसके प्रथम लेखक हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तकनीक से ऐसे पर्यावरण-अनुकूल लुब्रिकेंट विकसित किए जा सकते हैं, जो मशीनों की कार्यक्षमता बढ़ाने, उनके पुर्जों की घिसाई कम करने और औद्योगिक इकाइयों में ऊर्जा की खपत घटाने में सहायक होंगे।

प्रोफेसर चौधरी के अनुसार, हाल के वर्षों में द्वि-आयामी (2डी) पदार्थों पर तेजी से शोध हुआ है। इनमें बोरोफेन अपने असाधारण भौतिक और रासायनिक गुणों के कारण विशेष रूप से वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। अब तक इसका उपयोग मुख्य रूप से बैटरियों, सुपरकैपेसिटर, ईंधन सेल और अन्य उन्नत तकनीकों के लिए संभावनाओं के रूप में देखा गया था, लेकिन उच्च-प्रदर्शन वाले लुब्रिकेंट योजक के रूप में इसका प्रयोग पहली बार सफलतापूर्वक किया गया है।

शोध में यह भी पाया गया कि बोरोफेन बिना किसी अतिरिक्त रासायनिक प्रक्रिया के अरंडी के तेल में समान रूप से मिश्रित हो जाता है। मशीन के संचालन के दौरान यह लौह ऑक्साइड, कार्बनयुक्त और बोरोन-आधारित यौगिकों से बनी एक मजबूत सुरक्षात्मक परत (ट्राइबोफिल्म) तैयार करता है। यह परत मशीन के धातु भागों के बीच सीधे संपर्क को कम करती है, भार सहन करने की क्षमता बढ़ाती है और घिसाव को काफी हद तक रोकती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अरंडी के तेल और बोरोफेन का यह संयोजन भविष्य में उच्च-प्रदर्शन वाले जैव-लुब्रिकेंट विकसित करने का आधार बन सकता है। इससे मशीनों की आयु बढ़ेगी, ऊर्जा की बचत होगी और औद्योगिक क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयासों को भी बल मिलेगा।

यह शोध हाल ही में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका एसीएस एप्लाइड इंजीनियरिंग मैटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह उपलब्धि टिकाऊ और हरित लुब्रिकेशन प्रौद्योगिकियों के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

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प्रकाशन लिंक: doi=10.1021/acsaenm.6c00540

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