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ब्रिक्स का नया दौर: दिल्ली से उभरती नई विश्व व्यवस्था की तस्वीर

The 18th BRICS Summit in New Delhi delivered a clear message: the old institutional order is inadequate for a changing world. The New Delhi Declaration prioritised greater representation for developing nations in the UN and multilateral bodies, expanded use of local currencies in trade, improved cross-border payment systems, development finance, AI access and digital public infrastructure. Despite internal differences over Ukraine, West Asia and US-China rivalry, consensus was reached—proof of the group’s growing relevance. Born as an investment acronym in 2001, BRICS has evolved into a platform for multipolarity and Global South voice. It seeks not to replace the West or the dollar overnight, but to enlarge the table where global rules are set.-JSRawat

 

जयसिंह रावत
नई दिल्ली में संपन्न 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद किसी एक प्रस्ताव में नहीं, बल्कि उस सामूहिक घोषणा में छिपा है कि बदलती दुनिया को पुरानी संस्थागत व्यवस्था के सहारे नहीं चलाया जा सकता। 12-13 सितम्बर के सम्मेलन में स्वीकार की गई नई दिल्ली घोषणा ने संयुक्त राष्ट्र और दूसरी बहुपक्षीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व, विकासशील देशों की बड़ी भूमिका, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, नई भुगतान व्यवस्था, विकास वित्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल सार्वजनिक ढांचे जैसे विषयों को ब्रिक्स की भावी दिशा से जोड़ा है।

इस सम्मेलन की खासियत यह भी रही कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संकट, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे सदस्यों के अलग-अलग हित तथा अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के बावजूद साझा घोषणा पर सहमति बन गई। यह आसान नहीं था। ब्रिक्स में निर्णय आम सहमति से होते हैं और विस्तार के बाद देशों की विविधता बहुत बढ़ चुकी है। इसीलिए दिल्ली में सहमति बनना अपने आप में इस समूह की राजनीतिक प्रासंगिकता का संकेत है। लेकिन आम आदमी के लिए सवाल है—आखिर ब्रिक्स है क्या और दुनिया को इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
एक बैंक अधिकारी का शब्द बना विश्व राजनीति की ताकत
ब्रिक्स की कहानी का एक कम जाना-पहचाना पहलू यह है कि इसका जन्म किसी सरकार, क्रांति या अंतरराष्ट्रीय संधि से नहीं हुआ था। 2001 में निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के लिए ‘BRIC’ शब्द गढ़ा था। तब यह मुख्यतः निवेश और आर्थिक संभावनाओं को बताने वाला संक्षिप्त नाम था। शायद किसी ने कल्पना नहीं की थी कि यही चार अक्षर आगे चलकर विश्व राजनीति की स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने वाले मंच का नाम बन जाएंगे।

चार देशों ने इस आर्थिक अवधारणा को राजनीतिक संवाद में बदला और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला औपचारिक शिखर सम्मेलन हुआ। 2011 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने पर BRIC में ‘S’ जुड़ा और वह BRICS बन गया। बाद में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जुड़े तथा 2025 में इंडोनेशिया भी सदस्य बन गया। इस विस्तार ने इसे एशिया, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और लैटिन अमेरिका को जोड़ने वाला व्यापक मंच बना दिया।

इस कहानी की एक और दिलचस्प जड़ 1990 के दशक में मिलती है। रूस के तत्कालीन विदेश मंत्री येवगेनी प्रिमाकोव ने रूस-भारत-चीन के बीच रणनीतिक सहयोग की कल्पना सामने रखी थी। यानी ‘BRIC’ नाम भले ही वित्तीय दुनिया से आया, लेकिन बहुध्रुवीय विश्व की राजनीतिक सोच उससे पहले आकार लेने लगी थी।

जब दिल्ली में रखी गई अपने बैंक की नींव
भारत के लिए ब्रिक्स का इतिहास विशेष महत्व रखता है। 2012 के दिल्ली सम्मेलन में विकासशील देशों की बुनियादी ढांचा जरूरतों के लिए एक अलग विकास बैंक बनाने की संभावना पर विचार आगे बढ़ा। दो वर्ष बाद 2014 के फोर्टालेजा सम्मेलन में न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) की स्थापना का समझौता हुआ। इसकी अधिकृत पूंजी 100 अरब डॉलर रखी गई और साथ ही 100 अरब डॉलर की आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था बनाई गई, ताकि वित्तीय संकट के समय सदस्य देशों को सहारा मिल सके।

यह ब्रिक्स का पहला बड़ा संकेत था कि समूह केवल घोषणाएं नहीं करना चाहता, बल्कि मौजूदा वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के समानांतर अपने साधन भी विकसित करना चाहता है। एनडीबी अब तक लगभग 43 अरब डॉलर की परियोजनाओं को मंजूरी दे चुका है। सड़क, परिवहन, जल, स्वच्छ ऊर्जा और टिकाऊ विकास जैसे क्षेत्रों में इसकी भूमिका बढ़ी है।

यही वह जगह है जहां ब्रिक्स की कहानी आम नागरिक से जुड़ती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल राष्ट्राध्यक्षों की बैठकों का नाम नहीं है। किसी देश को सड़क, बिजली, रेल, पानी या हरित ऊर्जा परियोजना के लिए किस ब्याज पर पैसा मिलेगा; उसका व्यापार किस मुद्रा में होगा; विदेश भुगतान कितनी आसानी से होगा—इनका असर अंततः रोजगार, महंगाई और विकास पर पड़ता है।
ब्रिक्स डॉलर को हटाना चाहता है?
ब्रिक्स के बारे में सबसे अधिक चर्चा ‘डॉलर के विकल्प’ को लेकर होती है, लेकिन वास्तविकता कुछ अधिक व्यावहारिक है। दिल्ली सम्मेलन ने किसी साझा ‘ब्रिक्स मुद्रा’ की घोषणा नहीं की। इसके बजाय सदस्य देशों की अपनी मुद्राओं में व्यापार और निवेश के भुगतान को बढ़ाने तथा उनकी भुगतान प्रणालियों को आपस में अधिक सुगम तरीके से जोड़ने पर जोर दिया गया। ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स इसी दिशा में काम कर रही है।

इसे डॉलर को रातोंरात हटाने की योजना मानना अतिशयोक्ति होगी। असली प्रयास यह है कि यदि भारत और ब्राजील, चीन और रूस या अन्य सदस्य आपस में व्यापार करें तो हर सौदे को अनिवार्य रूप से अमेरिकी डॉलर और पश्चिमी बैंकिंग व्यवस्था से होकर न गुजरना पड़े। यही छोटा-सा तकनीकी परिवर्तन भविष्य में बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव बन सकता है।
ब्रिक्स पश्चिम-विरोधी है या व्यवस्था-सुधारक?
यहीं ब्रिक्स को समझने की सबसे बड़ी भूल होती है। रूस और चीन इसे अमेरिकी प्रभुत्व वाली व्यवस्था के मजबूत विकल्प की दिशा में आगे बढ़ाना चाहते हैं। दूसरी ओर भारत की प्राथमिकता इसे किसी ‘पश्चिम-विरोधी गठबंधन’ में बदलने के बजाय बहुध्रुवीय दुनिया में वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करने की है।
भारत स्वयं क्वाड का सदस्य है, अमेरिका और यूरोप के साथ उसके गहरे आर्थिक-सामरिक संबंध हैं और उसी समय वह रूस के साथ पुरानी साझेदारी तथा ब्रिक्स में चीन के साथ सहयोग बनाए रखता है। इसलिए भारत के लिए ब्रिक्स का अर्थ किसी एक खेमे को चुनना नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता के लिए अधिक जगह बनाना है।  नई दिल्ली का संदेश भी इसी दिशा में है—वैश्विक दक्षिण केवल दूसरों के बनाए नियम मानने वाला ‘रूल टेकर’ नहीं, नियम बनाने में भागीदार ‘रूल शेपर’ बने।
दुनिया का आर्थिक नक्शा क्यों बदल रहा है
बीसवीं सदी की अंतरराष्ट्रीय संस्थागत व्यवस्था उस समय बनी थी जब अमेरिका और यूरोप की आर्थिक शक्ति असाधारण रूप से बड़ी थी। आज तस्वीर बदल चुकी है। ब्रिक्स देशों में विश्व की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उनका हिस्सा बहुत बड़ा हो चुका है।

इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाओं में शक्ति और प्रतिनिधित्व का ढांचा काफी हद तक पुराने विश्व संतुलन को प्रतिबिंबित करता है। इसी असमानता से ब्रिक्स को राजनीतिक ऊर्जा मिलती है। यह संघर्ष जरूरी नहीं कि ‘पश्चिम बनाम बाकी दुनिया’ हो। अधिक सही अर्थों में यह प्रतिनिधित्व का सवाल है—क्या इक्कीसवीं सदी की अर्थव्यवस्था को बीसवीं सदी की शक्ति-संरचना चलाती रहेगी?
ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी कमजोरी
ब्रिक्स की एक विचित्र विशेषता है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है। चीन और रूस की पश्चिम से प्रतिद्वंद्विता है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की क्षेत्रीय प्राथमिकताएं अलग हैं। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की अपनी कूटनीतिक चिंताएं हैं। कोई साझा सेना नहीं, कोई नाटो जैसी सुरक्षा संधि नहीं और न ही यूरोपीय संघ जैसा केंद्रीय शासन।
इसलिए ब्रिक्स को एक राजनीतिक-सैन्य गठबंधन समझना गलत होगा।
उसकी कमजोरी यह है कि इतने भिन्न देशों के बीच सहमति कठिन है। लेकिन उसकी ताकत भी यही है। यदि परस्पर विरोधी हितों वाले देश व्यापार, विकास, तकनीक और वैश्विक शासन सुधार के कुछ मुद्दों पर एक मंच पर सहमत हो सकते हैं, तो वह मंच अपने आप महत्वपूर्ण हो जाता है।
दिल्ली के बाद आगे क्या?
नई दिल्ली घोषणा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अधिक सुलभ बनाने, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के अनुभव साझा करने, स्वास्थ्य प्रशिक्षण, मानसिक स्वास्थ्य, औद्योगिक कौशल और विकास संबंधी ज्ञान के आदान-प्रदान जैसे अपेक्षाकृत कम चर्चित लेकिन दूरगामी विषय शामिल हैं। एनडीबी से स्थानीय मुद्राओं में अधिक वित्त उपलब्ध कराने और सीमा-पार भुगतान को सरल बनाने की दिशा भी महत्वपूर्ण है।

यही ब्रिक्स के भविष्य की असली परीक्षा होगी। दुनिया को एक और ऐसा सम्मेलन मंच नहीं चाहिए जहां नेता मिलें, तस्वीरें खिंचवाएं और लंबी घोषणाएं जारी कर लौट जाएं। ब्रिक्स की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह व्यापार की लागत घटाता है या नहीं, विकासशील देशों के लिए पूंजी उपलब्ध कराता है या नहीं और वैश्विक संस्थाओं में उनके वास्तविक प्रतिनिधित्व को बढ़ा पाता है या नहीं।
2027 में अध्यक्षता चीन के पास जाएगी। दिल्ली ने इसलिए एक महत्वपूर्ण मोड़ पर ब्रिक्स की दिशा तय की है।

कभी चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए बनाया गया एक निवेश संबंधी संक्षिप्त नाम आज नई विश्व व्यवस्था की बहस के केंद्र में पहुंच गया है। ब्रिक्स अभी पुरानी व्यवस्था का स्थान लेने वाली कोई वैकल्पिक विश्व सरकार नहीं है और न ही डॉलर का अंत करने वाली कोई जादुई व्यवस्था। उसका महत्व इससे अधिक सूक्ष्म है—वह उस ऐतिहासिक बदलाव का मंच बन रहा है जिसमें दुनिया की आर्थिक शक्ति धीरे-धीरे अधिक देशों में बंट रही है और वे देश अब वैश्विक नियमों की मेज पर केवल कुर्सी नहीं, अपनी बराबर की आवाज भी चाहते हैं।
दिल्ली सम्मेलन के बाद शायद ब्रिक्स को समझने का सबसे सरल तरीका यही है—**यह पश्चिम को हटाकर उसकी जगह लेने की परियोजना नहीं, बल्कि उस मेज को बड़ा करने की कोशिश है जिस पर अब तक दुनिया के नियम तय होते रहे हैं।**

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About author :

Jay Singh Rawat is an author and journalist known for his insightful writing and independent perspectives on contemporary issues. Through his work, he aims to inform, engage, and encourage thoughtful discussion. The views expressed are solely the author’s and do not necessarily reflect the views of the admin.

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