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हरित तनों से लेकर हरित उद्यमों तक : बांस बना नूतन आजीविका, उद्यमों और अवसरों का माध्यम

For generations, bamboo was closely linked with traditional livelihoods across communities, but an outdated regulatory barrier once held back its true economic potential. Under a British-era law, bamboo was classified as a tree, which made harvesting and transporting it unnecessarily cumbersome for the people who depended on it. In 2017, the government took a landmark step by removing bamboo from this classification, freeing it from restrictive forestry regulations. This forward-thinking reform opened the doors to greater innovation, entrepreneurship, and value addition in the bamboo sector. The importance of this move is now visible across the country, especially in the Northeast, where bamboo is driving employment, business, and innovation.

-A PIB Feature-

शहर के बाज़ार में मिलने वाला बांस का थैला देखने में साधारण लग सकता है। लेकिन इसकी यात्रा ऐसी कहानी बयां करती है जो एक छोटे से गाँव के उद्यम से शुरू होकर राष्ट्रीय नीति में बदलाव तक पहुँचती है। गुरुग्राम में आयोजित सरस आजीविका मेले में ऐसी ही एक कहानी प्रदर्शित की गई। यह कहानी असम की विशाखा दीदी द्वारा 2014 में बनाए गए बांस के थैले के बारे में है। वह स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) में शामिल हो गई और अपने ससुर के बांस शिल्प उद्यम को नए डिज़ाइनों के साथ पुनर्जीवित किया। सरकारी सहायता और प्रदर्शनियों ने उन्हें व्यापक बाज़ारों तक पहुँचने में मदद की। उन्होंने वर्ष 2025 में भारत  अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में भाग लिया। बांस के उत्पादों की बिक्री से उन्हें लाख रुपये की कमाई हुई। उनकी यह यात्रा एक ऐसे क्षण को दर्शाती है जिसने एक स्थानीय शिल्प को फलते-फूलते उद्यम में बदल दिया।

 

कई पीढ़ियों से, बांस विभिन्न समुदायों की पारंपरिक आजीविका से गहराई से जुड़ा हुआ था, लेकिन एक पुराने नियामक अवरोध ने एक समय इसकी वास्तविक आर्थिक क्षमता को अवरुद्ध कर रखा था। ब्रिटिश काल के एक कानून के अंतर्गत बांस को पेड़ के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जिससे इस पर निर्भर लोगों के लिए इसकी कटाई और परिवहन अनावश्यक रूप से कठिन हो गया था। 2017 में सरकार ने बांस को इस वर्गीकरण से हटाकर और इसे प्रतिबंधात्मक वन नियमों से मुक्त करके ऐतिहासिक कदम उठाया। इस दूरदर्शी सुधार ने बांस क्षेत्र में व्यापक नवाचारउद्यमिता और मूल्यवर्धन के नए द्वार खोल दिए हैं। इस कदम का महत्व अब पूरे देश में विशेषकर पूर्वोत्तर में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां बांस रोजगार, व्यवसाय और नवाचार को बढ़ावा दे रहा है।

इसका एक उदाहरण सिक्किम में गंगटोक के पास स्थित फैशन डिजाइनर और सतत विकास की प्रणेता चिमी ओंगमु भूटिया का लगस्टल डिजाइन स्टूडियो है। महिलाओं द्वारा संचालित यह विनिर्माण उद्यम बांस से बने हस्तशिल्पअगरबत्तीफर्नीचरआंतरिक सज्जा की वस्तुएं आदि का निर्माण करता है। यहां बांस पारंपरिक शिल्प से आगे बढ़कर समकालीन डिजाइन और उद्यम में जगह बना रहा है। चिमी की कहानी एक व्यापक आंदोलन का हिस्सा है। त्रिपुरा मेंबिजय सूत्रधार ने बांस उत्पादों के निर्माण में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी को अपनाया। नगालैंड में, दीमापुर के आसपास के स्वयं सहायता समूह बांस आधारित खाद्य उत्पादों में मूल्यवर्धन कर रहे हैं, इसके साथ ही खोरोलो क्रिएटिव क्राफ्ट्स जैसे स्थानीय उद्यम फर्नीचर और हस्तशिल्प का उत्पादन कर रहे हैं। इस बीच मिजोरम के मामित जिले में, टीमें बांस के ऊतक संवर्धन और पॉलीहाउस प्रबंधन के माध्यम से वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दे रही हैं। ये उदाहरण बांस क्षेत्र को अधिक विविध, नवोन्मेषी और मूल्य-संचालित बनने की ओर संकेत करते हैं।

इतने बड़े पैमाने पर बदलाव के लिए कुशल कारीगरों से कहीं अधिक की आवश्यकता होती है। इसके लिए प्रौद्योगिकी, प्रसंस्करण सुविधाएं, प्रशिक्षण और मजबूत बाजार संपर्कों की आवश्यकता होती है। यहीं पर सरकारी सहायता महत्वपूर्ण हो जाती है। राष्ट्रीय बांस मिशन बांस किसानों, विनिर्माताओं और विक्रेताओं के लिए खेतीप्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच पर ध्यान केंद्रित करता है। यह गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री के लिए नर्सरियों को भी सहायता प्रदान करता है। इस सरकारी योजना के कृषि स्तर पर प्रभाव को समझने के लिए एक उदाहरण पर विचार करें। मध्य प्रदेश में, विजय पाटीदार ने 2019 में पारंपरिक खेती से लगातार नुकसान होने के बाद बांस की खेती की ओर रुख किया। उन्होंने बांस मिशन के सहयोग से बांस के लगभग 4,000 पौधे लगाए। दो वर्षों के भीतर, उन्होंने बांस की बल्ली (पोल्स) बेचकर लगभग 75,000 रुपये कमाए। बांस की खेती ने उन्हें साथ में (अंतर्फसल) मिर्च, शिमला मिर्च, अदरक और लहसुन की फसल उगाने की भी अनुमति दी। उनका अनुभव दर्शाता है कि बांस कैसे फसल और दीर्घकालिक आजीविका का साधन बन सकता है।

इसके अलावा, नॉर्थ ईस्ट सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन एंड रीच (एनईसीटीएआर) ने कई व्यावसायिक अनुप्रयोगों में बांस प्रौद्योगिकियों का समर्थन किया है। इनमें खाद्य और कृषि-प्रसंस्करण, निर्माण सामग्री, विनिर्माण मशीनरी, नवीकरणीय ऊर्जा, औद्योगिक उत्पाद आदि शामिल हैं। इन योजनाओं से प्रतिवर्ष लगभग करोड़ मानवदिवस का रोजगार सर्जित हुआ है। इन्होंने बांस उत्पादों के मूल्यवर्धन को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 70 प्रतिशत तक कर दिया है। उदाहरण के लिए, इंजीनियर्ड बांस निर्माण के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल रहा है। इंजीनियर्ड बांस मिश्रित सामग्री है जो कच्चे बांस के रेशों, पट्टियों या कणों को बांधकर और संपीड़ित करके बनाई जाती है। नए डिजाइनों और इंजीनियर्ड बांस से बने फर्नीचर लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं और वास्तुकारों, डिजाइनरों और इंटीरियर डेकोरेटरों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, आपदा राहत और पुनर्वास के लिए 42 लाख वर्ग फुट से अधिक इंजीनियर्ड बांस संरचनाओं का निर्माण किया गया है। छत्तीसगढ़ में लगभग 20,000 बच्चों के लिए 576 स्कूल कक्ष इंजीनियर्ड बांस से बनाए गए हैं। यह दर्शाता है कि कैसे बांस ऐसे निर्माण कार्यों में अपना स्थान बना रहा है, जो कभी केवल पारंपरिक औद्योगिक सामग्रियों से जुड़े थे।

उत्पाद विविधीकरण से परे बांस की मूल्य शृंखला का विस्तार हो रहा है। महिलाओं के समूह इस उभरती मूल्य शृंखला में महत्वपूर्ण भागीदार बन रहे हैं। महिलाओं की आजीविका की ऐसी कहानी महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में विशेष रूप से दिखाई देती है। गढ़चिरोली अगरबत्ती परियोजना (जीएपी) नामक बांस आधारित अगरबत्ती पहल ने 2012 में जिले भर में उत्पादन केंद्र शुरू किए। 2020 तक, उनके पास 32 केंद्र थे जिनमें लगभग 1,100 लोग कार्यरत थे, और इनमें से लगभग 90 प्रतिशत श्रमिक महिलाएं थीं। प्रत्येक महिला की मासिक आय लगभग 5,000 रुपये तक पहुंच गई। रोजगार भी वार्षिक रूप से लगभग 45-60 दिनों से बढ़कर 225 दिनों से अधिक हो गया। काम घर के करीब होने लगा और शारीरिक रूप से कम थकाऊ हो गया। महिलाओं को नए कौशल, आत्मविश्वास और नेतृत्व के अवसर प्राप्त हुए। इस पहल ने आय के स्रोत के रूप में वनों पर निर्भरता को भी कम किया।

सरकार द्वारा क्षमता विकास और प्रशिक्षण के लिए किए जा रहे निरंतर प्रयासों के कारण ही ऐसी कहानियाँ संभव हो पाई हैं। सीएसआईआरराष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआरएनईआरआई), नागपुर ने हाल ही में, जून 2026 में, महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए बांस हस्तशिल्प पर पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का विषय था “फ्लाई ऐश डंप पर उगाए गए बांस से बने हस्तशिल्प के माध्यम से महिला स्वयं सहायता समूहों का सशक्तिकरण”। इस प्रशिक्षण में बांस की कटाई, उपचार और प्रसंस्करण, हस्तशिल्प उत्पादन, मूल्यवर्धित उत्पाद विकास, उद्यमिता, ब्रांडिंग, विपणन और उत्पाद डिजाइन में व्यावहारिक कौशल प्रदान किए गए। इस पहल ने प्रदर्शित किया कि कैसे पुनः प्राप्त फ्लाई ऐश डंप स्थलों को उत्पादक परिदृश्यों में परिवर्तित किया जा सकता है, जिससे स्थानीय समुदायों के लिए पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक दोनों लाभ उत्पन्न होते हैं।

बांस की कहानी अब लोगों, संभावनाओं और परिवर्तन की कहानी बन रही है। पूरे भारत में बांस आजीविका, उद्यम और स्थायी अवसर उत्पन्न कर रहा है। इसलिए भारत में बांस की कहानी अब केवल इस बारे में नहीं है कि बांस से क्या बन सकता है। यह इस बारे में है कि जब पारंपरिक संसाधन को प्रौद्योगिकीउद्यम और अवसर से जोड़ा जाता है तो समुदाय क्या बन सकते हैं।

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