बद्री गाय के संरक्षण में बड़ी छलांग, प्रयोगशाला तकनीक से जन्मी बछिया
उत्तराखंड की विशिष्ट पहाड़ी नस्ल के संवर्धन में ओपीयू-आईवीएफ तकनीक की सफलता, साहीवाल गाय बनी बद्री बछिया की सरोगेट मां
पंतनगर विश्वविद्यालय और एनडीआरआई करनाल के वैज्ञानिकों की तीन साल की मेहनत रंग लाई, अब श्रेष्ठ बद्री गायों की क्लोनिंग पर भी काम
देहरादून/पंतनगर, 12 सितम्बर। उत्तराखंड की विशिष्ट देसी बद्री गाय के संरक्षण और नस्ल सुधार की दिशा में वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। पहली बार उन्नत प्रजनन तकनीक ‘ओवम पिक-अप और इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन’ (ओपीयू-आईवीएफ) से तैयार बद्री भ्रूण को साहीवाल गाय के गर्भ में विकसित कर स्वस्थ बद्री बछिया का जन्म कराया गया है। बछिया का जन्म 11 सितम्बर को हुआ। यह सफलता इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे उत्तराखंड की इस पहाड़ी नस्ल की श्रेष्ठ गायों के आनुवंशिक गुणों को तेजी से अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने और नस्ल की संख्या बढ़ाने का रास्ता खुल गया है।
यह उपलब्धि आईसीएआर-राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई), करनाल और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के संयुक्त प्रयासों से हासिल हुई है। परियोजना को उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद, हल्दी से आर्थिक सहयोग मिला है। उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड ने भी बेहतर आनुवंशिक क्षमता वाले बद्री सांड का वीर्य उपलब्ध कराया।
बद्री उत्तराखंड की अपनी विशिष्ट देसी पशु नस्ल और महत्वपूर्ण पशु आनुवंशिक संसाधन है। पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित चारे और परंपरागत पशुपालन व्यवस्था के अनुरूप ढली यह नस्ल राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालन परंपरा से जुड़ी हुई है। देशी पशु नस्लों का महत्व केवल दुग्ध उत्पादन तक सीमित नहीं है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल देसी नस्लों के संरक्षण और आनुवंशिक सुधार को पशुधन विकास के लिए महत्वपूर्ण मानती है। देश में स्वदेशी पशु आनुवंशिक संसाधनों के व्यवस्थित पंजीकरण और संरक्षण का कार्यक्रम लगातार विस्तारित किया जा रहा है।
साहीवाल गाय के गर्भ से बद्री बछिया
इस प्रयोग की सबसे दिलचस्प बात यह है कि बछिया बद्री नस्ल की है, लेकिन उसे जन्म साहीवाल नस्ल की गाय ने दिया है। अर्थात साहीवाल गाय ने केवल प्राप्तकर्ता अथवा सरोगेट मां की भूमिका निभाई। बछिया की आनुवंशिक पहचान बद्री नस्ल की ही है।
इसके लिए वैज्ञानिकों ने आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठ चुनी गई बद्री गायों से अल्ट्रासाउंड की मदद से अंडाणु निकाले। इस प्रक्रिया को ‘ओवम पिक-अप’ कहा जाता है। इन अंडाणुओं को प्रयोगशाला में परिपक्व करने के बाद उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड से प्राप्त बेहतर बद्री सांड के वीर्य से निषेचित किया गया। इस तरह बने भ्रूणों को नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में विकसित करने के बाद गर्भधारण के लिए तैयार प्राप्तकर्ता गायों में प्रत्यारोपित किया गया।
इन्हीं में से एक बद्री भ्रूण को साहीवाल गाय में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया गया। गर्भावस्था पूरी होने के बाद 11 सितम्बर को उसने स्वस्थ बद्री बछिया को जन्म दिया। ओपीयू-आईवीएफ और भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक का इस्तेमाल दूसरी नस्लों में भी सफल रहा है। इससे पहले आईसीएआर और उत्तराखंड पशुधन विकास बोर्ड के सहयोग से इसी प्रकार की ओपीयू-आईवीएफ-ईटी तकनीक से साहीवाल प्राप्तकर्ता गाय से फ्राइज़वाल बछिया का सफल जन्म कराया जा चुका है।
एक अन्य समन्वित प्राप्तकर्ता गाय भी गर्भवती है और वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वह अगले पांच से सात दिनों के भीतर बद्री बछड़े को जन्म दे सकती है। यदि यह प्रसव भी सफल रहता है तो बद्री नस्ल के वैज्ञानिक संवर्धन कार्यक्रम को और मजबूती मिलेगी।
तीन साल से चल रहा था प्रयोग
बद्री नस्ल पर यह महत्वाकांक्षी अनुसंधान कार्यक्रम वर्ष 2023 में जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. एम.एस. चौहान की पहल और नेतृत्व में शुरू हुआ था। इसके तहत पंतनगर विश्वविद्यालय और एनडीआरआई करनाल के वैज्ञानिकों के बीच बद्री पशुओं के जर्मप्लाज्म के संरक्षण, गुणन और आनुवंशिक सुधार के लिए उन्नत प्रजनन तकनीक विकसित करने पर सहमति बनी।
पिछले तीन वर्षों में दोनों संस्थानों की वैज्ञानिक टीमों ने बद्री गायों के लिए ओपीयू-आईवीएफ, प्रयोगशाला में भ्रूण उत्पादन और भ्रूण प्रत्यारोपण की प्रक्रिया स्थापित करने पर लगातार काम किया। अब स्वस्थ बछिया का जन्म इस पूरे अनुसंधान कार्यक्रम की पहली बड़ी व्यावहारिक सफलता बनकर सामने आया है।
एनडीआरआई करनाल के निदेशक डॉ. धीर सिंह के अनुसार ओपीयू-आईवीएफ जैसी उन्नत प्रजनन तकनीक आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठ मादा पशुओं के जर्मप्लाज्म का तेजी से विस्तार कर सकती है। इससे बद्री जैसी महत्वपूर्ण देसी नस्लों के संरक्षण और आनुवंशिक सुधार के लिए व्यवस्थित कार्यक्रम विकसित किए जा सकते हैं।
एक श्रेष्ठ गाय से तैयार हो सकेंगे कई भ्रूण
सामान्य प्रजनन में एक गाय एक निश्चित समय में सीमित संख्या में ही संतति पैदा कर सकती है। यही प्राकृतिक सीमा किसी दुर्लभ अथवा स्थानीय नस्ल की संख्या तेजी से बढ़ाने में बड़ी बाधा बनती है। ओपीयू-आईवीएफ तकनीक इस सीमा को काफी हद तक पार करने का रास्ता देती है।
इसमें श्रेष्ठ मादा पशु के अंडाणुओं को एकत्र कर प्रयोगशाला में बेहतर सांड के वीर्य से निषेचित करके कई भ्रूण तैयार किए जा सकते हैं। इन भ्रूणों को बाद में दूसरी स्वस्थ गायों के गर्भ में प्रत्यारोपित किया जा सकता है। इस तरह आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठ बद्री गाय को हर बछड़े के लिए स्वयं गर्भ धारण करने की आवश्यकता नहीं होगी। उसके अंडाणुओं से बने भ्रूण दूसरी गायों में विकसित कराए जा सकेंगे।
यही कारण है कि यह तकनीक केवल एक बछिया के जन्म की वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है। इसका असली महत्व इस संभावना में है कि भविष्य में राज्य की चुनी हुई श्रेष्ठ बद्री गायों और सांडों के आनुवंशिक गुणों का तेजी से विस्तार किया जा सकता है।
उत्तराखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सफलता
बद्री गाय उत्तराखंड की पर्वतीय पशुपालन व्यवस्था का हिस्सा रही है। राज्य के छोटे और सीमांत किसानों के लिए ऐसी स्थानीय नस्लों की उपयोगिता उनकी परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की क्षमता से भी जुड़ी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार देसी पशु नस्लों में स्थानीय जलवायु के अनुकूलन, अपेक्षाकृत कम रखरखाव और प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने जैसी विशेषताएं महत्वपूर्ण हैं।
उत्तराखंड जैसे राज्य में यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े व्यावसायिक डेयरी फार्मों की तुलना में छोटे पशुपालकों की संख्या अधिक है। दुर्गम भूगोल, चारे की सीमित उपलब्धता और छोटी जोतों वाली कृषि व्यवस्था में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पशु आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आय और जैव विविधता—तीनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
नई तकनीक का उद्देश्य बद्री गाय को किसी दूसरी नस्ल में बदलना नहीं, बल्कि बद्री नस्ल के भीतर ही बेहतर आनुवंशिक गुणों वाले पशुओं की संख्या बढ़ाना है। इसलिए इसका महत्व नस्ल की मौलिक आनुवंशिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए उसके बेहतर गुणों को आगे बढ़ाने में है।
अब बद्री गाय की क्लोनिंग की तैयारी
इस अनुसंधान का अगला चरण और भी महत्वाकांक्षी है। वैज्ञानिक अब अधिक दूध देने वाली और आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठ बद्री गायों की क्लोनिंग पर भी काम कर रहे हैं। संयुक्त वैज्ञानिक दल अनुसंधान के विभिन्न चरणों में क्लोन किए गए बद्री भ्रूण तैयार करने में सफलता प्राप्त कर चुका है।
अगले चरण में ओपीयू-आईवीएफ तथा क्लोनिंग से तैयार भ्रूणों को उपयुक्त साहीवाल, संकरित और बद्री प्राप्तकर्ता गायों में प्रत्यारोपित करने की योजना है। यदि क्लोनिंग के ये प्रयोग सफल रहते हैं तो असाधारण आनुवंशिक गुणों वाली बद्री गायों की आनुवंशिक प्रतिकृतियां तैयार करने की दिशा में भी रास्ता खुल सकता है।
हालांकि प्रयोगशाला की सफलता को बड़े पैमाने पर पशुपालकों तक पहुंचाने के लिए अभी कई चरण बाकी हैं। तकनीक की लागत, प्रशिक्षित विशेषज्ञों की उपलब्धता, श्रेष्ठ बद्री पशुओं की वैज्ञानिक पहचान, भ्रूणों की गर्भधारण सफलता दर और पर्वतीय क्षेत्रों तक तकनीक पहुंचाने की व्यवस्था इसके व्यावहारिक विस्तार में महत्वपूर्ण होगी।
संरक्षण से आगे पशुपालकों तक पहुंचने की चुनौती
उत्तराखंड के लिहाज से इस वैज्ञानिक उपलब्धि की वास्तविक परीक्षा तब होगी जब इसका लाभ प्रयोगशालाओं और अनुसंधान फार्मों से निकलकर पर्वतीय जिलों के पशुपालकों तक पहुंचेगा। श्रेष्ठ बद्री गायों और सांडों की पहचान, उनका आनुवंशिक रिकॉर्ड तैयार करना, जर्मप्लाज्म बैंक विकसित करना तथा चुनिंदा क्षेत्रों में नस्ल सुधार कार्यक्रम चलाना इसकी अगली संभावित कड़ियां हो सकती हैं।
भारत में स्वदेशी पशुधन की पहचान और संरक्षण पर लगातार जोर बढ़ रहा है। आईसीएआर-एनबीएजीआर द्वारा पंजीकृत स्वदेशी पशु नस्लों की संख्या भी लगातार बढ़ी है। अगस्त 2026 में आईसीएआर ने 16 और स्वदेशी नस्लों को पंजीकृत करते हुए स्थानीय पशु आनुवंशिक विविधता के संरक्षण को महत्वपूर्ण बताया था।
इस दृष्टि से बद्री बछिया का जन्म केवल वैज्ञानिक प्रयोग की सफलता नहीं, बल्कि उत्तराखंड के अपने पशु आनुवंशिक संसाधन को आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी से जोड़ने की शुरुआत है। यदि ओपीयू-आईवीएफ, भ्रूण प्रत्यारोपण और आगे चलकर क्लोनिंग तकनीक को वैज्ञानिक सावधानी तथा सुव्यवस्थित नस्ल संरक्षण नीति के साथ आगे बढ़ाया गया तो इससे बद्री नस्ल की संख्या बढ़ाने, श्रेष्ठ आनुवंशिक गुणों को सुरक्षित रखने और पहाड़ी पशुपालन को मजबूत करने की नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।
आईसीएआर-एनडीआरआई करनाल और जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर ने इस उपलब्धि के बाद देसी पशु नस्लों के संरक्षण, आनुवंशिक सुधार और टिकाऊ उपयोग के लिए संयुक्त अनुसंधान तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को और मजबूत करने की बात कही है। उत्तराखंड के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि प्रयोगशाला में मिली इस बड़ी सफलता को राज्य की पशुधन नीति और पहाड़ के सामान्य पशुपालक से कितनी प्रभावी ढंग से जोड़ा जा पाता है।
