डिफेंस कॉलोनी में 250 करोड़ से अधिक की जमीन पर घोटाले का आरोप, जांच और बोर्ड गठन की मांग
देहरादून, 13 सितम्बर। राजधानी देहरादून की प्रतिष्ठित डिफेंस कॉलोनी में करीब 250 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की भूमि के कथित घोटाले और सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित जमीन को निजी इस्तेमाल में लाने का मामला गंभीर होता जा रहा है। प्रकरण में शासन पहले ही निबंधक सहकारी समितियां, उत्तराखंड को निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दे चुका है। दूसरी ओर शिकायतकर्ताओं ने जांच समिति गठित करने के साथ कॉलोनी में भूमि और संपत्तियों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए बोर्ड लगाने की मांग की है।
मामला द सैनिक सहकारी आवास समिति लिमिटेड, डिफेंस कॉलोनी से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार समिति की स्थापना 1960 के दशक में सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों और उनके परिवारों के लिए आवासीय कॉलोनी विकसित करने के उद्देश्य से हुई थी। कॉलोनी के स्वीकृत ले-आउट में आवासीय भूखंडों के अलावा सड़क, पार्क, हरित क्षेत्र, सामुदायिक और मनोरंजन संबंधी सुविधाओं के लिए भी जमीन छोड़ी गई थी। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि समय के साथ सार्वजनिक और सामुदायिक उपयोग के लिए निर्धारित जमीन के स्वरूप में बदलाव कर उसके कुछ हिस्सों को निजी उपयोग में लाया गया।
इस विवाद की गंभीरता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि फरवरी 2025 में पुलिस ने इसी कॉलोनी की जमीन से संबंधित कथित फर्जीवाड़े के मामले में 15 सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों सहित 16 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। उस समय सामने आई जानकारी के अनुसार डिफेंस कॉलोनी करीब 183.89 एकड़ क्षेत्र में विकसित हुई और इसमें लगभग 680 भूखंड बनाए गए थे। शिकायत में ले-आउट और दस्तावेजों में कथित छेड़छाड़ तथा खुली और सामुदायिक जमीन की बिक्री के आरोप लगाए गए थे। हालांकि समिति के तत्कालीन/पूर्व पदाधिकारियों ने आरोपों को निराधार बताते हुए अपने फैसलों को समिति की आम सभा से स्वीकृत बताया था।
सार्वजनिक जमीन को लेकर उठे गंभीर सवाल
समाचार पत्र में प्रकाशित शिकायत के अनुसार कॉलोनी के कुल ले-आउट का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा खुले स्थान, पार्क, हरित क्षेत्र और सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्धारित था। आरोप है कि सोसायटी के पूर्व प्रबंधन और विभिन्न समितियों के कार्यकाल में इनमें से कुछ स्थानों को निजी भूखंडों में बदल दिया गया।
शिकायतकर्ता सेवानिवृत्त कर्नल रमेश प्रसाद सिंह ने मुख्यमंत्री और पर्यावरण मंत्रालय को भेजी शिकायत में आरोप लगाया है कि इस पूरी प्रक्रिया से भूमि की मौजूदा बाजार कीमत को देखते हुए करीब 250 करोड़ रुपये से अधिक की सार्वजनिक/सामुदायिक संपत्ति प्रभावित हुई है। उन्होंने लगभग एक लाख वर्गमीटर से अधिक हरित अथवा खुले क्षेत्र के प्रभावित होने का दावा भी किया है। ये फिलहाल शिकायतकर्ता के आरोप हैं; अंतिम स्थिति जांच और आधिकारिक अभिलेखों के मिलान के बाद ही स्पष्ट होगी।
प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मूल स्वीकृत ले-आउट में पार्क, खेल मैदान, हरित पट्टी अथवा सामुदायिक उपयोग के लिए छोड़ी गई भूमि में बाद में क्या-क्या परिवर्तन किए गए, ऐसे परिवर्तन किस सक्षम प्राधिकारी की अनुमति से हुए और उनसे लाभान्वित होने वाले व्यक्ति कौन हैं।
फरवरी 2025 में दर्ज हुआ था मुकदमा
इस विवाद का आपराधिक पहलू भी सामने आ चुका है। फरवरी 2025 में दर्ज मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि समिति के पदाधिकारियों ने जमीन बेचने के लिए दस्तावेजों और ले-आउट प्लान में छेड़छाड़ की तथा निर्धारित भूखंडों के अतिरिक्त जमीन बेची। पुलिस ने इसके बाद दस्तावेज जुटाकर जांच शुरू की थी।
इसलिए मौजूदा प्रकरण को केवल सोसायटी के आंतरिक विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता। यदि मूल ले-आउट में सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित भूमि वास्तव में आवासीय अथवा निजी उपयोग में परिवर्तित हुई है तो यह जांच का विषय होगा कि परिवर्तन सहकारी समिति के नियमों, विकास प्राधिकरण की स्वीकृति और उस समय लागू भू-उपयोग संबंधी प्रावधानों के अनुरूप थे या नहीं।
शासन ने निबंधक सहकारी समितियां से मांगी जांच
प्रकाशित विवरण के अनुसार शिकायत शासन तक पहुंचने के बाद निबंधक सहकारी समितियां, उत्तराखंड को मामले की निष्पक्ष जांच कराकर आरोपियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करने के लिए कहा गया है। इससे अब समिति के पुराने अभिलेख, मूल ले-आउट, संशोधित नक्शे, आम सभा की कार्यवाही, भूखंड आवंटन, बिक्री और हस्तांतरण से संबंधित दस्तावेज महत्वपूर्ण हो गए हैं।
शिकायतकर्ताओं की मांग है कि मामले की जांच के लिए संयुक्त जांच समिति बनाई जाए। साथ ही कॉलोनी की सार्वजनिक और सामुदायिक संपत्तियों की पहचान कर मौके पर बोर्ड लगाए जाएं, ताकि यह स्पष्ट रहे कि कौन-सी जमीन पार्क, हरित क्षेत्र, सड़क, खेल मैदान या अन्य सामुदायिक उपयोग के लिए आरक्षित है।
पर्यावरणीय नुकसान की भी जांच की मांग
शिकायत में केवल जमीन की खरीद-बिक्री का प्रश्न नहीं उठाया गया है। आरोप है कि बड़े पैमाने पर खुले और हरित क्षेत्र प्रभावित होने से कॉलोनी के पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा। इस संबंध में पेड़ों की कटाई और हरित क्षेत्र के स्वरूप में बदलाव की जांच कर संबंधित विभागों से कार्रवाई की मांग की गई है।
मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि डिफेंस कॉलोनी आज देहरादून के प्रमुख आवासीय क्षेत्रों में शामिल है। यहां जमीन की कीमतों में पिछले दशकों में भारी वृद्धि हुई है। इसलिए कई दशक पुराने आवंटन और वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर लगाए जा रहे आर्थिक नुकसान के आकलन में भी अंतर हो सकता है। 250 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान का आंकड़ा शिकायतकर्ता का अनुमान है, इसे अभी किसी सरकारी जांच एजेंसी द्वारा अंतिम रूप से प्रमाणित आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।
अब निगाह निबंधक सहकारी समितियां की जांच पर रहेगी। मूल ले-आउट, बाद में किए गए संशोधनों और जमीन के हस्तांतरण का रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि सार्वजनिक उपयोग की कितनी भूमि का स्वरूप बदला गया, बदलाव वैधानिक था या नहीं और इसमें किन पदाधिकारियों अथवा अन्य व्यक्तियों की जिम्मेदारी बनती है।
