अनुमान से कहीं ज्यादा सिकुड़ रहा है बुध ग्रह
New estimates using the planet’s surface wrinkles show that our smallest planet is growing even smaller, at a faster clip than expected.
सतह की ‘झुर्रियों’ में छिपी है ग्रह के ठंडा होने की कहानी, नए अध्ययन ने पुराने अनुमान को बदला

सौरमंडल का सबसे छोटा ग्रह बुध यानी मर्करी धीरे–धीरे सिकुड़ रहा है। यह बात वैज्ञानिकों को पहले से मालूम थी, लेकिन अब नई गणनाओं ने संकेत दिया है कि पिछले साढ़े चार अरब वर्षों में उसमें हुआ संकुचन पहले लगाए गए अनुमानों से कहीं अधिक हो सकता है। बुध की सतह पर मौजूद विशाल चट्टानी सिलवटों, ढलानों और ‘झुर्रियों’ का नए तरीके से अध्ययन करने पर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं।
नए शोध के अनुसार बुध के बनने के बाद से उसके व्यास में कुल कमी लगभग 14.5 मील यानी 23 किलोमीटर तक हो सकती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ग्रह का वास्तविक संकुचन पुराने आकलनों की तुलना में करीब 10 से 30 प्रतिशत अधिक हो सकता है।
यह निष्कर्ष केवल बुध के आकार से जुड़ी एक दिलचस्प खगोलीय जानकारी नहीं है। किसी ग्रह का सिकुड़ना उसके भीतर की गर्मी, धात्विक कोर की संरचना और अरबों वर्षों में उसके विकास की कहानी भी बताता है। इसीलिए बुध की सतह पर दिखाई देने वाली ये झुर्रियां वैज्ञानिकों के लिए उसके अतीत का एक तरह का भूगर्भीय अभिलेख हैं।

NASA के मैसेंजर स्पेसक्राफ्ट से ली गई तस्वीरों में बुध की सतह पर उभार, घाटियाँ और सिलवटें दिखाई दीं। क्रेडिट...NASA/जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी एप्लाइड फिजिक्स लेबोरेटरी/कार्नेगी इंस्टीट्यूशन ऑफ वाशिंगटन
सौरमंडल का छोटा लेकिन अनोखा ग्रह
बुध हमारे सौरमंडल का सबसे छोटा और सूर्य के सबसे निकट स्थित ग्रह है। इसका व्यास लगभग 4,880 किलोमीटर है, जबकि पृथ्वी का व्यास करीब 12,742 किलोमीटर है। यानी बुध की चौड़ाई पृथ्वी की चौड़ाई के लगभग 38 प्रतिशत के बराबर है। विशाल बृहस्पति के सामने तो यह और भी छोटा दिखाई देता है।
लेकिन आकार में छोटा बुध ग्रह–विज्ञान के लिए असाधारण रूप से महत्वपूर्ण है। इसके आयतन की तुलना में इसका धात्विक कोर बहुत बड़ा है। वैज्ञानिक मानते हैं कि बुध की त्रिज्या का बड़ा हिस्सा इसके विशाल लौह–समृद्ध कोर से बना है। यही असामान्य आंतरिक संरचना उसके ठंडा होने और सिकुड़ने की प्रक्रिया को समझने में खास महत्व रखती है।
जब करीब 4.5 अरब वर्ष पहले प्रारंभिक सौरमंडल में धूल, चट्टानों और दूसरे पिंडों की टक्करों तथा विलय से बुध का निर्माण हुआ, तब यह आज की तुलना में बहुत गर्म था। ग्रह के भीतर भारी मात्रा में ताप मौजूद था और शुरुआती दौर में रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय से भी गर्मी पैदा होती रही।
अरबों वर्षों के दौरान बुध के भीतर की गर्मी धीरे–धीरे अंतरिक्ष में निकलती गई। उसका विशाल धात्विक कोर ठंडा हुआ और सिकुड़ने लगा। अंदरूनी हिस्सा सिकुड़ा तो बाहरी ठोस पर्पटी को भी छोटे होते ग्रह के अनुरूप अपने को समायोजित करना पड़ा। परिणामस्वरूप सतह पर चट्टानें एक–दूसरे पर चढ़ीं, विशाल ढलान बने और जमीन में ऐसी सिलवटें पैदा हुईं जिन्हें दूर से ग्रह की ‘झुर्रियां’ कहा जा सकता है।
कुछ वैसा ही जैसे किसी फल का अंदरूनी हिस्सा सूखकर छोटा होने पर उसका छिलका सिकुड़ने और झुर्रीदार होने लगता है—हालांकि बुध पर यह प्रक्रिया कहीं अधिक जटिल भूगर्भीय शक्तियों के कारण अरबों वर्षों में हुई है।
झुर्रियों ने खोला बुध का राज
नया अध्ययन 10 सितंबर 2026 को वैज्ञानिक पत्रिका Geophysical Research Letters में प्रकाशित हुआ। इसका नेतृत्व जर्मन एयरोस्पेस सेंटर के इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस रिसर्च के ग्रह वैज्ञानिक गाकू निशियामा ने किया।
शोधकर्ताओं ने पाया कि बुध के सिकुड़ने के पुराने अनुमान संभवतः इसलिए कम थे क्योंकि ग्रह की सभी भूगर्भीय ‘झुर्रियां’ आज दिखाई नहीं देतीं। अरबों वर्षों तक बुध की सतह पर क्षुद्रग्रह और उल्कापिंड गिरते रहे। इन टक्करों ने विशाल क्रेटर बनाए और बड़ी मात्रा में मलबा फैलाया। कई स्थानों पर लावा प्रवाह तथा दूसरी भूगर्भीय प्रक्रियाओं ने भी पुरानी संरचनाओं को ढक दिया।
इसका अर्थ यह है कि आज वैज्ञानिक जितनी सिलवटें और चट्टानी ढलान देख पा रहे हैं, वे बुध के वास्तविक संकुचन का पूरा रिकॉर्ड नहीं हैं। बहुत–से पुराने निशान नई भूगर्भीय संरचनाओं के नीचे दबे हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने इसी छिपे हुए रिकॉर्ड को गणनाओं में शामिल करने का प्रयास किया।
इसके लिए टीम ने नासा के MESSENGER मिशन से प्राप्त तस्वीरों और आधुनिक डिजिटल भू–आकृतिक मॉडलों का उपयोग किया। MESSENGER को 2004 में प्रक्षेपित किया गया था। उसने 2008 और 2009 में बुध के निकट से उड़ानें भरीं और मार्च 2011 में ग्रह की कक्षा में प्रवेश किया। लगभग चार वर्षों तक उसने बुध का अभूतपूर्व अध्ययन किया और 2015 में उसका मिशन समाप्त हुआ।
MESSENGER ने पहली बार वैज्ञानिकों को लगभग पूरे बुध की सतह को विस्तार से देखने का अवसर दिया। उसकी तस्वीरों में लंबी चट्टानी ढलानें, संकरी घाटियां, पर्वतनुमा संरचनाएं और सिकुड़न से बनी असंख्य सिलवटें दिखाई दीं।
लेकिन जो दिखाई नहीं देता, वह भी महत्वपूर्ण है
निशियामा और उनकी टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि केवल दिखाई देने वाली संरचनाओं के आधार पर पूरे ग्रह के संकुचन का अनुमान कैसे लगाया जाए।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन क्षेत्रों की सतह अधिक ऊबड़–खाबड़ और टक्करों से ज्यादा प्रभावित है, वहां संकुचन से बनी संरचनाएं अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं। इसका यह अर्थ जरूरी नहीं कि वहां ग्रह कम सिकुड़ा। संभव है कि पुराने संकुचन के निशान बाद में गिरे क्षुद्रग्रहों के मलबे और दूसरी भूगर्भीय गतिविधियों के नीचे दब गए हों।
इस प्रभाव को गणनाओं में शामिल करने के बाद बुध के कुल संकुचन का अनुमान बढ़ गया।
अध्ययन के मुताबिक ग्रह के व्यास में अधिकतम करीब 23 किलोमीटर या 14.5 मील तक की कमी हो सकती है। यह आंकड़ा सुनने में बहुत बड़ा नहीं लगता, लेकिन किसी पूरे ग्रह के वैश्विक स्तर पर सिकुड़ने के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है। बुध का वर्तमान व्यास करीब 4,880 किलोमीटर है।
इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि नए शोध ने बुध के सिकुड़ने की मौजूदा गति अचानक बढ़ जाने का प्रमाण नहीं दिया है, बल्कि यह संकेत दिया है कि अरबों वर्षों में हुआ कुल संकुचन अब तक लगाए गए अनुमान से 10 से 30 प्रतिशत अधिक हो सकता है।
ग्रह की झुर्रियां उसके भीतर का तापमान बताती हैं
बुध कितना सिकुड़ा, यह जानने का महत्व केवल उसका पुराना आकार निर्धारित करने तक सीमित नहीं है। ग्रह के संकुचन की मात्रा वैज्ञानिकों को यह अनुमान लगाने में मदद करती है कि उसके भीतर कितनी गर्मी थी, वह कितनी तेजी से ठंडा हुआ और उसके कोर में किन तत्वों का कितना योगदान हो सकता है।
ब्राउन यूनिवर्सिटी के ग्रह भूवैज्ञानिक सैम बर्च, जो इस अध्ययन में शामिल नहीं थे, के अनुसार हर ग्रह की अपनी अलग कहानी है। बुध के संकुचन को समझने से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि वह कितनी तेजी से ठंडा हुआ, शुरुआत में उसका आकार क्या रहा होगा और उसकी आंतरिक संरचना कैसी है।
यही कारण है कि बुध ग्रह वैज्ञानिकों के लिए एक प्राकृतिक प्रयोगशाला जैसा है। पृथ्वी की सतह प्लेट टेक्टोनिक्स, जल, हवा और जीवन से लगातार बदलती रहती है। इसके विपरीत बुध पर वायुमंडलीय क्षरण लगभग नहीं है। इसलिए उसकी प्राचीन सतह पर सौरमंडल के शुरुआती इतिहास के अनेक निशान अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं।
चंद्रमा और मंगल भी पूरी तरह स्थिर नहीं
बुध अकेला ऐसा पथरीला पिंड नहीं है जिसकी सतह पर संकुचन के प्रमाण मिले हैं। चंद्रमा पर भी वैज्ञानिकों ने ऐसे छोटे चट्टानी कगार और भ्रंश देखे हैं जो उसके आंतरिक भाग के ठंडा होने और धीरे–धीरे सिकुड़ने से जुड़े माने जाते हैं। मंगल पर भी वैश्विक तापीय विकास ने उसकी पर्पटी और भूगर्भीय संरचना को प्रभावित किया है।
लेकिन बुध विशेष है क्योंकि उसके आकार की तुलना में उसका धात्विक कोर असाधारण रूप से बड़ा है। इसीलिए उसके ठंडा होने और संकुचन का अध्ययन पथरीले ग्रहों के निर्माण के सिद्धांतों की परीक्षा करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि बुध की सतह पर छिपी संरचनाओं का पता लगाने के लिए विकसित तरीके भविष्य में चंद्रमा, मंगल और दूसरे पथरीले पिंडों के अध्ययन में भी उपयोगी हो सकते हैं।
अब बेपीकोलंबो देगा अगला जवाब
दिलचस्प बात यह है कि यह अध्ययन ऐसे समय सामने आया है जब बुध के अध्ययन का नया अध्याय शुरू होने वाला है।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA) का संयुक्त BepiColombo मिशन इस समय बुध के बेहद करीब पहुंच चुका है। इसे 20 अक्टूबर 2018 को प्रक्षेपित किया गया था और लगभग आठ वर्षों की जटिल अंतरग्रहीय यात्रा के बाद अब यह अपने गंतव्य पर पहुंचने की अंतिम प्रक्रिया में है।
इस यात्रा के दौरान बेपीकोलंबो ने पृथ्वी की एक, शुक्र की दो और बुध की छह—कुल नौ ग्रह–निकट उड़ानें पूरी की हैं। सूर्य के अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण सीधे बुध की कक्षा में पहुंचना आश्चर्यजनक रूप से कठिन है, इसलिए यान को ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण का सहारा लेकर अपनी गति और दिशा बार–बार बदलनी पड़ी।
3 सितंबर 2026 को इसका Mercury Transfer Module सफलतापूर्वक अलग हो चुका है। अब अगला महत्वपूर्ण चरण 21 नवंबर 2026 को आएगा, जब इसके दो वैज्ञानिक यान बुध की कक्षा में प्रवेश करेंगे। इसके बाद ESA का Mercury Planetary Orbiter (MPO) और JAXA का Mio अलग–अलग कक्षाओं में जाकर ग्रह तथा उसके आसपास के अंतरिक्ष वातावरण का अध्ययन करेंगे। नियमित वैज्ञानिक अभियान अप्रैल 2027 में शुरू होने की योजना है।
बेपीकोलंबो के उपकरण बुध की स्थलाकृति, सतह की संरचना, गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र, चुंबकीय क्षेत्र और आंतरिक बनावट के बारे में MESSENGER से भी अधिक विस्तृत जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं। उसका लेजर अल्टीमीटर सतह की ऊंचाई और बनावट का सटीक मापन करने में विशेष रूप से उपयोगी होगा।
यही आंकड़े वैज्ञानिकों को यह जांचने में मदद कर सकते हैं कि बुध वास्तव में कितना सिकुड़ा है और उसकी कितनी ‘झुर्रियां’ अरबों वर्षों की उल्कापिंडीय बमबारी के नीचे छिपी हुई हैं।
छोटे ग्रह में छिपी बड़ी कहानी
बुध को अक्सर शुक्र, मंगल, बृहस्पति या शनि की तुलना में कम आकर्षक ग्रह माना जाता है। न उसके चारों ओर शनि जैसे छल्ले हैं, न मंगल जैसी संभावित प्राचीन नदियों की चर्चा और न ही बृहस्पति जैसे विशाल तूफान। लेकिन उसकी झुलसी हुई, क्रेटरों से भरी और झुर्रीदार सतह सौरमंडल के आरंभिक इतिहास का दुर्लभ दस्तावेज है।
उसकी प्रत्येक विशाल चट्टानी सिलवट इस बात का प्रमाण हो सकती है कि ग्रह का अंदरूनी हिस्सा अरबों वर्षों से गर्मी खोता और सिकुड़ता रहा है।
नई गणनाओं ने अब वैज्ञानिकों को यह अहसास कराया है कि वे शायद अब तक केवल उन झुर्रियों को गिन रहे थे जो दिखाई दे रही थीं। असली कहानी का एक हिस्सा मलबे और पुरानी भूगर्भीय परतों के नीचे छिपा हुआ है।
बेपीकोलंबो जब बुध को और करीब से नापेगा तो संभव है कि सौरमंडल का यह सबसे छोटा ग्रह अपने जन्म, अपने विशाल धात्विक हृदय और साढ़े चार अरब वर्षों से जारी अपनी धीमी सिकुड़न के बारे में कई और रहस्य खोल दे।
