उत्तराखंड सरकार ने 1320 मेगावाट बिजली करार पर उठे विवाद पर दी सफाई
कांग्रेस के आरोपों पर प्रमुख सचिव ऊर्जा का विस्तृत जवाब, कहा—प्रतिस्पर्धी निविदा और नियामक की मंजूरी से हुई प्रक्रिया

देहरादून, 17 सितम्बर। उत्तराखंड में 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली की 25 वर्ष की दीर्घकालिक खरीद को लेकर उठे राजनीतिक विवाद के बीच राज्य सरकार ने गुरुवार को विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया। प्रमुख सचिव ऊर्जा डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम ने कहा कि बिजली खरीद की प्रक्रिया निर्धारित नियमों, तकनीकी आवश्यकताओं, प्रतिस्पर्धी निविदा और उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (UERC) की स्वीकृति के आधार पर आगे बढ़ाई गई है। उन्होंने किसी एक कंपनी को लाभ पहुंचाने के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य राज्य की बढ़ती दीर्घकालिक बिजली जरूरत के लिए भरोसेमंद बेस-लोड बिजली सुनिश्चित करना है।
इससे पहले कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि 1320 मेगावाट ताप विद्युत से संबंधित निविदा की 86 में से 84 शर्तों में बदलाव कर अदाणी समूह को लाभ पहुंचाया गया। कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने यह भी दावा किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के संयुक्त उद्यम के बजाय दूसरी व्यवस्था अपनाने से राज्य के बिजली उपभोक्ताओं पर 25 वर्षों में करीब 1.60 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा।
प्रमुख सचिव ने इन आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि केंद्रीय विद्युत मंत्रालय द्वारा 2019 में जारी मॉडल बिडिंग डॉक्यूमेंट एक सामान्य प्रारूप है। प्रत्येक बिजली परियोजना की तकनीक, स्थान, ईंधन की उपलब्धता और परिवहन लागत जैसी परिस्थितियां अलग होती हैं। निविदा के दौरान बोलीदाताओं से मिले सुझावों और आपत्तियों का तकनीकी एवं व्यावहारिक परीक्षण किया गया और जिन बदलावों की जरूरत महसूस हुई, उन्हें UERC के समक्ष रखा गया। आयोग की स्वीकृति के बाद ही प्रक्रिया आगे बढ़ी।
UERC के आधिकारिक अभिलेखों में भी 9 मई 2025 को 1320 मेगावाट दीर्घकालिक कोयला आधारित बिजली खरीद के RFQ में बदलाव से संबंधित आवेदन तथा जून और जुलाई 2026 में RFP एवं बिजली खरीद और मात्रा की स्वीकृति से संबंधित कार्यवाही दर्ज है।

पांच कंपनियां RFQ में हुई थीं योग्य
डॉ. सुंदरम के अनुसार यह कहना सही नहीं है कि बिना प्रतिस्पर्धा के किसी एक कंपनी को काम दिया गया। Request for Quotation (RFQ) चरण में पांच कंपनियां योग्य पाई गई थीं और इसके बाद Request for Proposal (RFP) में भी प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाई गई। अंतिम चयन प्राप्त कुल टैरिफ के आधार पर किया जाना था।
उन्होंने कहा कि 1320 मेगावाट की व्यवस्था राज्य की दीर्घकालिक बेस-लोड आवश्यकता के लिए की गई है, ताकि भविष्य में उपभोक्ताओं को पर्याप्त और भरोसेमंद बिजली मिल सके।
उत्तराखंड में संयंत्र लगाने पर रोक नहीं
संयंत्र उत्तराखंड से बाहर स्थापित किए जाने को लेकर उठे सवाल पर प्रमुख सचिव ने कहा कि राज्य पर्यटन और तीर्थाटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील भी है। ताप विद्युत संयंत्र को बड़ी मात्रा में कोयले की जरूरत होती है और लंबी दूरी तक कोयला लाने से परिवहन लागत बढ़ सकती है। इसलिए संयंत्र देश में किसी उपयुक्त स्थान पर लगाने का विकल्प दिया गया, ताकि ईंधन उपलब्धता और परिवहन लागत को देखते हुए प्रतिस्पर्धी दर मिल सके।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड में संयंत्र स्थापित करने पर कोई रोक नहीं है। कोई कंपनी राज्य में संयंत्र लगाकर प्रतिस्पर्धी दर पर बिजली दे सकती है तो वह भी प्रक्रिया में भाग ले सकती है।
ट्रांसमिशन खर्च पर भी दिया जवाब
दूसरे राज्य में संयंत्र लगने की स्थिति में ट्रांसमिशन लागत उत्तराखंड के उपभोक्ताओं पर पड़ने संबंधी सवाल पर डॉ. सुंदरम ने कहा कि बिजली उत्पादन स्थल से उत्तराखंड तक बिजली पहुंचाने की व्यवस्था और उससे संबंधित लागत निविदा तथा टैरिफ की शर्तों के अनुसार तय होगी। इसलिए यह निष्कर्ष स्वतः नहीं निकाला जा सकता कि संयंत्र बाहर बनने का पूरा अतिरिक्त खर्च उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। वास्तविक वित्तीय प्रभाव कुल बिजली टैरिफ से निर्धारित होगा।
फिक्स्ड चार्ज 70 से 75 प्रतिशत करने पर सफाई
निविदा में फिक्स्ड चार्ज की सीमा 70 से बढ़ाकर 75 प्रतिशत किए जाने पर उन्होंने कहा कि मॉडल बिडिंग डॉक्यूमेंट में फिक्स्ड चार्ज अधिकतम 70 प्रतिशत था, जिससे कम से कम 30 प्रतिशत हिस्सा ईंधन लागत के रूप में रहता था। बोलीदाताओं की वास्तविक लागत, ईंधन उपलब्धता और संभावित परियोजना स्थलों की परिस्थितियों को देखते हुए UPCL ने इसे 75 प्रतिशत तक करने तथा ईंधन लागत को 25 प्रतिशत तक रखने की सुविधा देने का प्रस्ताव किया।
उनके अनुसार बिजली की वास्तविक कीमत का आकलन केवल फिक्स्ड चार्ज से नहीं, बल्कि फिक्स्ड चार्ज और वेरिएबल अथवा फ्यूल कॉस्ट को जोड़कर बनने वाले कुल टैरिफ से होता है। प्रस्ताव का UERC ने परीक्षण किया और उसके बाद मंजूरी दी।
प्रमुख सचिव ने यह भी स्पष्ट किया कि फिक्स्ड चार्ज की सीमा पांच प्रतिशत बढ़ने का अर्थ उपभोक्ताओं पर अपने आप अतिरिक्त बोझ पड़ना नहीं है। वास्तविक भुगतान प्रतिस्पर्धी बोली से सामने आने वाले कुल टैरिफ पर निर्भर करता है।
42 और 48 महीने में दोनों इकाइयां
परियोजना की समयसीमा पर उन्होंने बताया कि 1320 मेगावाट क्षमता चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध होगी। पहली इकाई के लिए 42 महीने और दूसरी के लिए 48 महीने की समयसीमा निर्धारित की गई है। सरकार के अनुसार यह अवधि परियोजना निर्माण की तकनीकी और व्यावहारिक जरूरतों को ध्यान में रखकर तय की गई है।
UJVNL-THDC संयुक्त उद्यम पर भी विचार हुआ
सार्वजनिक क्षेत्र के UJVNL और THDC के संयुक्त उद्यम का विकल्प छोड़ने संबंधी सवाल पर डॉ. सुंदरम ने कहा कि इस विकल्प पर विचार किया गया था। THDC, NTPC की सहायक कंपनी है और उसे NTPC की नीतियों का पालन करना होता है। THDC की मुख्य विशेषज्ञता जल विद्युत और पम्प्ड स्टोरेज परियोजनाओं में है तथा अन्य क्षेत्रों में विस्तार के लिए प्रमोटर स्तर की आवश्यक स्वीकृतियां जरूरी होती हैं। इन परिस्थितियों में प्रस्तावित संयुक्त उद्यम आगे नहीं बढ़ पाया और दीर्घकालिक जरूरत पूरी करने के लिए प्रतिस्पर्धी निविदा का रास्ता अपनाया गया।
₹1.60 से ₹1.66 लाख करोड़ एकमुश्त भुगतान नहीं
प्रमुख सचिव ने 25 वर्षों में करीब 1.60 से 1.66 लाख करोड़ रुपये के संभावित भुगतान को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि यह राशि एकमुश्त भुगतान नहीं, बल्कि पूरे 25 वर्षों में संभावित कुल भुगतान का अनुमान है। राज्य की भविष्य की बिजली आवश्यकता का आकलन केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की Resource Adequacy Study के आधार पर किया गया है।
उनके मुताबिक वास्तविक भुगतान अंतिम टैरिफ, वास्तविक बिजली आपूर्ति, संयंत्र की उपलब्धता और अनुबंध की दूसरी शर्तों पर निर्भर करेगा। 25 वर्ष की अवधि रखने का उद्देश्य राज्य के लिए लंबे समय तक पर्याप्त बेस-लोड बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
नियामक की निगरानी में प्रक्रिया
डॉ. सुंदरम ने कहा कि निविदा के दौरान कंपनियों से मिले सुझावों और आपत्तियों का परीक्षण किया गया तथा RFQ और RFP से संबंधित प्रस्तावित बदलाव UERC के सामने रखे गए। इसलिए इसे केवल विभागीय स्तर पर लिया गया निर्णय नहीं कहा जा सकता। प्रक्रिया में तकनीकी परीक्षण, प्रतिस्पर्धी बोली, वित्तीय मूल्यांकन और नियामकीय स्वीकृति के चरण शामिल रहे हैं।
उन्होंने दोहराया कि 1320 मेगावाट बिजली खरीद का उद्देश्य किसी कंपनी को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की भविष्य की बिजली जरूरत सुरक्षित करना है। अंतिम वित्तीय प्रभाव को भी केवल किसी एक मद के बजाय प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया से निर्धारित कुल टैरिफ और अनुबंध की समग्र शर्तों के आधार पर देखा जाना चाहिए।
