गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को मान्यता देने की मांग
देहरादून, 21 सितम्बर (शास्त्री)। उत्तराखंड लोक भाषा मंच दिल्ली के संयोजक दिनेश ध्यानी ने प्रदेश के भाषा मंत्री खजान दास को ज्ञापन सौंपकर गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं को राज्य स्तर पर मान्यता देने तथा इन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए पहल करने की मांग की है।
भाषा मंत्री को सौंपे ज्ञापन में कहा गया है कि उत्तराखंड की ये तीनों प्रमुख भाषाएं आठ सौ वर्ष से अधिक पुरानी हैं और इनमें साहित्य की विभिन्न विधाओं में निरंतर सृजन होता रहा है। रियासत काल में इनका राजकाज में भी प्रयोग होता था, लेकिन पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी इन्हें अपेक्षित मान्यता और सम्मान नहीं मिल पाया है।
ध्यानी ने मांग की कि राज्य सरकार विधानसभा के आगामी सत्र में प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की संस्तुति करे। इसके साथ ही तीनों भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और साहित्यिक विकास के लिए अलग से गढ़वाली-कुमाऊंनी-जौनसारी भाषा अकादमी गठित की जाए।
ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 345 का उल्लेख करते हुए राज्य सरकार से अपने स्तर पर गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को मान्यता देने की भी मांग की गई है। ध्यानी ने कहा कि आठवीं अनुसूची में शामिल न होने के बावजूद राज्य विधानमंडल कानून बनाकर राज्य में प्रचलित किसी एक या अधिक भाषाओं को राजकीय प्रयोजनों के लिए स्वीकार कर सकता है।
ज्ञापन देने वालों में गढ़वाली भाषा के अध्येता आशीष सुंदरियाल सहित अन्य लोग भी शामिल थे। ध्यानी के अनुसार भाषा मंत्री खजान दास ने प्रतिनिधिमंडल की मांगों पर सकारात्मक विचार करने का आश्वासन दिया।
