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व्यंग्य लेख : तेल का आत्म-बलिदान

-अरुण श्रीवास्तव-

हिंदी व्याकरण में हमें पढ़ाया गया था कि जो बहे उसे पिएं और जो चबाना पड़े उसे खाएं। लेकिन प्रधानमंत्री की अपील ने व्याकरण को ही उलट कर रख दिया। अब तेल सिर्फ कड़ाही में डालकर खाद्य पदार्थ बनाने वाली वस्तु नहीं रही, बल्कि सीधे खाने वाली वस्तु हो गई है। अन्य पदार्थों की तरह इसे परोस सकते हैं। अब यह हमारे घर आए या बुलाए गए मेहमान की इच्छा कि वो तेल ठंडा खाएं या गरम करके। बहरहाल, अब ये उस समय से ‘डाइट’ का हिस्सा बन गई जबसे पीएम मोदी ने इसे कम खाने को कहा और हम सबकी सुविधा के लिए मात्रा भी तय कर दी। ​वैसे देखा जाए तो हम भारतीय तेल ‘पीते’ कब थे? हम तो तेल लगाते थे, कभी सिर पर, कभी नेताओं के तलवों पर। लेकिन सरकार चाहती है कि हम उसे ‘खाना’ कम कर दें। शायद उन्हें डर है कि जनता इतना ज्यादा तेल ‘खा’ रही है कि कहीं भविष्य में इंसान पेट्रोल पंप पर जाकर खड़ा न हो जाए और कहे— “भाई साहब, जरा दो लीटर एक्स्ट्रा वर्जिन सरसों का तेल पेट में डाल देना, आज ऑफिस पैदल जाना है।”
प्रधानमंत्री का यह विजन कितना दूरदर्शी है! यदि हम तेल कम ‘खाएंगे’ तो कोलेस्ट्रॉल कम होगा। जब कोलेस्ट्रॉल कम होगा तो दिल स्वस्थ रहेगा। स्वस्थ दिल ही तो मजबूत अंग है।
बंगाली समाज को तरल पदार्थ खाने का ‘क्रेडिट’ मिलना चाहिए। प्रधानमंत्री के तेल कम खाने की अपील ने तरल पदार्थ खा जाने को राष्ट्रीय मान्यता दिला दी। वर्ना हम हिंदी भाषी उनके तरल पदार्थ खाने की हंसी उड़ाते रहे। जब वे आग्रह करते कि, ‘ज़ोल खाबो’ तो हम बगले झांकने लगते थे। अब वह दिन दूर नहीं जब सिगरेट खाने (बंगाली समाज से क्षमा याचना सहित) को भी मान्यता मिल जाएगी। अब इंतज़ार करिए उस दिन का है जब प्रधानमंत्री जी कहें “मित्रों, आज से हवा भी कम खाइए,” क्योंकि प्रदूषण के इस दौर में हवा भी अब ‘पीने’ लायक नहीं बची, उसे भी फेफड़ों में ‘चबाना’ ही पड़ता है।
टेलीविजन पर प्रधानमंत्री जी ने देशवासियों से “तेल कम खाने” की अपील की, तो मेरे पड़ोस के बाबू मोशाय गद्गद् हो गए। उन्होंने अपनी धोती संभालते हुए कहा, “देखा? मोदी जी भी अब हमारी भाषा बोल रहे हैं। तुम हिंदी भाषी दशकों से हमें मूर्ख समझते रहे। हम तो शुरू से ही जल-तेल सब ‘खाते’ आए हैं, तुम लोग ही उसे ‘पीने’ की जिद पर अड़े थे।” आखिर पीएम ने आईना दिखा दिया न! उन्हें क्या पता ट्रंप की तरह ही वो भी “कभी हां कभी न” के लिए जाने जाते हैं। एक समय वो पकौड़े तलने को भी रोजगार मनवा रहे थे। पकौड़े पर समोसे पर वीरेन डंगवाल की कविता याद आ गई? तेल ज्यादा खाने वाले को देशभक्त न मानने वाले प्रधानमंत्री के कथन के बाद हलवाई की कढ़ाई में खुदुर-बुदुर कर रहे बेचारे समोसे के दिल पर क्या गुज़र रही होगी।
कल ही की बात है एक गुमटी पर सोसायटी के गार्ड को हिराकत की निगाह से देखते हुए बाबू मोशाय ने झ़िड़का… शर्म करो! वहां देश की सीमाओं पर हमारे जवान बिना तेल का उबला खाना खा रहे हैं और तुम यहां समोसे भकोसे जा रहे हो। देश का विदेशी मुद्रा भंडार सुखा रहे हो? एंटी-नेशनल कहीं के!” फेंको नहीं तो बजरंगियों को बुलाता हूं। हमारे प्रदेश में अभी-अभी नये बजरंगी ‘थोक’ में हुए हैं।
कल तक लबालब तेल भरे कड़ाह में खुद-बुदा कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाला समोसा आज़ उसी खुदबुदाहट को ‘व्यवस्था के ख़िलाफ़ मान रहा है कि, अगर वह ज्यादा तेल सोख ले, तो उसे ‘सरकारी खजाने की चोरी’ माना जा सकता है।
पिछले एक-दो दिन से सोसायटी के वॉट्सऐप ग्रुप पर ‘गुड मॉर्निंग’ के बजाय यह संदेश ढकेला (फारवर्ड) जा रहा है “जो देश से करे प्यार, वो पराठे पर तेल लगाए सिर्फ एक बार!” (लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं– एडमिन)

 

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