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78 वर्षों से ‘पेट्रोल-डीजल बचा रहा’ डुमक गांव, सड़क न बनने पर ग्रामीणों का तंज

प्रकाश कपरुवाण की रिपोर्ट –
ज्योतिर्मठ, 18 मई। सीमावर्ती विकासखंड जोशीमठ का दूरस्थ गांव डुमक आजादी के 78 वर्ष बाद भी सड़क संपर्क से नहीं जुड़ पाया है। हाल ही में प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा पेट्रोल-डीजल की बचत को लेकर की गई अपील पर गांव के 73 वर्षीय बुजुर्ग और पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य प्रेम सिंह सनवाल ने तीखे व्यंग्य के साथ अपनी पीड़ा व्यक्त की है।
श्री सनवाल ने कहा कि पेट्रोल-डीजल बचाने की अपील तो अब की जा रही है, जबकि डुमक गांव के ग्रामीण पिछले 78 वर्षों से यह काम कर रहे हैं। गांव के लोग आज भी रोजमर्रा के आवागमन के लिए पैदल चलने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं, गंभीर बीमारों, दुर्घटना में घायल लोगों और प्रसव पीड़ित महिलाओं को भी डंडी-कंडी के सहारे अस्पताल पहुंचाया जाता है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि यह सब भी “पेट्रोल-डीजल बचाने” की मुहिम का ही हिस्सा मान लिया जाए।
उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि इस “बचत अभियान” में उत्तराखंड सरकार का भी बड़ा योगदान है, क्योंकि सड़क निर्माण में लगने वाली मशीनों में भी डीजल का उपयोग होता है और सड़क ही नहीं बनेगी तो डीजल भी नहीं खर्च होगा।
प्रेम सिंह सनवाल का कहना है कि डुमक तक सड़क पहुंचाने के नाम पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में ग्रामीणों ने सड़क निर्माण की मांग को लेकर मतदान बहिष्कार का निर्णय लिया था, जिसे मुख्यमंत्री के आश्वासन के बाद वापस लिया गया। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि अब सड़क निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ेगा, लेकिन अब तक स्थिति जस की तस बनी हुई है।
उन्होंने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि यदि जल्द सड़क निर्माण शुरू नहीं हुआ तो वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव का बहिष्कार ही ग्रामीणों के पास अंतिम विकल्प बचेगा। उन्होंने प्रदेश सरकार और चुनाव आयोग से यह तक कह दिया कि यदि सड़क नहीं बननी है तो 2027 के चुनाव में डुमक गांव के लिए पोलिंग पार्टियां भी न भेजी जाएं। उनके अनुसार इससे भी “पेट्रोल-डीजल बचाने” में मदद मिलेगी।
डुमक सड़क संघर्ष समिति के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह भंडारी ने बताया कि कलगोट गांव से डुमक तक करीब आठ किलोमीटर सड़क का निर्माण होना है। ठेकेदार द्वारा सड़क कटिंग का कार्य शुरू भी किया गया था, लेकिन भुगतान न होने के कारण काम बीच में रोक दिया गया।
भुगतान के अभाव में कार्य रुका हो या फिर प्रशासनिक उदासीनता के कारण, इसका खामियाजा उन ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है जो आजादी के बाद से सड़क सुविधा का इंतजार कर रहे हैं।

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