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शोध ; उत्तराखंड में घटता जा रहा बाल लिंगानुपात

पोखरी, 18 जून (राणा)। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय नागनाथ पोखरी के भूगोल विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राजेश भट्ट ने अपने लघु शोध अध्ययन में उत्तराखंड में घटते बाल लिंगानुपात को भविष्य के सामाजिक संतुलन के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है। उन्होंने कहा कि जनगणना के आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि आने वाले वर्षों में विवाह योग्य युवाओं के बीच संतुलन प्रभावित हो सकता है।

डॉ. भट्ट के अनुसार वर्ष 2001 की जनगणना में 0 से 6 वर्ष आयु वर्ग में 7,12,675 लड़कों के मुकाबले 6,47,357 लड़कियां दर्ज की गई थीं। यानी इस आयु वर्ग में करीब 65 हजार लड़कियां कम थीं। उस समय दर्ज बच्चे वर्तमान में 24 से 30 वर्ष की आयु के बीच पहुंच चुके हैं और अधिकांश विवाह योग्य हो चुके हैं। ऐसे में विवाह संबंध स्थापित करने की चुनौती अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगी है।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2011 की जनगणना में भी स्थिति चिंताजनक रही। 0 से 6 वर्ष आयु वर्ग में 7,68,414 लड़कों के मुकाबले लगभग 6,83,779 लड़कियां दर्ज की गईं, जिससे करीब 84,635 लड़कियों की कमी सामने आई। प्रति 1000 लड़कों पर मात्र 890 लड़कियां दर्ज होना बाल लिंगानुपात में असंतुलन का संकेत है। इस आयु वर्ग के बच्चे अब 14 से 20 वर्ष की आयु में पहुंच चुके हैं और आगामी वर्षों में विवाह योग्य वर्ग में शामिल होंगे। डॉ. भट्ट ने बताया कि वर्ष 2001 में अल्मोड़ा, बागेश्वर, चमोली, चंपावत, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, टिहरी और उत्तरकाशी जैसे पर्वतीय जिलों का औसत बाल लिंगानुपात लगभग 948 था, जो वर्ष 2011 में घटकर करीब 892 रह गया। वहीं देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों का औसत बाल लिंगानुपात 2001 में लगभग 910 तथा 2011 में 889 दर्ज किया गया।

उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर होने के बावजूद रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और बेहतर जीवन अवसरों की तलाश में युवतियों तथा उनके परिवारों का झुकाव मैदानी क्षेत्रों की ओर बढ़ रहा है। इसका सीधा प्रभाव पहाड़ों में विवाह संबंधों पर पड़ रहा है और अनेक युवकों के लिए उपयुक्त जीवनसाथी तलाशना कठिन होता जा रहा है।
डॉ. भट्ट ने कहा कि यह केवल जनसंख्या का नहीं, बल्कि सामाजिक भविष्य का विषय है। महिला शिक्षा को बढ़ावा देने, रोजगार के अवसर सृजित करने, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करने तथा लिंगानुपात सुधारने की दिशा में प्रभावी कदम उठाना समय की मांग है।

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