उत्तराखंड में भर्ती घोटाले : संगति मची च गंद मंद..

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दिनेश शास्त्री
आज स्व. चारु चंद्र चंदोला बहुत याद आ रहे हैं। श्रीनगर में पढ़ाई के दौरान उनका काव्य संग्रह आया था। नाम था – “कुछ नहीं होगा”। ये चार दशक पहले की बात है। संग्रह की कविता तत्कालीन व्यवस्था का यथार्थ था। समय बदला लेकिन व्यवस्था नहीं। आज भी सबकुछ यथावत है। कविता के शब्दों पर जाएं तो लगभग यही भाव था कि – मेरे भाई, तुम्हारे और मेरे बदलने से कुछ नहीं होगा, जब तक ये व्यवस्था नहीं बदलती, तब तक कुछ नहीं होगा। सचमुच आज भी कुछ नहीं बदला है। तब भी योग्य लोग पिछड़ जाते थे और करीबी लोग लाभान्वित हो जाते थे, आज भी वही सब तो हो रहा है। विधानसभा में बैकडोर भर्तियां क्या इसका प्रमाण नहीं है? बेशर्मी यह कि कोई दलील दे रहा है कि मैने अपने बेटे बहू को द्वितीय श्रेणी अधिकारी बनाया तो उसकी सजा जनता ने मुझे चुनाव में दे दी है तो कोई कह रहा है कि सब कुछ नियमानुसार हुआ है। मैंने ही नहीं सबने अपने अपने लोग लगाए हैं। विडंबना यह कि इस तरह की बात करते हुए न किसी को उनका जमीर धिक्कारता है, न जुबान कांपती है और न किसी तरह का अफसोस ही दिखता है। इस स्थिति में उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग को लोग अगर सगे संबंधी चयन आयोग कहने लगे हैं तो आश्चर्य कैसा? हां यहां सगे संबंधियों के साथ बोली भी लगी है।
पहले बात विधानसभा बैकडोर कैडर की पूरी कर ली जाए, यहां जांच और आंच की बहुत ज्यादा उम्मीद न ही करें तो बेहतर रहेगा। कारण एक नहीं अनेक हैं। संघ के पदाधिकारियों के परिजन लाभान्वित हुए तो सीएम के निजी स्टाफ, मंत्री के पीए तो होने ही थे, मीडिया के लोग कहां और क्यों पीछे रहते। बहती गंगा में सबने हाथ धोने का पुण्य अर्जित किया है। क्या संघ पदाधिकारी सीबीआई की जांच करवाना चाहेंगे?
कहा जा रहा है कि इस समय जनरल खंडूड़ी की बेटी स्पीकर हैं और वे किसी को बख्शेंगी नहीं। मान लेने में हर्ज भी नहीं है किंतु जब तक सचमुच ऐसा हो नहीं जाता, संशय तो बना ही रहेगा।
लाख टके का सवाल यह है कि जब हाकम जैसे लोग अरबों का वारा न्यारा करते हैं तो इसी तरह के पश्चिमी बंगाल की तरह सीबीआई और ईडी उत्तराखंड का रास्ता क्यों भूल जाती है। तर्क दिया जा सकता है कि या तो राज्य सरकार मांग करे या अदालत आदेश करे, तभी इस तरह की जांच होगी, तो 15 अगस्त को बीते ज्यादा दिन भी नहीं हुए हैं, जब प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से देश को भरोसा दिया था कि भ्रष्टाचार  का खात्मा किया जायेगा।  फिर तो पूछा ही जाएगा कि उत्तराखंड का रास्ता किसी ने रोका है क्या? और यदि किसी ने रोका है तो उसे बेनकाब करने का वक्त आ गया है। यह नहीं भूलना चाहिए कि इस साल हुआ विधानसभा चुनाव मोदी जी आपके नाम पर ही लड़ा गया था और उत्तराखंड की जनता ने आप पर भरोसा कर दोबारा आपको प्रचंड बहुमत दे दिया, तो क्या यह अपेक्षा अनुचित है कि खुद प्रधानमंत्री तंद्रा त्याग कर हस्तक्षेप करें और सीबीआई जांच के लिए कहें। अगर ऐसा नहीं होता है तो बाबा केदारनाथ के चरणों से उत्तराखंड को अगले दशक का स्वप्न दिखाने का औचित्य ही खत्म हो जाएगा। जाहिर है प्रदेश के लोग भरोसा करना बंद कर सकते हैं।
मौजूदा हालत को देख गढ़वाली के प्रसिद्ध कवि गजेंद्र नौटियाल की एक चर्चित कविता की ये पंक्तियां बरबस याद आती हैं –
“जैकु जखि मु आई छंद, वखी मचे गि गंद मंद।”
वजह एक हो तो गिनाई जाए, देवभूमि को घोटालाभूमि बनाने का जो अपराध आज सतह पर दिख रहा है, उसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। नई बात यह सामने आई है कि 2017 के विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने से मात्र कुछ दिन पहले उत्तराखंड राज्य भंडारण निगम में भी नियम विरुद्ध 39 भर्तियां अपनों की कर दी गई लेकिन तब सरकार बदलने के बाद भी क्या हुआ? आज छह साल बाद खुलासा हो रहा है। याद है न तब सरकार किसकी थी? सरकार बदली तो घपले घोटाले का शोर मचा कर सत्ता में आने वालों ने सिर्फ जीरो टॉलरेंस का जुमला फेंकने के अलावा किया क्या? अगर कुछ किया होता तो युवा सड़क पर क्यों होते?
कुंजवाल जी ने कहा कि मैंने योग्य बेरोजगारों को नौकरी दी। बड़े बुजुर्ग हैं, उनकी बात मान लेते हैं क्योंकि उन्होंने सफाई दी है कि काम तो उन्होंने ठीक किया था, बस जरा नैतिक रूप से गलत कदम था। लेकिन इस बात की गारंटी क्या है कि कुंजवाल और अग्रवाल ने जो भर्तियां की, वे सब काबिल लोग थे। अभी मुख्यमंत्री कार्यालय से विधानसभा अध्यक्ष को एक पत्र भेजा गया कि विधानसभा में जो नियुक्तियां की गई हैं, उनकी जांच कराई जाए, इस पत्र पर तारीख एक अगस्त टाइप की गई। फिर उसे काट कर हाथ से एक सितंबर किया गया है, संदेह होता है कि बैकडोर कैडर की पहुंच सीएम दफ्तर तक तो नहीं हो गई है? कम से कम सीएम दफ्तर से तो उम्मीद की ही जाती है कि वहां ठीकठाक लोग भर्ती होंगे, बैकडोर कैडर अगर वहां भी काबिज है तो राम ही रखवाला है।
सवाल कई हैं, किंतु जवाब अनुत्तरित है। विपक्ष सीबीआई जांच की मांग कर रहा है, बेरोजगार युवा भी यही मांग कर रहे हैं। इस बीच पड़ोसी हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां पर विपक्ष उत्तराखंड में सरकारी नौकरियों में धांधली का मुद्दा जरूर उठाएगा, बताइए कीमत किसको चुकानी होगी? समझ रहे हैं न आप? कुल मिलाकर स्थिति बेहद नाजुक है। देवभूमि में कई लोक देवता बलि लेते हैं, कई स्थानों पर आज भी यह परम्परा विद्यमान है। फिर कौन जानता है कि भर्तियों का मामला किसी की बलि नहीं लेगा। इस खतरे को भी ध्यान में रखना चाहिए। फिर 2024 भी तो सामने ही है, क्या तब तक लोग भूल जायेंगे? कदापि नहीं। यकीन मानिए यह मामला जल्द खत्म होने वाला नहीं है, अगर आप अपने वर्तमान के लिए भविष्य को कुर्बान करने पर आमादा हों, तो मर्जी आपकी है।
चलते चलते एक बात और कहना चाहूंगा। मुझे उत्तराखंड के इतिहास के अध्येता तथा चिंतक डा. योगेश धस्माना के इस कथन से असहमति का कोई कारण नहीं दिखता कि “भर्ती के तमाम मामलों की निष्पक्ष जांच के लिए उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाए, यह नितांत जरूरी है।” बेशक विधानसभा को निलंबित रखा जाए और समयबद्ध तरीके से जांच निष्कर्ष तक पहुंचाने के बाद विधानसभा बहाल कर दी जाए।
डा. धस्माना मानते हैं कि
उत्तराखंड में भर्ती घोटाले की निष्पक्ष जाँच के लिए सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों के नेतृत्व में विधानसभा को अनिश्चित काल के लिए निलंबित कर राष्ट्रपति शासन लगाया जाए। इससे दोषी, राजनीति और नौकरीशाहों के गठजोड़ पर शिकंजा कसा जा सकता है। राज्य में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता को समाप्त करने के लिए क्या आप भी राष्ट्रपति शासन को जरूरी समझते हैं ? पाठक इस पर अपनी राय दें। आपकी प्रतिक्रिया का हमें इंतजार रहेगा।

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