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नई प्रकाश-संचालित नैनो तकनीक से दवाओं और रसायनों का उत्पादन होगा अधिक स्वच्छ और सस्ता

A plasmonic nanocomposite composed of gold and palladium nanoparticles, in conjunction with a BODIPY chromophore, was synthesized and explored as an efficient photocatalyst for Suzuki coupling reactions. The unique plasmon–molecule interactions arising from the electronic coupling between gold nanoparticles and the BODIPY chromophore, along with the well-established catalytic activity of palladium, greatly enhance the catalytic efficiency of this nanocomposite. Moreover, their synergistic effect enabled the transformation to proceed under mild, environmentally benign reaction conditions, offering a promising approach for sustainable, energy-efficient catalytic processes.

 

-ज्योति रावत – 

दुनियाभर में औद्योगिक उत्पादन के दौरान बढ़ते प्रदूषण, भारी ऊर्जा खपत और जहरीले रसायनों के उपयोग को कम करना आज बड़ी चुनौती बन चुका है। विशेष रूप से दवाओं और औद्योगिक रसायनों के निर्माण में ऐसे विलायकों (सॉल्वेंट्स) और प्रक्रियाओं का इस्तेमाल होता है, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक माने जाते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने एक नई प्रकाश-संचालित नैनो-उत्प्रेरक तकनीक विकसित की है, जो रासायनिक उत्पादन प्रक्रियाओं को अधिक स्वच्छ, ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण अनुकूल बना सकती है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत मोहाली स्थित नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी) के शोधकर्ताओं की टीम ने सोने (गोल्ड) और पैलेडियम नैनोकणों के साथ बीओडीपीआई (BODIPY) नामक प्रकाश-अवशोषित अणु को मिलाकर एक विशेष नैनो-कंपोजिट तैयार किया है। यह नैनोमैटेरियल प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके रासायनिक अभिक्रियाओं को तेज और अधिक प्रभावी बनाता है। इससे पारंपरिक औद्योगिक प्रक्रियाओं की तुलना में कम ऊर्जा खर्च होती है और जहरीले रसायनों की आवश्यकता भी घट जाती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह नई तकनीक रासायनिक अभिक्रियाओं को चलाने के लिए अत्यधिक तापमान या ऊर्जा-गहन प्रक्रियाओं पर निर्भर नहीं रहती। इसके बजाय यह प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करती है, जिससे पूरी प्रक्रिया अधिक टिकाऊ और किफायती बन जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक औषधि उद्योग, पेट्रोकेमिकल्स, विशेष रसायनों और हरित विनिर्माण (ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग) के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है।

प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नैनोस्केल में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, विकसित नैनोमैटेरियल तीन प्रमुख घटकों — सोना, बीओडीपीआई और पैलेडियम — से मिलकर बना है। इसमें सोने के नैनोकण प्रकाश ऊर्जा को तेजी से अवशोषित करते हैं। इसके बाद यह ऊर्जा बीओडीपीआई अणु तक पहुंचती है और अंततः सक्रिय उत्प्रेरक पैलेडियम को स्थानांतरित हो जाती है। पैलेडियम इस ऊर्जा का उपयोग रासायनिक प्रतिक्रियाओं को अधिक कुशलता से संचालित करने में करता है।

इस पूरी प्रक्रिया की खास बात यह है कि इसमें ऊर्जा की खपत काफी कम हो जाती है। पारंपरिक रासायनिक प्रक्रियाओं में जहां अत्यधिक गर्मी और जहरीले विलायकों की जरूरत पड़ती है, वहीं यह नई तकनीक कम तापमान और अधिक सुरक्षित परिस्थितियों में काम कर सकती है। शोधकर्ताओं ने बताया कि इस प्रणाली में हानिकारक सॉल्वेंट्स के स्थान पर पानी जैसे सुरक्षित माध्यमों का उपयोग संभव है, जो इसे पर्यावरण के लिए अधिक अनुकूल बनाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, तीन अलग-अलग घटकों को एक ही नैनो प्रणाली में संयोजित करने से उत्प्रेरक की क्षमता और स्थायित्व दोनों में सुधार हुआ है। इससे रासायनिक अभिक्रियाएं अधिक तेजी और बेहतर दक्षता से पूरी हो सकती हैं। साथ ही यह तकनीक लंबे समय तक प्रभावी बनी रहती है, जिससे औद्योगिक लागत में भी कमी आ सकती है।

दुनिया भर में “ग्रीन केमिस्ट्री” यानी पर्यावरण-अनुकूल रसायन विज्ञान पर तेजी से काम हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी ऐसी तकनीकों को बढ़ावा दे रही हैं, जो कार्बन उत्सर्जन और औद्योगिक प्रदूषण को कम कर सकें। ऐसे समय में भारतीय वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

इस शोध का नेतृत्व करने वाले डॉ. प्रकाश पी. नीलकंदन का कहना है कि यह तकनीक भविष्य में दवाओं और औद्योगिक रसायनों के उत्पादन को अधिक स्वच्छ, सुरक्षित और कम खर्चीला बना सकती है। इससे न केवल ऊर्जा की बचत होगी, बल्कि पर्यावरण प्रदूषण में भी कमी आएगी। साथ ही कम लागत पर हरित उत्पादों के निर्माण का रास्ता भी खुलेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक का बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग शुरू होता है, तो यह रसायन उद्योग में एक बड़ा परिवर्तन ला सकती है। इससे उत्पादन प्रक्रियाएं अधिक टिकाऊ बनेंगी और उद्योगों को पर्यावरणीय नियमों का पालन करने में भी मदद मिलेगी।

भारतीय वैज्ञानिकों की यह नई उपलब्धि इस बात का संकेत है कि भविष्य की औद्योगिक तकनीकें केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि ऊर्जा बचत, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास को भी समान महत्व देंगी।

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प्रकाशन लिंक: 10.1039/D5NR04898B 

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