वरदान/सम्मान / पुरस्कार देने के कुछ दिलचस्प प्रसंग 

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-गोविंद प्रसाद बहुगुणा

वरदान मांगने के प्रसंग हमारे धार्मिक ग्रंथों में भरे पड़े हैं , लेकिन इस बहुप्रचलित प्रथा का सदुपयोग कम और दुरुपयोग अधिक हुआ है । केवल असमर्थ लोगों ने ही वरदान की याचना नहीं की बल्कि सर्वसमर्थ लोगों ने भी वरदान मांगे जबकि उनको इसकी जरूरत भी नहीं थी I गरीब लोगों को वरदान दिए जाने के मामले बहुत ही कम हैं लेकिन उसके विपरीत समर्थ लोगों को वरदान दिए जाने के अनेकों उदहारण हैं I अपवाद स्वरूप एक दो उदाहरण ऐसे भी हैं जहाँ समर्थ लोगों ने वरदान देने वाले व्यक्ति के प्रति अपना सम्मान प्रदर्शित करने और सौहार्द बनाये रखने के लिहाज से वरदान मांगने की केवल औपचारिकता निभाई है उनमें श्रीकृष्ण द्वारा मांगे गये और उनको दिए गये वरदान शामिल है क्योंकि श्रीकृष्ण और शिव एक ही लेवल के देवता थे I

महाभारत के अनुशासन पर्व के अंंतर्गत एक प्रसंग है कि श्री कृष्ण ने शिव – पार्वती दोनों से, एक नहीं बल्कि 8-8 वरदान की फरमाइश कर डाली I
श्रीकृष्ण के मांगपत्र में ८ मांगे इस प्रकार थी –
धर्मं दृढत्वं युधि शत्रुघातं यशतस्थाग्रयं परमं बलं च।
योगाप्रियत्वं तव संन्निकर्षं वृणं सुतानां च शतं शतानि।।
धर्म में मेरी स्थिति दृढतापूर्वक बनी रहे , युद्ध में शत्रुओं का संहार करने की क्षमता बढ़े ,श्रेष्ठ यश, उत्तम बल, योगबल मुझे प्राप्त होते रहें , मैँ सबका प्रिय बना रहूँ , आपका सान्निध्य मुझे सदैव प्राप्त होता रहे तथा मेरे दस हजार पुत्र हों ।'”
जब शंकर जी ने अपनी सहर्ष स्वीकृति प्रदान करते हुए “एवमस्तु” कह दिया , तब पार्वती जी ने भी विनोद में कह दिया कि- हम से भी कुछ मांग लो I पार्वती जी से मांगे गए वरदान में ये 8 मांगें सम्मिलित थी –

द्विजेष्वकोपं पित्रित:प्रसादं
शतं सुतानां परमं च भोगम्।
कुले प्रीतिं मात्रितश्च प्रसादं
शमप्राप्तिं प्रवृणे चापि दाक्ष्यम्।।
” ब्राह्मणों पर कभी मेरे मन में क्रोध न हो, मेरे पिता मुझ पर प्रसन्न रहें, मुझे सैकडों पुत्र प्राप्त हों , उत्तम भोग सदा उपलब्ध होते रहें, हमारे कुल में प्रसन्नता बनी रहे , मेरी माता भी प्रसन्न रहे, मुझे शांति मिले और प्रत्येक कार्य में मुझे कुशलता प्राप्त हो-ये आठ वर मुझे दीजिये ।
पार्वती जी प्रसन्न होकर बोली कि ठीक है-
एवं भविष्यत्वमरप्रभाव
नाहं मृषा जातु वदे कदाचित ।
भार्यासहस्राणि च षोडशैव
तासुं प्रियत्वं च तथाक्षयं च।।
प्रीति चाग्राह्यां बान्धवानां सकाशाद्
ददामि ते$हं वपुषःकाम्यतां च ।
भोक्ष्यन्ते सप्तर्ति वै शतानि
गृहे तुभ्यंमतिथीनां च नित्यम्।। …
पार्वती जी द्वारा दिये वरदानों में सबसे दिलचस्प वरदान मुझे यह लगा कि- तुम्हारे घर रोज ही खूब सारे मेहमान आते रहें- “गृहे तुभ्यंमतिथीनां च नित्यम्।”
इस पूरे प्रकरण में एक ख़ास बात नोट करने लायक मुझे यह लगी कि

उस जमाने में भी सामर्थ्यशाली लोगों को ही तमाम सम्मान, पुरस्कार और वरदान मिलते रहे , जैसे कि आजकल मिलते हैं – सरकार और सेठों की संस्थाएं सर्वसमर्थ लोगों को ही सम्मान पुरस्कार देते हैं उससे उनको व्यापारिक और राजनीतिक लाभ दोनों होते हैं I सम्मान के असली हकदार बहुत से कलाकार लेखक और समाजसेवक़ बिना पुरस्कार पाए इस संसार से बिदा हो जाते हैं I मरणोपरांत यदि कोई सम्मान उन्हें दिया भी जाता है , तो वह किस लेखे !
GPB

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