उत्तराखंड में हेलीकॉप्टर हादसे : सुरक्षित उड़ानों के लिए जवाबदेही और निगरानी जरूरी
बदरीनाथ के निकट छह लोगों की मौत ने फिर उठाए सवाल; प्रतिकूल मौसम में उड़ान की अनुमति, सुरक्षा मानकों और हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप हवाई सेवाओं की समीक्षा आवश्यक

— वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली
उत्तराखंड में लगातार हो रही हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं केवल तकनीकी खराबी या पायलट की गलती तक सीमित नहीं मानी जा सकतीं। ये राज्य में नागरिक उड्डयन सेवाओं की निगरानी, सुरक्षा मानकों और विभिन्न स्तरों पर जवाबदेही की व्यवस्था पर गंभीर विचार करने की आवश्यकता भी सामने लाती हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पास राज्य के नागरिक उड्डयन विभाग का दायित्व भी है। ऐसे में 30 अक्टूबर को बदरीनाथ से देहरादून लौट रहे हेलीकॉप्टर की दुर्घटना में छह लोगों की मृत्यु के बाद यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि राज्य सरकार सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कराए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस पहल करे।
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां हवाई सेवाओं के संचालन को विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। ऊंचे पर्वत, संकरी घाटियां, अचानक बदलता मौसम और सीमित दृश्यता उड़ानों के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। ऐसे में नागरिक उड्डयन विभाग सहित संबंधित नियामक संस्थाओं और संचालक कंपनियों के बीच प्रभावी समन्वय अत्यंत आवश्यक है। मुख्यमंत्री के पास अनेक विभागों की जिम्मेदारी होने के कारण नागरिक उड्डयन जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विशेषज्ञ स्तर पर सतत निगरानी और स्पष्ट उत्तरदायित्व की व्यवस्था और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को बदरीनाथ से देहरादून के लिए उड़ान भरने वाला हेलीकॉप्टर ज्योतिर्मठ के निकट चाईं गांव क्षेत्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसमें पायलट सहित छह लोगों की मृत्यु हो गई। पांच यात्री कर्नाटक के बताए गए। दुर्घटना के दिन और उससे पहले चमोली जिले में मौसम लगातार खराब था। मौसम विभाग ने नारंगी चेतावनी जारी की थी। बारिश, धुंध और दृश्यता कम होने की परिस्थितियों के बीच हेलीकॉप्टर सेवाएं संचालित हो रही थीं।
बताया गया कि दोपहर लगभग सवा बारह बजे उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। उसका संचार संपर्क भी टूट गया था। ऐसी परिस्थितियों में यह जानना आवश्यक है कि उड़ान से पहले मौसम और दृश्यता का आकलन किस प्रकार किया गया था। क्या मौसम संबंधी चेतावनियों को उड़ान संचालन के निर्णय में पर्याप्त महत्व दिया गया? इन प्रश्नों के उत्तर निष्पक्ष तकनीकी जांच से ही मिल सकते हैं।
दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर का संचालन करने वाली ट्रांस भारत एविएशन की अन्य उड़ानों पर बाद में रोक लगाए जाने की जानकारी सामने आई। लेकिन किसी दुर्घटना के बाद की कार्रवाई के साथ यह देखना भी जरूरी है कि ऐसी घटनाओं को रोकने की पूर्व व्यवस्था कितनी प्रभावी है। मौसम संबंधी जानकारी, उड़ान संचालन की मानक प्रक्रिया, पायलट के निर्णय और संबंधित नियामक संस्थाओं की भूमिका का समग्र परीक्षण होना चाहिए।
यह तर्क दिया जा सकता है कि उसी दिन अन्य हेलीकॉप्टर सुरक्षित उड़ान भरते रहे। लेकिन कुछ उड़ानों का सुरक्षित पूरा होना प्रत्येक उड़ान की परिस्थितियों को समान नहीं बना देता। प्रत्येक उड़ान के समय मौसम, दृश्यता, मार्ग और तकनीकी स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए सुरक्षा संबंधी निर्णयों का मूल्यांकन निर्धारित मानकों और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए।
हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं का खतरा केवल उसमें बैठे यात्रियों तक सीमित नहीं रहता। दुर्घटनाग्रस्त विमान जहां गिरता है, वहां रहने वाले लोगों, पशुओं, मकानों, खेतों और अन्य संपत्तियों को भी नुकसान पहुंच सकता है। इस दुर्घटना में हेलीकॉप्टर के टुकड़े जिस क्षेत्र में बिखरे, वहां यदि ग्रामीण या बच्चे मौजूद होते तो परिणाम और भी भयावह हो सकते थे। ऐसी दुर्घटनाओं से प्रभावित स्थानीय निवासियों की क्षतिपूर्ति के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था आवश्यक है।
इस दुर्घटना के बाद एक इंजन और दो इंजन वाले हेलीकॉप्टरों की सुरक्षा का प्रश्न भी उठा है। सामान्यतः एक इंजन वाले हेलीकॉप्टरों का परिचालन खर्च अपेक्षाकृत कम होता है, जबकि दो इंजन वाले हेलीकॉप्टर अधिक महंगे हो सकते हैं। हालांकि केवल इंजनों की संख्या से सुरक्षा निर्धारित नहीं होती। तकनीकी क्षमता, रखरखाव, पायलट का प्रशिक्षण, मौसम और उड़ान मार्ग भी महत्वपूर्ण हैं। फिर भी उच्च हिमालयी क्षेत्रों में किस श्रेणी के हेलीकॉप्टरों का संचालन उपयुक्त है, इसकी विशेषज्ञ समीक्षा उपयोगी होगी।
उत्तराखंड में हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं का इतिहास भी चिंताजनक है। जुलाई 2025 में राज्यसभा में दी गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच देश में दर्ज 12 हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं में सात उत्तराखंड में हुई थीं। इन दुर्घटनाओं में देशभर में हुई 30 मौतों में से 21 उत्तराखंड में दर्ज की गई थीं। ये आंकड़े राज्य में हवाई सेवाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा करते हैं। हालांकि इनके आधार पर प्रति उड़ान दुर्घटना की दर निर्धारित नहीं की जा सकती। इसके लिए कुल उड़ानों और उड़ान घंटों के तुलनात्मक आंकड़े भी आवश्यक हैं।
अक्टूबर 2026 की दुर्घटना इन आंकड़ों के बाद हुई है। इसलिए राज्य में हेलीकॉप्टर संचालन की सुरक्षा का नए सिरे से व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए। जांच का उद्देश्य किसी एक संस्था या व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना नहीं, बल्कि उन सभी परिस्थितियों और व्यवस्थागत कमियों की पहचान करना होना चाहिए जिनसे दुर्घटना की आशंका बढ़ती है।
विश्लेषक अनूप नौटियाल ने भी उत्तराखंड में हेलीकॉप्टर संचालन की बढ़ती गतिविधियों पर सवाल उठाए हैं। उनका प्रश्न महत्वपूर्ण है कि तीर्थाटन और पर्यटन के विस्तार के साथ क्या सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं का विकास भी उसी गति से हो रहा है? राज्य में पर्यटन की बढ़ती संभावनाओं के बीच यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
हवाई सेवाओं का विस्तार निश्चित रूप से पर्यटन, तीर्थाटन और दुर्गम क्षेत्रों की संपर्क सुविधाओं के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके साथ तकनीकी निरीक्षण, मौसम संबंधी सुविधाओं, प्रशिक्षित कर्मचारियों और आपातकालीन बचाव व्यवस्था में भी निरंतर निवेश जरूरी है। पत्रकार राहुल कोठियाल भी पूर्व में हेलीकॉप्टर सेवाओं से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठा चुके हैं। ऐसी चिंताओं को सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
हेलीकॉप्टर संचालन से जुड़ा एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी है। चारधाम यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में होने वाली उड़ानों से वन्यजीवों, जैव विविधता, हिमनदों और शांत पर्वतीय क्षेत्रों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है। लगभग एक दशक पहले भी इन प्रभावों को लेकर सवाल उठाए गए थे। अब इन विषयों पर व्यापक और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध अध्ययन उपयोगी होंगे।
चारधाम की मौसमी हेलीकॉप्टर सेवाओं के साथ राज्य के अन्य क्षेत्रों में संचालित और प्रस्तावित हवाई सेवाओं के लिए भी हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप कठोर सुरक्षा मानक निर्धारित किए जाने चाहिए। प्रतिकूल मौसम में उड़ान स्थगित करने की स्पष्ट व्यवस्था, स्वतंत्र तकनीकी निरीक्षण, पायलटों का विशेष प्रशिक्षण और आपातकालीन बचाव की तैयारियां इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
प्रत्येक दुर्घटना की जांच के निष्कर्ष और उनके आधार पर किए गए सुधार सार्वजनिक होने चाहिए। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय, उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण तथा संबंधित संचालक कंपनियों के बीच जिम्मेदारियों और समन्वय की व्यवस्था स्पष्ट एवं प्रभावी होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री के पास नागरिक उड्डयन विभाग का दायित्व होने से राज्य स्तर पर सुरक्षा सुधारों को गति देने का अवसर भी उपलब्ध है। हिमालय में हवाई सेवाओं का विस्तार तभी सार्थक और टिकाऊ विकास माना जाएगा, जब यात्रियों की सुरक्षा, स्थानीय समुदायों के हित और पर्वतीय पर्यावरण का संरक्षण उसके केंद्र में होंगे। (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

