ब्लॉगशिक्षा/साहित्य

हिंदी कोई स्थिर और बंद संरचना नहीं है

 

उषा रावत

भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं है। वह मनुष्य की स्मृति, संवेदना, अनुभव, ज्ञान और संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने वाली जीवंत धारा है। किसी भाषा को समझना वास्तव में उस समाज के इतिहास, उसकी जीवन-पद्धति, संघर्षों, सपनों और सामूहिक चेतना को समझना है। इसलिए भाषा का प्रश्न केवल व्याकरण या शब्दावली का प्रश्न नहीं, बल्कि मनुष्य और उसकी पहचान से जुड़ा प्रश्न है।

हिंदी दिवस के अवसर पर जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं, तो हमें सबसे पहले यह समझना चाहिए कि हिंदी कोई स्थिर और बंद संरचना नहीं है। कोई भी भाषा एक दिन में नहीं बनती। वह सैकड़ों वर्षों में स्थानीय परिस्थितियों, सामाजिक संपर्क, व्यापार, यात्राओं, प्रवास, शासन, साहित्य और जनजीवन के बीच विकसित होती है। इस दीर्घ यात्रा में वह निरंतर बदलती रहती है। कुछ शब्द धीरे-धीरे अप्रचलित होकर पीछे छूट जाते हैं और नए शब्द उसके शब्द-संसार में प्रवेश करते हैं। यही भाषा का स्वाभाविक जीवन है।

हिंदी का इतिहास स्वयं इस परिवर्तनशीलता का प्रमाण है। उसके विकास में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, विभिन्न लोकबोलियों और अनेक भारतीय भाषाओं की परंपराओं का योगदान रहा है। अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के संपर्क ने भी हिंदी की शब्द-संपदा को प्रभावित किया। हिंदी ने इन प्रभावों को केवल सहन नहीं किया, बल्कि अपनी प्रकृति और आवश्यकता के अनुरूप उन्हें आत्मसात किया। यही कारण है कि हिंदी आज करोड़ों लोगों के जीवन में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।

भाषा की शक्ति उसकी शुद्धता में नहीं, उसकी जीवंतता में होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि भाषा की प्राचीनता, परंपरा या साहित्यिक विरासत का कोई महत्व नहीं है। इसके विपरीत, किसी भाषा की जड़ों को जानना उसके वर्तमान को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है। पुराने शब्द, मुहावरे, लोकगीत, कहावतें और साहित्य हमारी सामूहिक स्मृति के अभिन्न हिस्से हैं। उनका संरक्षण होना चाहिए। लेकिन संरक्षण का अर्थ यह नहीं हो सकता कि भाषा को समय के साथ बदलने से रोक दिया जाए। नदी को जीवित रखने के लिए उसके प्रवाह को रोकना नहीं, उसे बहने देना पड़ता है।

भाषाएँ भी नदियों की तरह होती हैं।

वे रास्ते में अनेक धाराओं से मिलती हैं, अपना रंग और स्वर बदलती हैं और आगे बढ़ती रहती हैं। आव्रजन और सामाजिक संपर्क भाषा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले लोग साथ रहते हैं, तो उनके बीच केवल व्यापार या सामाजिक संबंध ही नहीं बनते, बल्कि शब्दों और उच्चारणों का भी आदान-प्रदान होता है। समय के साथ शब्दों के अर्थ बदलते हैं, उच्चारण बदलते हैं और कभी-कभी नई बोलियाँ जन्म लेती हैं। इसे भाषा की कमजोरी नहीं, उसकी रचनात्मक क्षमता समझना चाहिए। इसीलिए किसी भाषा के बदलते उच्चारण या उसमें आए नए शब्दों को देखकर घबराने के बजाय हमें यह देखना चाहिए कि समाज किस दिशा में बदल रहा है। भाषा समाज का दर्पण होती है। समाज बदलेगा तो भाषा भी बदलेगी। भाषा को समाज से अलग करके संरक्षित नहीं किया जा सकता।

 

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