Grinding Poverty’ इसी को कहते हैं !

–गोविंद प्रसाद बहुगुणा
वर्ष 1995 में गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला भारत आए थे। उस समय पी. वी. नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री और डॉ. शंकर दयाल शर्मा राष्ट्रपति थे।
गणतंत्र दिवस समारोह के बाद उनके स्वागत में आयोजित एक अनौपचारिक मेल-मिलाप के दौरान दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध अपने लंबे संघर्ष और गरीबी की पीड़ा का उल्लेख करते हुए मंडेला ने कहा था—
“Massive poverty and obscene inequality are such terrible scourges of our times… that they have to rank alongside slavery and apartheid as social evils.”
अर्थात व्यापक गरीबी और असहनीय आर्थिक असमानता हमारे समय की ऐसी भयानक सामाजिक बुराइयां हैं, जिन्हें गुलामी और रंगभेद जैसी कुरीतियों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
गरीबी की यही स्थिति अंग्रेजी में ‘Grinding Poverty’ कहलाती है—ऐसी गरीबी, जो मनुष्य को केवल आर्थिक रूप से कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे भीतर तक पीसती चली जाती है।
मंडेला के इस कथन को पढ़कर मेरे मन में विद्यार्थी जीवन में पढ़े भोजप्रबंध का एक प्रसंग ताजा हो गया। उसमें एक निर्धन कवि राजा भोज के सामने अपनी गरीबी का वर्णन इस आशा से करता है कि शायद उसकी दयनीय दशा सुनकर राजा का हृदय पिघल जाए और उसे कुछ सहायता मिल सके।
कवि कहता है—
“क्षुत्क्षामाः शिशवः शवा इव भृशं मन्दाशया बान्धवाः,
लिम्पन्तीव दृशं मुखानि करुणैर्दैन्यातिरेकैरिह।”
इस श्लोक में घोर गरीबी, भूख और विवशता का अत्यंत मार्मिक चित्र उपस्थित होता है। भूख से क्षीण बच्चे शवों की तरह निस्तेज दिखाई दे रहे हैं। परिवार के लोग और सगे-संबंधी निराश और हताश हैं। उनके चेहरों पर ऐसी दीनता छाई है कि मानो जीवन की सारी आशा ही समाप्त हो गई हो।
कवि अपनी विपन्नता का वर्णन आगे और भी मार्मिक ढंग से करता है। घर के टूटे-फूटे बर्तनों को लाख लगाकर जोड़कर किसी तरह काम चलाया जा रहा है। इस अभाव और दरिद्रता का भी उसे उतना दुःख नहीं है। उसकी सबसे बड़ी पीड़ा कुछ और है।
वह कहता है कि जब फटे हुए वस्त्रों को सिलने के लिए उसकी पत्नी के पास सुई तक नहीं होती और वह सुई मांगने गांव की दूसरी स्त्रियों के पास जाती है, तो वे उसकी निर्धनता देखकर मंद-मंद मुस्कुराती हैं। किसी के चेहरे पर उपेक्षा है तो किसी पर झुंझलाहट। पत्नी को इस तरह अपमानित होते देखना ही वह पीड़ा है, जो उसे भीतर तक मार डालती है।
शताब्दियों के अंतराल पर कही गई इन दोनों बातों के संदर्भ भिन्न हैं, लेकिन पीड़ा का मूल स्वर एक ही है। गरीबी केवल पेट की भूख या धन के अभाव का नाम नहीं है। उसकी सबसे कठोर चोट तब महसूस होती है, जब अभाव मनुष्य की गरिमा और आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने लगता है।
