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ऐसे भी जज हुए, ब्रूमफील्ड जैसे

 

–गोविंद प्रसाद  बहुगुणा-
आज मुझे एक ऐसे न्यायाधीश की याद आ गई, जिसने ब्रिटिश राज के सबसे चर्चित मुकदमों में से एक में न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठकर भी अभियुक्त के व्यक्तित्व और नैतिक कद को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं किया। उनका नाम था जस्टिस सी. एन. ब्रूमफील्ड, आईसीएस, डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज, अहमदाबाद।
यह मुकदमा महात्मा गांधी के विरुद्ध 1922 में चला था। असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था। इसी बीच 5 फरवरी 1922 को गोरखपुर के निकट चौरीचौरा में आंदोलनकारियों की भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गांधीजी इस हिंसा से इतने व्यथित हुए कि उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय कर लिया।


ब्रिटिश सरकार ने इसके कुछ ही समय बाद गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया। उनके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए के तहत राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। अभियोजन का आधार मुख्यतः उनके अखबार ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित वे लेख थे, जिनमें उन्होंने ब्रिटिश शासन की तीखी आलोचना की थी और उसके प्रति असहयोग को अपना नैतिक कर्तव्य बताया था।
18 मार्च 1922 को अहमदाबाद की अदालत में गांधीजी ने आरोपों से बचने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए न्यायाधीश से कहा कि यदि यह कानून अपराध मानता है तो उन्हें कठोरतम दंड दिया जाए। उन्होंने ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष पैदा करने को अपना कर्तव्य बताते हुए यह भी स्पष्ट किया कि उनका रास्ता अहिंसा का है।
अब फैसला जस्टिस ब्रूमफील्ड को सुनाना था।
उन्होंने गांधीजी को छह वर्ष के साधारण कारावास की सजा सुनाई, लेकिन फैसला सुनाते समय उनके शब्द एक औपनिवेशिक अदालत के सामान्य फैसले से बिल्कुल अलग थे। उन्होंने स्वीकार किया कि कानून की दृष्टि में उन्हें गांधीजी को उसी तरह देखना है जैसे किसी अन्य अभियुक्त को, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज करना असंभव है कि उनके सामने खड़ा व्यक्ति सामान्य अभियुक्त नहीं है।
ब्रूमफील्ड ने कहा कि गांधीजी उन लोगों से बिल्कुल अलग श्रेणी के व्यक्ति हैं जिनका उन्होंने कभी मुकदमा सुना था या भविष्य में सुनने की संभावना थी। लाखों भारतीय उन्हें महान देशभक्त और नेता मानते हैं। यहां तक कि जो लोग उनकी राजनीति से असहमत हैं, वे भी उन्हें ऊंचे आदर्शों और महान जीवन वाला व्यक्ति मानते हैं।
न्यायाधीश ने गांधीजी की अहिंसा के प्रति प्रतिबद्धता का भी उल्लेख किया। वे जानते थे कि जिस व्यक्ति को राजद्रोह के अपराध में सजा दी जा रही है, उसी व्यक्ति ने हिंसा का लगातार विरोध किया है।
फिर ब्रूमफील्ड ने एक असाधारण बात कही। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यदि भविष्य में परिस्थितियां ऐसी बनें कि सरकार गांधीजी की सजा कम करे और उन्हें रिहा करे तो उनसे अधिक प्रसन्न कोई नहीं होगा।
एक ब्रिटिश न्यायाधीश के मुंह से अपने ही साम्राज्य के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के लिए ऐसे शब्द उस मुकदमे को इतिहास में विशिष्ट बना देते हैं।
गांधीजी ने भी न्यायाधीश के प्रति कटुता नहीं दिखाई। अदालत में अभियुक्त और न्यायाधीश राजनीतिक व्यवस्था के दो विपरीत छोर पर खड़े थे—एक ब्रिटिश साम्राज्य के कानून का प्रतिनिधि था और दूसरा उसी साम्राज्य के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष का नेतृत्व कर रहा था। फिर भी दोनों के बीच मर्यादा और पारस्परिक सम्मान बना रहा।
यही उस ऐतिहासिक मुकदमे की सबसे बड़ी विशेषता थी।
न्यायाधीश ने कानून के अनुसार सजा सुनाई, लेकिन जिस व्यक्ति को सजा दी, उसके नैतिक व्यक्तित्व को छोटा करने का प्रयास नहीं किया। असहमति और न्यायिक कर्तव्य के बीच भी मानवीय गरिमा के लिए जगह बची रही।
शायद इसीलिए इतिहास में कुछ फैसले केवल उनकी सजा के लिए नहीं, बल्कि उन्हें सुनाने वाले न्यायाधीश के शब्दों के लिए भी याद रखे जाते हैं।
— जीपीबी

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