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आपदा प्रबंधन में विज्ञान के साथ पारंपरिक ज्ञान का समावेश जरूरी

देहरादून, 11 जून। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम), गृह मंत्रालय, भारत सरकार तथा उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) के संयुक्त तत्वावधान में मानसून पूर्व तैयारियों पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का गुरुवार को यूएसडीएमए भवन में शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में विभिन्न विभागों, जिला प्रशासन, आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों तथा तकनीकी विशेषज्ञों ने प्रतिभाग किया।

मुख्य अतिथि राज्य आपदा प्रबंधन सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष लेफ्टिनेंट कर्नल रघुवीर सिंह भंडारी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि केवल सरकारी तंत्र ही नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक को आपदाओं का सामना करने के लिए सक्षम बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रथम प्रतिक्रियादाता के रूप में प्रत्येक नागरिक को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाना समय की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक पद्धतियों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण और उपयोग भी किया जाना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने वर्षों के अनुभव के आधार पर मौसम, भू-संरचना, जल स्रोतों और प्राकृतिक संकेतों को समझने की विशिष्ट क्षमता विकसित की है। यह पारंपरिक ज्ञान कई बार संभावित आपदाओं का पूर्व आकलन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

ले. कर्नल भंडारी ने कहा कि ग्राम स्तर पर आपदा जोखिम न्यूनीकरण गतिविधियों को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है। ग्राम प्रधानों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, स्वयं सहायता समूहों, युवक मंगल दलों, महिला मंगल दलों और स्वयंसेवी संगठनों को आपदा प्रबंधन प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए। स्थानीय नेतृत्व की भागीदारी से आपदा के समय त्वरित और प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित होती है।

अपने सैन्य अनुभवों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उत्तराखंड एक सैन्य बाहुल्य प्रदेश है और यहां बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक निवास करते हैं। आपात परिस्थितियों में कार्य करने का उनका अनुभव, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और संसाधन प्रबंधन की दक्षता आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

इस अवसर पर सचिव, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास, विनोद कुमार सुमन ने कहा कि प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को और अधिक सशक्त बनाना तथा अधिकारियों को आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम विकास, नवाचारों और सर्वोत्तम प्रथाओं से अवगत कराना है। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन एक बहु-विभागीय विषय है, इसलिए सभी विभागों के बीच स्पष्ट संवाद, समन्वित कार्यप्रणाली और जिम्मेदारियों की स्पष्ट समझ आवश्यक है। किसी भी आपदा के दौरान कार्यों में दोहराव से बचने के लिए भूमिकाओं और दायित्वों का पूर्व निर्धारण जरूरी है।

अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (प्रशासन) प्रकाश चंद्र ने बताया कि दो दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान पूर्व चेतावनी प्रणाली और उसके अंतिम छोर तक प्रभावी प्रसार, जोखिम मूल्यांकन, बाढ़ प्रबंधन, शहरी बाढ़ की चुनौतियां, संवेदनशील समुदायों की सुरक्षा, इंसिडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम, निकासी योजना, स्वास्थ्य क्षेत्र की तैयारी, जलवायु परिवर्तन जनित जोखिम, उभरती तकनीकों का उपयोग, बहु-एजेंसी समन्वय, त्वरित क्षति आकलन तथा पोस्ट डिजास्टर नीड्स असेसमेंट जैसे विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत व्याख्यान और चर्चा की जाएगी।

अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (क्रियान्वयन) एवं डीआईजी राजकुमार नेगी ने बताया कि यूएसडीएमए द्वारा मानसून को देखते हुए सभी जनपदों और रेखीय विभागों के साथ निरंतर समन्वय स्थापित किया जा रहा है। राज्य, जनपद और तहसील स्तर पर नियमित समीक्षा बैठकें आयोजित की जा रही हैं तथा संवेदनशील क्षेत्रों की विशेष निगरानी की जा रही है।

कार्यक्रम में एनआईडीएम के प्रो. नवनीत कुमार, जेसीईओ मो. ओबैदुल्लाह अंसारी, असिस्टेंट प्रोफेसर रोहित कुमार, यूएलएमएमसी के निदेशक डॉ. शांतनु सरकार सहित सेना, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, पुलिस तथा अन्य विभागों के अधिकारी और विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

खतरे वाले स्थानों को नो-सेल्फी जोन घोषित करने पर जोर

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान सचिव विनोद कुमार सुमन ने नदी-नालों, झरनों, गहरी खाइयों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में रील्स और सेल्फी बनाने के बढ़ते चलन पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता की होड़ में लोग अपनी सुरक्षा को नजरअंदाज कर रहे हैं, जिससे दुर्घटनाओं की घटनाएं बढ़ रही हैं।

उन्होंने सभी जिलों को ऐसे संवेदनशील और दुर्घटना संभावित स्थलों की पहचान कर उन्हें ‘नो-सेल्फी जोन’ घोषित करने के निर्देश दिए। साथ ही चेतावनी बोर्ड, बैरिकेडिंग और अन्य सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने पर बल दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि सुरक्षित स्थानों को ‘सेल्फी सेफ जोन’ के रूप में भी विकसित किया जाए, ताकि लोग प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेते हुए सुरक्षित वातावरण में फोटो और वीडियो बना सकें।

अर्ली वार्निंग सिस्टम की भूमिका पर चर्चा

एनआईडीएम के प्रोफेसर डॉ. नवनीत कुमार ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हुई है, जिससे जोखिम पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है। उन्होंने प्रतिभागियों को सैटेलाइट आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक की जानकारी देते हुए बताया कि इसके माध्यम से दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों की निगरानी तथा सूचनाओं का संग्रहण अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

उन्होंने अर्ली वार्निंग सिस्टम की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समय पर प्राप्त चेतावनियां जनहानि और संपत्ति के नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती हैं। उन्होंने प्रतिभागियों को सचेत ऐप, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) की वेबसाइट पर उपलब्ध रियल टाइम मौसम संबंधी सूचनाओं तथा दामिनी ऐप के उपयोग की जानकारी भी दी।

यूएलएमएमसी के निदेशक डॉ. शांतनु सरकार ने भूस्खलन न्यूनीकरण के लिए किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विभिन्न संस्थान भूस्खलन पूर्वानुमान प्रणाली विकसित करने की दिशा में कार्य कर रहे हैं और निकट भविष्य में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने की उम्मीद है।

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