प्रधान के इस्तीफे से थमा छात्र आंदोलन, लेकिन परीक्षा सुधार की बहस अभी बाकी

–उषा रावत–
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद देशभर में पिछले कई दिनों से चल रहा छात्र आंदोलन फिलहाल समाप्त हो गया है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सीजेपी (कॉमन जॉइंट प्लेटफॉर्म) ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा तो कर दी है, लेकिन साथ ही सरकार को परीक्षा सुधारों से संबंधित एक विस्तृत चार्टर भी सौंप दिया है। इससे स्पष्ट है कि छात्रों का संघर्ष केवल किसी एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी जड़ देश की परीक्षा प्रणाली में लगातार सामने आ रही कमियों और युवाओं के घटते विश्वास से जुड़ी है।
छात्र संगठनों का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, परिणामों में देरी और भर्ती प्रक्रियाओं के वर्षों तक लंबित रहने जैसी समस्याओं ने करोड़ों युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया है। ऐसे में मंत्री का इस्तीफा एक राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी तय करने की दिशा में कदम माना जा सकता है, लेकिन इससे मूल समस्याओं का समाधान स्वतः नहीं हो जाएगा।
केवल इस्तीफा नहीं, व्यवस्था परिवर्तन की मांग
आंदोलन के दौरान छात्रों ने लगातार यह तर्क दिया कि परीक्षा प्रणाली में सुधार के बिना केवल जिम्मेदार व्यक्तियों को बदलने से स्थिति नहीं सुधरेगी। यही कारण है कि आंदोलन समाप्त करते समय सीजेपी ने सरकार के समक्ष परीक्षा सुधारों का विस्तृत चार्टर रखा है।
चार्टर में परीक्षा संचालन की पारदर्शिता बढ़ाने, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए अत्याधुनिक तकनीक अपनाने, समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया, परीक्षा कैलेंडर को कानूनी आधार देने, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई तथा अभ्यर्थियों को उचित मुआवजा जैसी मांगों को प्रमुखता दी गई है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि इन सुझावों पर गंभीरता से अमल किया जाता है तो प्रतियोगी परीक्षाओं में युवाओं का भरोसा दोबारा स्थापित किया जा सकता है।
युवाओं का बढ़ता असंतोष बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा
पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय स्तर से लेकर विभिन्न राज्यों तक अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। कई परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं, जबकि अनेक मामलों की जांच केंद्रीय एजेंसियों तक पहुंची। इससे लाखों अभ्यर्थियों का समय, आर्थिक संसाधन और मानसिक संतुलन प्रभावित हुआ।
यही कारण है कि इस बार छात्र आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन भी मिला। सोशल मीडिया ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और विभिन्न राज्यों के अभ्यर्थी एक साझा मंच पर आए। इससे यह स्पष्ट हुआ कि परीक्षा सुधार अब केवल छात्रों का मुद्दा नहीं, बल्कि सुशासन और प्रशासनिक विश्वसनीयता का भी प्रश्न बन चुका है।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
सरकार के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती आंदोलन समाप्त कराना नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली में वास्तविक सुधार लागू करना है। यदि सुधारों पर शीघ्र और प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में फिर इसी प्रकार के आंदोलन खड़े हो सकते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वतंत्र परीक्षा नियामक व्यवस्था, आधुनिक डिजिटल सुरक्षा प्रणाली, साइबर निगरानी तथा प्रश्नपत्र तैयार करने और वितरण की पूरी प्रक्रिया में तकनीकी पारदर्शिता समय की आवश्यकता बन चुकी है।
संसद में भी बनेगा प्रमुख मुद्दा
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि में संसद का आगामी सत्र भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विपक्ष सरकार से परीक्षा प्रणाली की विफलताओं पर जवाब मांग सकता है, जबकि सरकार सुधारों की रूपरेखा प्रस्तुत कर अपनी प्रतिबद्धता दिखाने का प्रयास करेगी।
यदि संसद में इस विषय पर सकारात्मक चर्चा होती है और सभी दल परीक्षा सुधारों पर सहमति बनाते हैं, तो यह देश की भर्ती एवं परीक्षा प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।
सवाल व्यवस्था परिवर्तन का है
छात्र संगठनों ने आंदोलन समाप्त अवश्य किया है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि चार्टर की मांगों पर निर्धारित समय में ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे दोबारा आंदोलन शुरू करने का अधिकार सुरक्षित रखेंगे।
कुल मिलाकर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तत्कालीन राजनीतिक संकट को कम करने में सहायक रहा है, परंतु इससे कहीं बड़ा प्रश्न देश की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता का है। आने वाले समय में सरकार की सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि वह केवल नेतृत्व परिवर्तन तक सीमित रहती है या परीक्षा व्यवस्था में ऐसे स्थायी सुधार करती है, जिससे करोड़ों युवाओं का विश्वास पुनः स्थापित हो सके। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी है।
