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कारगिल : हिमालय की चोटियों की रणभूमि में हिमालय जैसे हौसले

This article of veteran journalist and author Jay Singh Rawat. portrays the Kargil War not merely as India’s military victory but as a testament to the extraordinary courage displayed in one of the world’s highest active battlefields. It highlights the extreme terrain, harsh weather, and formidable challenges overcome by Indian soldiers during Operation Vijay. The article also underscores Uttarakhand’s unmatched sacrifice, with the highest number of martyrs from any state, and pays tribute to the bravery of the Indian Army. It concludes that Kargil Vijay Diwas is not just a celebration of victory, but a solemn reminder of the supreme sacrifice, patriotism, and unwavering spirit that continue to safeguard India’s sovereignty. -Admin

 

— जयसिंह रावत

26 जुलाई 1999। भारतीय सैन्य इतिहास का वह गौरवपूर्ण दिन, जब लगभग दो महीने तक चले भीषण संघर्ष के बाद भारत ने कारगिल की बर्फीली चोटियों से पाकिस्तानी घुसपैठियों को पूरी तरह खदेड़कर “ऑपरेशन विजय” की सफलता की घोषणा की। यह केवल एक युद्ध की समाप्ति नहीं थी, बल्कि यह उस अदम्य इच्छाशक्ति की विजय थी जिसने दुनिया को दिखा दिया कि भारतीय सैनिकों के हौसलों से ऊँचा कोई पर्वत नहीं हो सकता।

कारगिल युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह विश्व के सबसे ऊँचे सक्रिय रणक्षेत्रों में से एक में लड़ा गया। द्रास, कारगिल, बटालिक, टोलोलिंग, टाइगर हिल और आसपास की चोटियाँ समुद्र तल से लगभग 16,000 से 18,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित हैं। इस ऊँचाई पर ऑक्सीजन सामान्य से लगभग 40 से 50 प्रतिशत कम होती है। तापमान कई बार शून्य से 15 से 20 डिग्री सेल्सियस नीचे पहुँच जाता है, जबकि तेज़ बर्फीली हवाएँ और दुर्गम चट्टानें सैनिकों की शारीरिक क्षमता की कठिन परीक्षा लेती हैं। ऐसे वातावरण में सामान्य व्यक्ति के लिए कुछ मिनट चलना भी कठिन होता है, लेकिन भारतीय सैनिकों ने इन्हीं परिस्थितियों में युद्ध लड़कर विजय प्राप्त की।

जब भूगोल भी दुश्मन के पक्ष में था

सैन्य विज्ञान का एक मूल सिद्धांत है कि ऊँचाई पर बैठे सैनिक को निर्णायक सामरिक बढ़त मिलती है। कारगिल में यही सबसे बड़ी चुनौती थी। पाकिस्तान की उत्तरी लाइट इन्फैंट्री (एनएलआई) के सैनिकों और उनके साथ मौजूद घुसपैठियों ने नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय क्षेत्र की अनेक ऊँची चोटियों पर कब्ज़ा जमा लिया था। वहाँ से वे राष्ट्रीय राजमार्ग श्रीनगर–लेह (तत्कालीन एनएच-1ए) पर निगरानी रख सकते थे और भारतीय सेना की रसद व्यवस्था को बाधित करने की कोशिश कर रहे थे।

भारतीय सैनिकों को नीचे घाटियों से लगभग सीधी, 70 से 80 डिग्री तक की बर्फीली ढलानों पर चढ़ाई करनी पड़ी। कई स्थानों पर यह चढ़ाई रात के अंधेरे में की गई ताकि दुश्मन की नज़र से बचा जा सके। पीठ पर 20 से 30 किलोग्राम का सैन्य साजो-सामान, हाथों में हथियार, कम ऑक्सीजन और ऊपर से हो रही गोलीबारी—इन परिस्थितियों में आगे बढ़ना किसी असंभव अभियान से कम नहीं था। फिर भी भारतीय जवानों ने दुश्मन के मजबूत बंकरों तक पहुँचकर उन्हें ध्वस्त किया और एक-एक कर सभी प्रमुख चोटियों पर तिरंगा फिर से लहरा दिया।

ऑपरेशन विजय: साहस और रणनीति का अद्भुत संगम

मई 1999 में घुसपैठ का पता चलने के बाद भारत ने “ऑपरेशन विजय” शुरू किया। भारतीय थलसेना के साथ भारतीय वायुसेना ने “ऑपरेशन सफेद सागर” के माध्यम से महत्वपूर्ण हवाई सहायता प्रदान की। लगभग 60 दिनों तक चले अभियान में हजारों सैनिकों ने दिन-रात दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में संघर्ष किया।

भारत ने न केवल अपनी सभी प्रमुख चौकियाँ पुनः प्राप्त कीं, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस युद्ध ने भारतीय सेना की पेशेवर क्षमता, समन्वय और दृढ़ संकल्प को पूरी दुनिया के सामने स्थापित किया।

भारतीय वीरता की अमर गाथा

कारगिल युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों के 527 सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया और 1,300 से अधिक जवान घायल हुए। प्रत्येक शहीद ने अपने प्राणों की आहुति देकर यह संदेश दिया कि राष्ट्र की रक्षा से बड़ा कोई कर्तव्य नहीं होता।परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा का उद्घोष—”ये दिल मांगे मोर”—आज भी भारतीय युवाओं में उत्साह भर देता है। लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय, ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव और राइफलमैन संजय कुमार की वीरता भारतीय सैन्य इतिहास के स्वर्णिम अध्याय हैं। इन वीरों ने यह सिद्ध कर दिया कि विजय केवल हथियारों से नहीं, बल्कि अदम्य साहस, नेतृत्व और बलिदान की भावना से प्राप्त होती है।

उत्तराखंड ने दिया सबसे बड़ा बलिदान

कारगिल विजय की गाथा उत्तराखंड का उल्लेख किए बिना अधूरी रहेगी। पूरे देश के 527 शहीदों में सर्वाधिक 75 वीर सपूत उत्तराखंड के थे। सैनिक आबादी के अनुपात से यह योगदान देश में सबसे अधिक माना जाता है। राज्य के लगभग हर जिले ने इस युद्ध में अपने बेटे खोए।

यह कोई संयोग नहीं था। उत्तराखंड की धरती सदियों से वीर सैनिकों की जन्मभूमि रही है। गढ़वाल राइफल्स और कुमाऊँ रेजिमेंट की गौरवशाली परंपरा ने भारतीय सेना को ऐसे योद्धा दिए, जिनके लिए दुर्गम पर्वत कोई बाधा नहीं बल्कि कर्तव्य का मार्ग थे।

गढ़वाल राइफल्स के जवानों ने “बद्री विशाल लाल की जय” के उद्घोष के साथ अनेक कठिन अभियानों में भाग लिया, जबकि कुमाऊँ रेजिमेंट के सैनिकों ने “कालिका माता की जय” के जयघोष के साथ दुश्मन की मजबूत चौकियों पर निर्णायक हमले किए। इन रेजिमेंटों के अनेक अधिकारियों और जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया तथा अनेक वीरता पदकों से सम्मानित हुए।

उत्तराखंड के इन अमर शहीदों में कई ऐसे युवा थे जिनकी आयु 20 से 25 वर्ष के बीच थी। कोई अपनी नई-नई शादी के बाद मोर्चे पर लौटा था, तो कोई अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। लेकिन जब राष्ट्र की रक्षा का प्रश्न सामने आया, तो उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख-दुख से ऊपर उठकर देश को सर्वोपरि माना।

युद्ध जिसने भारत को बदल दिया

कारगिल युद्ध केवल एक सैन्य विजय नहीं था। इस संघर्ष के बाद भारत ने अपनी सीमाई सुरक्षा, खुफिया तंत्र, निगरानी व्यवस्था, पर्वतीय युद्ध क्षमता और रक्षा तैयारियों में व्यापक सुधार किए। ऊँचाई वाले क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे के विकास, आधुनिक निगरानी उपकरणों और सैन्य समन्वय पर विशेष बल दिया गया। इस युद्ध से मिले अनुभव आज भी भारतीय सेना के प्रशिक्षण और रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

विजय दिवस का वास्तविक अर्थ

कारगिल विजय दिवस केवल परेड, समारोह और श्रद्धांजलि का अवसर नहीं है। यह उन परिवारों के त्याग को स्मरण करने का दिन है, जिन्होंने अपने बेटे, पति, भाई और पिता को राष्ट्र की रक्षा के लिए खो दिया। यह उन सैनिकों के साहस को नमन करने का दिन है, जिन्होंने यह साबित किया कि देश की रक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण से होती है।

आज भी जब द्रास की वादियों में हवा बहती है, टाइगर हिल की चोटी पर तिरंगा लहराता है या टोलोलिंग की चट्टानों पर सूर्य की पहली किरण पड़ती है, तो ऐसा लगता है मानो उन अमर वीरों की गाथा हिमालय स्वयं सुना रहा हो। वे शहीद हमारे बीच भले ही नहीं हैं, लेकिन उनका साहस भारतीय सैनिकों की हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनकर जीवित है।

विश्व के सबसे ऊँचे रणक्षेत्र में भारत ने केवल अपनी भूमि ही वापस नहीं जीती थी, बल्कि पूरी दुनिया को यह भी बता दिया था कि भारतीय सैनिकों के हौसले किसी भी पर्वत से ऊँचे हैं। यही कारगिल की सबसे बड़ी विरासत है और यही कारगिल विजय दिवस का सबसे बड़ा संदेश।

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