लद्दाख को भी मिलेगा अनुच्छेद 371 का दर्जा : प्रधानमंत्री मोदी करेंगे दौरा
नई दिल्ली/लेह, 30 अगस्त। केंद्र सरकार लद्दाख के लिए संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत विशेष प्रावधानों वाला एक अलग संवैधानिक ढांचा तैयार करने के अंतिम चरण में है। केंद्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा है कि प्रस्तावित व्यवस्था को अंतिम रूप देने का काम गृह मंत्रालय कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लद्दाख का दौरा कर प्रस्तावित व्यवस्था पर वहां के लोगों के साथ अपने विचार साझा करेंगे। हालांकि प्रधानमंत्री के दौरे की तारीख अभी घोषित नहीं की गई है।
रिजिजू ने लेह जिले के शे स्थित ड्रुक पद्मा कार्पो स्कूल के रजत जयंती समारोह में कहा कि मौजूदा स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषदों और दूसरी व्यवस्थाओं के पास पर्याप्त अधिकार नहीं हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने लद्दाख को अनुच्छेद 371 के तहत विशेष संवैधानिक प्रावधान देने की जो प्रतिबद्धता जताई थी, उसे अब प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में ठोस स्वरूप दिया जा रहा है।
अनुच्छेद 370 से अलग होगी व्यवस्था
प्रस्तावित व्यवस्था को अनुच्छेद 370 की वापसी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को 2019 तक विशेष संवैधानिक दर्जा और व्यापक स्वायत्तता हासिल थी। इसके विपरीत अनुच्छेद 371 तथा 371ए से 371जे तक के प्रावधान देश के विभिन्न राज्यों की विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विशेष सुरक्षा प्रदान करते हैं।
लद्दाख के लिए इसी आधार पर एक विशिष्ट मॉडल तैयार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य वहां की जनजातीय भूमि, पर्यावरण, संस्कृति, परंपरागत रीति-रिवाज और स्थानीय लोगों के रोजगार के अधिकारों को संवैधानिक सुरक्षा देना है। फिलहाल संकेत यही हैं कि केंद्र न तो लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने जा रहा है और न ही उसे सीधे संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव है। इसके स्थान पर अनुच्छेद 371 के तहत लद्दाख की परिस्थितियों के अनुरूप अलग व्यवस्था विकसित की जा रही है।
सात जिलों के लिए सात परिषदों का प्रस्ताव
रिजिजू के अनुसार लद्दाख में पहले केवल लेह और कारगिल दो जिले थे, लेकिन अब जिलों की संख्या सात हो गई है। नई व्यवस्था में सातों जिलों के लिए परिषदों की परिकल्पना की गई है। केंद्र का तर्क है कि इससे स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक भागीदारी और प्रशासनिक अधिकार मजबूत होंगे।
दरअसल 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। उसके बाद से वहां जमीन, सरकारी नौकरियों, जनजातीय पहचान, पर्यावरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर संवैधानिक सुरक्षा की मांग लगातार उठती रही है। लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस इस आंदोलन के प्रमुख मंच रहे हैं। दोनों संगठनों की प्रमुख मांगों में पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के तहत संरक्षण शामिल रहा है। मार्च 2026 में भी इन मांगों को लेकर लेह और कारगिल में बड़ी रैलियां हुई थीं।
बातचीत में मई में आया था महत्वपूर्ण मोड़
इस पूरे घटनाक्रम में 22 मई 2026 की बातचीत महत्वपूर्ण रही। केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच अनुच्छेद 371 की तर्ज पर संवैधानिक सुरक्षा को लेकर सैद्धांतिक सहमति बनी थी। बाद में गृह मंत्रालय की संशोधित कार्यवाही में प्रस्तावित निर्वाचित निकाय को उसके अधिकार क्षेत्र के विषयों में अधिकारियों पर नियंत्रण और पर्यवेक्षण देने की बात भी दर्ज की गई।
प्रस्तावित व्यवस्था का अंतिम स्वरूप अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि भूमि और नौकरियों पर स्थानीय लोगों को कितनी ठोस सुरक्षा मिलेगी, प्रस्तावित निर्वाचित संस्था के पास वास्तविक विधायी और वित्तीय अधिकार कितने होंगे तथा सात जिला परिषदों और केंद्र शासित प्रदेश स्तर की संस्था के बीच शक्तियों का बंटवारा किस प्रकार होगा।
लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस के प्रतिनिधियों की गृह मंत्रालय के साथ अगली बातचीत सितंबर में नई दिल्ली में प्रस्तावित है। यदि वहां संवैधानिक ढांचे पर सहमति बनती है तो 2019 में लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद यह उसकी शासन व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक हो सकता है।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण तथ्य: इसी बीच लद्दाख में जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय की पीठ की बैठक के लिए भी नया कानूनी प्रावधान किया गया है। 27 अगस्त को जारी Union Territory of Ladakh (Sitting of Bench of the High Court of Jammu & Kashmir and Ladakh in Ladakh) Regulation, 2026 लद्दाख में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और खंडपीठों की बैठक का कानूनी आधार तैयार करता है।
