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क्या दूसरे ग्रहों के एलियन पृथ्वी तक पहुंच सकते हैं? भौतिकी कहती है—यह इतना आसान नहीं होगा !

कॉल जेम्स –

22 मई 2026 को अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने अवर्गीकृत (डीक्लासिफाइड) तस्वीरों और वीडियो का एक नया संग्रह जारी किया, जिनमें कुछ ऐसी उड़ती वस्तुएं दिखाई देती हैं जिनकी पहचान स्पष्ट नहीं हो सकी है। इन दस्तावेजों ने एक बार फिर एलियन जीवन और अंतरतारकीय (इंटरस्टेलर) यात्रा को लेकर लोगों की जिज्ञासा बढ़ा दी है। लेकिन यदि यह मान भी लिया जाए कि कहीं बुद्धिमान एलियन सभ्यताएं मौजूद हैं, तो क्या वे वास्तव में पृथ्वी तक पहुंच सकती हैं? भौतिकी का उत्तर है—यह अत्यंत कठिन होगा।
हमारे सौरमंडल में अभी तक किसी एलियन जीवन का कोई प्रमाण नहीं मिला है। इसलिए यदि कोई बाह्य-ग्रहीय आगंतुक पृथ्वी तक आएगा, तो उसे किसी दूसरे तारामंडल से आना होगा। सूर्य के सबसे निकट स्थित तारा प्रॉक्सिमा सेंटॉरी लगभग 4.25 प्रकाश-वर्ष दूर है। चूंकि ब्रह्मांड के केवल एक छोटे हिस्से में ही बुद्धिमान जीवन होने की संभावना मानी जाती है, इसलिए यदि कहीं एलियन सभ्यता है भी, तो वह संभवतः प्रॉक्सिमा सेंटॉरी से भी कहीं अधिक दूर होगी।
समस्या यह है कि कोई भी वस्तु प्रकाश की गति से अधिक गति प्राप्त नहीं कर सकती। प्रकाश की गति लगभग 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड है। हालांकि उससे काफी पहले ही इंजीनियरिंग संबंधी चुनौतियां सामने आने लगती हैं। ईंधन की सीमाएं और संरचनात्मक क्षति का जोखिम किसी अंतरिक्ष यान की गति को सीमित कर देते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार अंतरतारकीय यात्रा के लिए लगभग 30,000 किलोमीटर प्रति सेकंड, यानी प्रकाश की गति का लगभग 10 प्रतिशत, एक व्यावहारिक क्रूज़ गति मानी जाती है। इस गति पर 10 प्रकाश-वर्ष की दूरी तय करने में लगभग 100 वर्ष लग जाएंगे।
अंतरतारकीय अंतरिक्ष में वातावरण नहीं होता, इसलिए वहां वायु प्रतिरोध (ड्रैग) नहीं है। एक बार यान अपनी क्रूज़ गति प्राप्त कर ले, तो वह बिना अतिरिक्त ऊर्जा खर्च किए आगे बढ़ सकता है। लेकिन यही स्थिति एक नई समस्या भी पैदा करती है—उसे धीमा करने के लिए भी कोई प्राकृतिक माध्यम नहीं होता। इसलिए किसी भी यान को गति बढ़ाने और घटाने, दोनों की व्यवस्था रखनी होगी।
एक प्रस्तावित तकनीक में शक्तिशाली लेज़र किरणों से एक विशाल परावर्तक पाल (सेल) को धक्का देकर यान को आगे बढ़ाया जाता है। इस विधि में यान को ईंधन साथ ले जाने की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन ऐसे लेज़र को चलाने के लिए अत्यधिक ऊर्जा चाहिए और यह प्रणाली यान को धीमा करने का कोई सरल उपाय भी नहीं देती।
अधिक व्यावहारिक विकल्प रॉकेट प्रणोदन (रॉकेट प्रोपल्शन) है। रॉकेट तेज गति से गैसों को बाहर निकालकर आगे बढ़ते हैं। आवश्यकता पड़ने पर इन्हीं गैसों की दिशा बदलकर यान को धीमा भी किया जा सकता है। किंतु इतनी लंबी यात्रा के लिए रासायनिक रॉकेटों को इतना अधिक ईंधन चाहिए होगा कि उसका भार पूरे ब्रह्मांड में उपलब्ध पदार्थ से भी अधिक हो सकता है।
सैद्धांतिक रूप से प्रतिपदार्थ (एंटीमैटर) सबसे प्रभावी ईंधन है। जब एंटीमैटर सामान्य पदार्थ से टकराता है, तो दोनों पूरी तरह ऊर्जा में बदल जाते हैं। इससे प्रकाश की गति के दसवें हिस्से तक पहुंचने के लिए अपेक्षाकृत कम ईंधन की आवश्यकता पड़ सकती है। लेकिन एंटीमैटर अत्यंत अस्थिर होता है और आज तक वैज्ञानिक इसकी केवल अत्यल्प मात्रा ही बना पाए हैं।
नाभिकीय संलयन (न्यूक्लियर फ्यूज़न) एक और संभावित विकल्प है। सिद्धांततः यह रासायनिक रॉकेटों की तुलना में प्रति किलोग्राम लाखों गुना अधिक ऊर्जा दे सकता है। फिर भी 30,000 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से चलने वाले फ्यूज़न-चालित यान को अपने भार से लगभग 150 गुना अधिक ईंधन की आवश्यकता होगी।
यात्रा के दौरान अंतरिक्ष में मौजूद सूक्ष्म धूल कण भी गंभीर खतरा बन सकते हैं। इतनी अधिक गति पर ये कण यान से टकराकर लगभग .22 कैलिबर की गोली जितनी ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं। इससे बचने के लिए अत्यंत मजबूत सुरक्षा कवच चाहिए होगा, जो यान के भार और ईंधन की आवश्यकता को और बढ़ा देगा।
भौतिकी का कोई एक नियम पृथ्वी तक अंतरतारकीय यात्रा को असंभव नहीं बताता। लेकिन सैकड़ों जटिल और परस्पर विरोधी इंजीनियरिंग चुनौतियों का संयुक्त प्रभाव इसे लगभग अव्यावहारिक बना देता है।
यह संभव है कि किसी उन्नत एलियन सभ्यता ने ऐसी तकनीक विकसित कर ली हो जो मानव ज्ञान से कहीं आगे हो। फिर भी ऐसी किसी भी तकनीक को अपने स्वयं के इंजीनियरिंग अवरोधों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए यदि ब्रह्मांड में कहीं एलियन मौजूद भी हैं, तो उनका पृथ्वी तक पहुंचना भौतिकी और इंजीनियरिंग—दोनों की दृष्टि से एक अत्यंत कठिन चुनौती होगी।
अपोलो-17 की रहस्यमय तस्वीर
पेंटागन द्वारा जारी नए दस्तावेजों में 1972 में अपोलो-17 मिशन के दौरान ली गई एक तस्वीर भी शामिल है। इसमें त्रिकोणीय स्वरूप में तीन चमकीले बिंदु दिखाई देते हैं। अमेरिकी सरकार का कहना है कि ये किसी “भौतिक वस्तु” का परिणाम हो सकते हैं। यह तस्वीर इसलिए चर्चा में रही क्योंकि इसे चंद्रमा की सतह से लिया गया था, जहां पक्षी, बादल या विमान जैसी सामान्य व्याख्याएं संभव नहीं हैं, और तस्वीर में दिखाई देने वाले बिंदुओं के आसपास सामान्य लेंस फ्लेयर जैसा प्रकाशीय प्रभाव भी नहीं दिखता।
अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा देखी गई रहस्यमयी रोशनी
कई अंतरिक्ष यात्रियों ने अंतरिक्ष में चमकती रोशनियां देखने की बात कही है। अपोलो-11 के अंतरिक्ष यात्री बज़ एल्ड्रिन ऐसे अनुभव की रिपोर्ट करने वालों में पहले लोगों में थे। बाद में अपोलो-14, 15 और 17 के दलों ने भी ऐसी चमकें देखने की जानकारी दी। वैज्ञानिकों ने इसका कारण “चेरेनकोव विकिरण” और अंतरिक्षीय कॉस्मिक किरणों के आंखों पर पड़ने वाले प्रभाव को माना, हालांकि यह सभी घटनाओं की पूरी व्याख्या नहीं कर सका।

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लेखक Georgia Institute of Technology में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हैं। यह लेख सबसे पहले The Conversation में प्रकाशित हुआ

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