ब्लॉग

धर्म : परिस्थितियों के अनुसार बदलती हुई व्याख्या?

गोविंद प्रसाद बहुगुणा-

एक देहाती कहावत याद आती है, जिसे मैंने बचपन में सुना था—
“यस्य ज्ञानं महावेगं, लगा धक्का तो गिर पड़ा।”
पांडवों को जब विजय प्राप्त हो गई और राज्य संभालने की बारी आई, तब युधिष्ठिर ने कहा—
“नाहं राज्यसुखान्वेषी, राज्यमिच्छाम्यपि क्षणम्।”
युधिष्ठिर के इस कथन पर मुझे जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर की यह टिप्पणी सटीक प्रतीत होती है—
With people of limited ability, modesty is merely honesty. But with those who possess great talent, it is hypocrisy.”
राजनीति में लगभग सभी राज्यसुखान्वेषी होते हैं, लेकिन दिखावे के लिए स्वयं को विरक्त या संन्यासी बताने का प्रयास करते हैं।
महाभारत में अनेक गीताओं का समावेश है। उनमें एक “भीष्म गीता” भी है, जिसमें वक्ता भीष्म पितामह हैं और श्रोता युधिष्ठिर। उस समय युधिष्ठिर की मनःस्थिति लगभग वैसी ही थी जैसी युद्धारम्भ के समय अर्जुन की थी। युद्ध समाप्त होने के बाद वे वैराग्य की बात करने लगे थे। तब भीष्म पितामह ने उन्हें समझाया कि संन्यास का विचार त्यागकर राजधर्म का पालन करें।
उन्होंने कहा—
अपि तु त्वां मृदुप्रज्ञमत्यर्थमति धार्मिकम्।
क्लीवं धर्मघृणायुक्तं न लोको बहुमन्यते।।”
अर्थात, बेटा! तुम्हारी बुद्धि कोमल है और तुम अत्यधिक धर्मपरायण हो, किन्तु संसार ऐसे व्यक्ति का सम्मान नहीं करता जिसे वह कायर या निर्णयहीन समझे। लोग कहेंगे कि तुम्हें राज्य चलाने का सामर्थ्य नहीं था, तभी तो धृतराष्ट्र ने तुम्हें राज्य से वंचित रखा।
फिर उन्होंने कहा—
वृत्तं तु स्वमपेक्षस्व पितृपैतामहोचितम्।
नैव राज्ञा तथावृत्तं यथा त्वं स्थातुमिच्छसि।।”
अर्थात, तुम्हारे पिता और पितामह जिस आचार-विचार का पालन करते थे, उसी मार्ग पर चलने का प्रयास करो। इतना बड़ा युद्ध लड़ने और राज्य प्राप्त करने के बाद संन्यास की बात करना कहाँ की बुद्धिमानी है?
भीष्म आगे स्मरण कराते हैं—
शौर्यं बलं च सत्यं च पिता तव सदाब्रवीत्।
माहात्म्यं च महौदार्यं भवतः कुन्त्ययाचत।।”
तुम्हारे पिता पाण्डु की कामना थी कि उनके पुत्रों में शौर्य, बल और सत्य की वृद्धि हो। तुम्हारी माता कुंती भी यही स्वप्न देखती थीं कि उनके पुत्रों को समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त हो।
किन्तु इस प्रसंग को पढ़ते समय मेरे मन में एक प्रश्न लगातार उठता रहा—क्या स्वयं भीष्म ने उस धर्म का पालन किया था, जिसकी शिक्षा वे युधिष्ठिर को दे रहे थे?
जब युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी जुए में दाँव पर लगा दिया था, तब भीष्म ने उन्हें क्यों नहीं रोका? उन्होंने यह क्यों नहीं कहा कि द्रौपदी कोई निर्जीव वस्तु नहीं है, जिसे मुद्रा की तरह दाँव पर लगाया जा सके? भीष्म उस समय मूकदर्शक क्यों बने रहे? द्रौपदी स्वयं उस जुए के खेल का हिस्सा नहीं थीं; फिर उन्हें दाँव पर लगाना किस नियम या न्याय के अंतर्गत उचित था?
द्रौपदी ने स्वयं युधिष्ठिर से प्रश्न किया था—
अजितं वा जितं वाऽपि मन्येऽहं त्वां युधिष्ठिर।
स्वयं जित्वा तु मां दासीं कथं नु वक्तुमर्हसि।।”
(महाभारत, सभा पर्व)
अर्थात—”हे युधिष्ठिर! मैं आपको हारा हुआ मानूँ या जीता हुआ? जब आप स्वयं को ही हार चुके थे, तब मुझे दासी बनाकर अपने अधिकार में होने का दावा कैसे कर सकते हैं?”
यहीं से प्रश्न खड़ा होता है कि धर्म की व्याख्या क्या वास्तव में सिद्धांतों के आधार पर हुई, या फिर परिस्थितियों और सुविधाओं के अनुसार? महाभारत के अनेक प्रसंग यह संकेत देते हैं कि धर्म की अवधारणा हमेशा स्पष्ट और निष्पक्ष नहीं रही। कई बार उसका प्रयोग सत्ता, परम्परा और सामाजिक संरचना के संरक्षण के लिए भी किया गया।
शायद इसी प्रकार के विरोधाभासों को देखकर कार्ल मार्क्स ने कहा था—
Religion is the opium of the masses.”
हालाँकि यह कथन अपने ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भ में समझे जाने की माँग करता है, फिर भी महाभारत के कुछ प्रसंग पाठक को यह सोचने के लिए विवश अवश्य करते हैं कि धर्म का वास्तविक अर्थ क्या है—न्याय, कर्तव्य और सत्य, या फिर परिस्थितियों के अनुसार बदलती हुई व्याख्या?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!