हिमालय: मैली होती सफेद चादर और सिकुड़ते ग्लेशियर
Global climate discussions often target industrial nations, but Asia’s “Third Pole”—the Himalayas—faces an immediate threat from black carbon. This local soot deposits on glaciers, destroying their natural albedo effect (white snow reflecting 80–90% of solar radiation). Instead of reflecting heat, the darkened ice absorbs it, doubling melting rates. Major drivers include unmanaged tourist vehicles, forest fires, stubble burning, and aggressive infrastructure blasting. Consequences are catastrophic: retreating glaciers, drying natural springs, and the formation of unstable moraine-dammed lakes that cause deadly Glacial Lake Outburst Floods (GLOFs). Experts urge a shift to eco-sensitive engineering and strict carrying-capacity evaluations.-Jay S, Rawat

– जयसिंह रावत
वैश्विक मंचों पर जब भी जलवायु परिवर्तन की गंभीर चिंताएं जताई जाती हैं, तो हमारा ध्यान अक्सर औद्योगिक देशों और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर चला जाता है। निसंदेह ये कारक धरती का तापमान बढ़ा रहे हैं, लेकिन जब हम एशिया के ‘थर्ड पोल’ (तीसरे ध्रुव) यानी हमारे हिमालय की बात करते हैं, तो संकट का एक और अधिक क्रूर, स्थानीय और तात्कालिक चेहरा सामने आता है। यह संकट, ‘ब्लैक कार्बन’ है। यह केवल पर्यावरण विज्ञान का कोई तकनीकी शब्द नहीं है, बल्कि यह वह अदृश्य कालिख है जो हमारी जीवनदायिनी नदियों के उद्गम, हमारे इस पावन मुकुट को समय से पहले बूढ़ा कर रही है। इस पर्यावरण दिवस पर यदि हम पारंपरिक रस्म–अदायगी वाले नारों से आगे बढ़कर देखना चाहें, तो हमें हिमालयी पारिस्थितिकी के उस भयावह सच का सामना करना होगा, जिसकी गवाही वैज्ञानिक शोध और भूगर्भीय आंकड़े चिल्ला–चिल्ला कर दे रहे हैं।
हिमालय केवल पत्थरों और बर्फ का मूक विहंगम ढांचा नहीं है। यह भारतीय उपमहाद्वीप की संपूर्ण सभ्यता, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का आधार स्तंभ है। देश की आधी से अधिक आबादी जिन नदियों के पानी से अपनी प्यास बुझाती है, उन्हें सदियों से अक्षुण्ण रखने वाले हमारे ग्लेशियर आज अभूतपूर्व संकट में हैं। देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के नेशनल रिमोट सेंसेरिंग सेंटर और इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की तमाम हालिया रिपोर्ट्स इस बात की तस्दीक करती हैं कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे खिसकने की गति पिछले कुछ दशकों में अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। डरावनी बात यह है कि इस तीव्र गलन के लिए केवल हवा में तैरती अदृश्य गैसे जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि वह सीधी कालिख जिम्मेदार है जो पहाड़ों के संवेदनशील पर्यावरण में हमारे अपने लालच और अनियोजित नीतियों के कारण घुल रही है।
इस पूरे संकट के वैज्ञानिक पहलू को समझने के लिए हमें प्रकृति के एक बेहद खूबसूरत और सरल नियम ‘अल्बेडो प्रभाव’ को समझना होगा। कुदरत ने इन चोटियों को शुद्ध सफेद बर्फ की एक ऐसी चमकदार ढाल प्रदान की है, जो एक विशाल दर्पण की तरह काम करती है। जब सूर्य की किरणें इस चमकीली और श्वेत बर्फ पर पड़ती हैं, तो यह बर्फ लगभग 80 से 90 प्रतिशत सौर विकिरण और ऊष्मा को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देती है। यही कारण है कि भारी गर्मी के महीनों में भी ये ग्लेशियर सुरक्षित रहते हैं। लेकिन जब मैदानों और पहाड़ों की मानवीय गतिविधियों से पैदा होने वाला ब्लैक कार्बन हवा के साथ तैरता हुआ इन उच्च हिमनद क्षेत्रों तक पहुंचता है, तो वह इस सफेद चादर पर एक सूक्ष्म काली परत के रूप में जमा हो जाता है। कालिख की यह महीन परत बर्फ के चमकीलेपन यानी उसके अल्बेडो को सीधे तौर पर नष्ट कर देती है। विज्ञान का स्थापित नियम है कि काला रंग ऊष्मा का सबसे बड़ा शोषक होता है। जैसे ही बर्फ मटमैली या काली होती है, वह सूर्य की किरणों को परावर्तित करने के बजाय उसेसोखने लगती है। वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि ब्लैक कार्बन के इस सीधे असर के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की गति दोगुनी से भी अधिक हो गई है।
अब सवालयह उठता है कि आखिर उच्च हिमालय के इन अत्यंत दुर्गम और जनशून्य इलाकों में इतनी भारी मात्रा में यह कालिख पहुंच कहां से रही है? इसके कारक हमारे बहुत करीब और बेहद स्थानीय हैं। सबसे पहला और बड़ा कारण पहाड़ों में पर्यटन और परिवहन का अनियंत्रित और बेतरतीब दबाव है। चारधाम यात्रा मार्गों और अन्य पर्यटन स्थलों पर हर साल लाखों की संख्या में डीजल और पेट्रोल वाहनों का रेला उमड़ रहा है। संकरी पर्वतीय घाटियों में घंटों लगने वाले ट्रैफिक जाम और भारी व्यावसायिक वाहनों से निकलने वाला अनफिल्टर्ड गाढ़ा धुआँ हवा के रुख के साथ सीधे ऊंचे ग्लेशियरों की तरफ बढ़ता है।
दूसरा बड़ा और विनाशकारी कारण हर साल गर्मियों में लगने वाली जंगलों की आग है। मध्य हिमालय के चीड़ के जंगलों में लगने वाली भीषण आग अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। इन अग्निकांडों से निकलने वाली टनों राख और ब्लैक कार्बन की सघन मात्रा वायुमंडलीय धाराओं के सहारे सीधे गंगोत्री, यमुनोत्री और चोराबारी जैसे संवेदनशील ग्लेशियरों की गोद में जाकर बैठ जाती है। इसके साथ ही, पहाड़ों में ऑल–वेदर रोड और जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण कार्यों के लिए जिस तरह अंधाधुंध डायनामाइट ब्लास्टिंग की जा रही है, उससे उड़ने वाली धूल और भारी मशीनों का धुआँ भी इस स्थानीय प्रदूषण को चरम पर पहुंचा रहा है। मैदानी इलाकों में सर्दियों और मानसून–पूर्व के महीनों में बड़े पैमाने पर पराली जलाया जाना और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का औद्योगिक प्रदूषण भी इस तबाही में बराबर का साझेदार है।
वाडिया इंस्टीट्यूट के भूगर्भशास्त्रियों ने अपने दीर्घकालिक अध्ययनों में पाया है कि गंगोत्री ग्लेशियर प्रतिवर्ष औसतन 15 से 20 मीटर की दर से पीछे खिसकर रहा है, जबकि कम ऊंचाई पर स्थित अन्य छोटे ग्लेशियरों के सिकुड़ने की रफ्तार इससे भी कहीं अधिक चिंताजनक है। विशेषज्ञों का स्पष्ट अनुमान है कि यदि तापमान बढ़ने और ब्लैक कार्बन के जमाव की यही स्थापित दर बनी रही, तो इस सदी के अंत तक हिंदूकुश–हिमालय क्षेत्र के लगभग एक–तिहाई ग्लेशियर हमेशा के लिए इतिहास का हिस्सा बन सकते हैं।
लेकिन बात सिर्फ ग्लेशियरों के सिकुड़ने तक सीमित नहीं है; इस गलन ने एक बेहद खतरनाक और विनाशकारी शृंखलाबद्ध प्रभाव को जन्म दिया है, जो हमारे जल विज्ञान को पूरी तरह छिन्न–भिन्न कर रहा है। जब ग्लेशियर सामान्य से अधिक गति से पिघलते हैं, तो वे अपने पीछे भारी मात्रा में अस्थिर पानी और बोल्डर–मलबे का ढेर छोड़ते हैं। यह पानी प्राकृतिक रूप से मलबे के कमजोर बांधों के पीछे जमा होने लगता है, जिसे विज्ञान की भाषा में मोरेन–डेम्ड झीलें कहा जाता है। इन झीलों का आकार जब अपनी वहन क्षमता से अधिक बड़ा हो जाता है, तो ये ‘टाइम बम’ का रूप ले लेती हैं। किसी हल्के भूकंपीय झटके, भूस्खलन या हिमस्खलन के कारण जब इन झीलों के कमजोर प्राकृतिक बांध टूटते हैं, तो निचली घाटियों में अचानक विनाशकारी बाढ़ आती है, जिसे ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ कहा जाता है। चमोली की ऋषिगंगा आपदा और सिक्किम की तीस्ता नदी में मची हालिया तबाही इसके जीवंत और डरावने साक्ष्य हैं।
इस जल–पारिस्थितिकी असंतुलन का एक और अधिक गंभीर पहलू यह है कि पहाड़ों का संपूर्ण जनजीवन और वन्यजीव तंत्र पारंपरिक जल स्रोतों यानी ‘धारों’ और ‘नौलों’ पर निर्भर है। सामान्य परिस्थितियों में जब सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है, तो वह बर्फ धीरे–धीरे पिघलकर पहाड़ों की आंतरिक चट्टानों, दरारों और भूगर्भीय छिद्रों में समा जाती है, जिससे ये प्राकृतिक जल स्रोत साल भर रिचार्ज होते रहते हैं। लेकिन जब ब्लैक कार्बन के प्रभाव और असमय तीव्र गर्मी के कारण बर्फबारी का चक्र ही गड़बड़ा जाता है और जमी हुई बर्फ पानी बनकर तेजी से बह जाती है, तो जमीन को उस पानी को सोखने का समय ही नहीं मिलता। नतीजा यह हो रहा है कि मध्य हिमालयी क्षेत्रों के लगभग 50 प्रतिशत पारंपरिक पेयजल स्रोत या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या सूखने की कगार पर हैं।
विकास और प्रकृति संरक्षण के बीच का द्वंद्व अब उस मोड़ पर है, जहां नीतिगत सुधारों में देरी आत्मघाती होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि विकास पूरी तरह ठप न हो, लेकिन सवाल इसकी शैली का है। पहाड़ों में तबाही मचाने वाली पारंपरिक डायनामाइट ब्लास्टिंग पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। इसकी जगह ‘कट एंड फिल’ और टनल बोरिंग मशीनों जैसी ‘इको–सेंसिटिव इंजीनियरिंग’ को कानूनन अनिवार्य बनाना होगा।
किसी भी नए निर्माण या पर्यटन ढांचे को मंजूरी देने से पहले संबंधित क्षेत्र की वैज्ञानिक ‘वहन क्षमता’ (Carrying Capacity) का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है। जिन संवेदनशील ढलानों पर कंक्रीट का बोझ सहने की क्षमता नहीं है, वहां नए निर्माणों पर पूर्ण विराम लगाने का कड़ा साहस सरकारों को दिखाना होगा, अन्यथा जोशीमठ और नैनीताल जैसे भू–धंसाव के संकट बार–बार दोहराए जाएंगे।
इसके अलावा, दावानल और वन प्रबंधन के लिए वन विभाग को स्थानीय समुदायों और ‘वन पंचायतों’ को पारंपरिक अधिकारों के साथ पुनः मजबूत करना होगा। जब तक स्थानीय नागरिक का जंगलों और जल स्रोतों से भावनात्मक व आजीविका का सीधा जुड़ाव नहीं होगा, तब तक पर्यावरण संरक्षण केवल कागजी रहेगा। समय आ गया है कि हम अपनी विकास नीतियों को ‘पारिस्थितिकी–केंद्रित’ बनाएं, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित जमीन मयस्सर हो सके।
=================================
Jay Singh Rawat is a veteran freelance journalist, author, and researcher based in Dehradun, Uttarakhand, with nearly five decades of media experience. The first recipient of the Pandit Bhairav Dutt Dhulia Award, he has authored nine reference books, specializing in Himalayan ecology, tribal history, and regional socio-political governance.
