हेमवती नंदन बहुगुणा की 107वीं जयंती पर स्मृति व्याख्यान आयोजित

श्रीनगर गढ़वाल, 25 अप्रैल । हिमालय पुत्र स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा की 107वीं जयंती के अवसर पर हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल के बिड़ला परिसर स्थित एसीएल सभागार में स्मृति व्याख्यान का सफल आयोजन किया गया।
कार्यक्रम से पूर्व विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन में स्थापित स्व. बहुगुणा जी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि एवं माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया गया। इसके पश्चात सभागार में दीप प्रज्वलन एवं प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हुआ।
कार्यक्रम के संयोजक एवं अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. ओम प्रकाश गुसाईं ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। इस अवसर पर डॉ. कपिल पंवार ने स्व. बहुगुणा जी के जीवन एवं उनके राजनीतिक-सामाजिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उनके व्यक्तित्व की बहुआयामी विशेषताओं को रेखांकित किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कार्यवाहक कुलपति प्रो. एन.एस. पंवार ने की। मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता श्री सोमवारी लाल उनियाल ने अपने संस्मरण साझा करते हुए बताया कि उनका पहला परिचय बहुगुणा जी से श्रीनगर में हुआ था। उन्होंने कहा कि बहुगुणा जी का व्यक्तित्व अत्यंत स्वाभिमानी और स्पष्टवादी था। वे अक्सर कहा करते थे, “कौन कहता है कि पहाड़ गरीब है।” एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि एक सभा में बहुगुणा जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से स्पष्ट शब्दों में कहा था, “हिमालय ने देश को पर्यावरण दिया है, अब देश बताए कि उसने हिमालय को क्या दिया।” उन्होंने बताया कि लगभग 17 वर्षों तक उनका बहुगुणा जी से निकट संबंध रहा। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने अनुभव किया कि उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की अवधारणा बहुगुणा जी के चिंतन में प्रारंभ से ही मौजूद थी। उनके प्रयासों से पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए पृथक बजट की व्यवस्था लागू हुई। उन्होंने बहुगुणा जी को समाजवादी विचारधारा का सशक्त प्रतिनिधि बताते हुए कहा कि उनके संघर्षों ने ही उन्हें जननायक के रूप में स्थापित किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. एन.एस. पंवार ने कहा कि हेमवती नंदन बहुगुणा केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी चिंतक और जननायक थे। उन्होंने शिक्षा, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय संतुलन के लिए जो नीतिगत पहल की, वे आज भी प्रासंगिक हैं। इस अवसर पर संकाय अध्यक्ष (नियुक्ति एवं प्रोन्नति) प्रो. मोहन पंवार ने कहा कि बहुगुणा जी का पहाड़ से गहरा जुड़ाव था। उन्होंने पर्वतीय समाज की समस्याओं को समझते हुए उन्हें नीतिगत प्राथमिकता दिलाने का ऐतिहासिक कार्य किया, जिससे पहाड़ की अस्मिता, संसाधन और विकास के मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श में प्रमुखता से उभरे।
कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन मुख्य छात्र सलाहकार प्रो. एम.एम. सेमवाल ने प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में उन्होंने बहुगुणा जी को एक गहन विचारक के रूप में देखा। 1970 के दशक में उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए और उत्तराखंड में उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए गढ़वाल एवं कुमाऊँ विश्वविद्यालयों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. राहुल बहुगुणा ने किया। इस अवसर पर प्रसिद्ध साहित्यकार एवं पत्रकार प्रदीप डबराल, प्रो. मंजुला राणा, प्रो. मंजू गुसाईं, प्रो. एम.सी. सती, प्रो. बी.पी. नैथानी, डॉ. अनुरागी, डॉ. नितिन सती, डॉ. अरुण शेखर बहुगुणा, जनसम्पर्क अधिकारी आशुतोष बहुगुणा सहित विश्वविद्यालय के अनेक प्राध्यापक, कर्मचारी, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
