केदारनाथ में पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी पर एनजीटी सख्त, सरकार से जवाब तलब
सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता और कूड़ा प्रबंधन पर उठे सवाल, 17 दिसंबर को अगली सुनवाई
देहरादून, 9 अक्टूबर। विश्वप्रसिद्ध केदारनाथ धाम और उसके प्रमुख यात्रा मार्ग पर पर्यावरणीय मानकों के कथित उल्लंघन का मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) तक पहुंच गया है। अधिकरण ने सोनप्रयाग से गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ तक फैले यात्रा क्षेत्र में सीवेज निस्तारण, जल निकासी और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल उठाते हुए उत्तराखंड सरकार सहित संबंधित केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय संस्थाओं से जवाब मांगा है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब केदारनाथ में तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या के कारण सीमित प्राकृतिक संसाधनों और बुनियादी सुविधाओं पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
नोएडा के पर्यावरण कार्यकर्ता अमित गुप्ता की ओर से 22 सितंबर को दाखिल आवेदन पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तराखंड जल संस्थान, रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी, राज्य के मुख्य सचिव और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को नोटिस जारी किए हैं। अधिकरण ने प्रथम दृष्टया माना कि आवेदन में पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 17 दिसंबर को निर्धारित की गई है।
याचिका में प्रमुख रूप से केदारनाथ और गौरीकुंड में स्थापित सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता पर सवाल उठाए गए हैं। आवेदन के अनुसार केदारनाथ में प्रतिदिन 600 किलोलीटर सीवेज शोधन क्षमता वाला संयंत्र स्थापित है। बताया गया है कि इसकी योजना लगभग पांच हजार स्थायी निवासियों और 20 हजार तीर्थयात्रियों की अस्थायी आबादी को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यात्रा के चरम दिनों में उत्पन्न होने वाले सीवेज के समुचित निस्तारण के लिए यह क्षमता पर्याप्त नहीं है।
आवेदन में केदारनाथ में कम से कम एक हजार किलोलीटर प्रतिदिन क्षमता वाले शोधन संयंत्र की आवश्यकता बताई गई है। इसी प्रकार गौरीकुंड में स्थापित 200 किलोलीटर प्रतिदिन क्षमता वाले संयंत्र को भी मौजूदा आवश्यकताओं के मुकाबले अपर्याप्त बताया गया है।
याचिका में केवल संयंत्रों की क्षमता ही नहीं, बल्कि सीवर व्यवस्था से नहीं जुड़े नालों, अपर्याप्त रूप से शोधित गंदे पानी के निस्तारण और ठोस कचरे के अव्यवस्थित प्रबंधन की शिकायतें भी शामिल हैं। इन आरोपों की पुष्टि और वास्तविक स्थिति का निर्धारण संबंधित संस्थाओं के जवाब तथा आगे की सुनवाई के आधार पर होगा।
केदारनाथ का मामला सामान्य शहरी स्वच्छता व्यवस्था से कहीं अधिक संवेदनशील है। यह क्षेत्र हिमालय की अत्यंत नाजुक पारिस्थितिकी का हिस्सा है। यहां सीमित भूभाग, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, अत्यधिक ऊंचाई और तीर्थयात्रियों की मौसमी भीड़ के कारण सीवेज तथा कचरा प्रबंधन की चुनौती अपेक्षाकृत अधिक गंभीर हो जाती है। उचित शोधन के बिना गंदे पानी का निस्तारण स्थानीय जलस्रोतों और मंदाकिनी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
पर्यावरणीय दृष्टि से एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि केदारनाथ जैसे तीर्थस्थल पर बुनियादी सुविधाओं का निर्धारण केवल स्थायी आबादी के आधार पर किया जाना कितना व्यावहारिक है। यात्रा के दौरान प्रतिदिन पहुंचने वाले श्रद्धालुओं, स्थानीय व्यवसायों, आवासीय प्रतिष्ठानों और अन्य गतिविधियों से उत्पन्न अपशिष्ट को ध्यान में रखकर ही शोधन संयंत्रों की वास्तविक आवश्यकता का आकलन किया जा सकता है।
इस प्रकरण में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को नोटिस जारी किया जाना भी महत्वपूर्ण है। मंदाकिनी नदी गंगा नदी तंत्र का हिस्सा है। इसलिए उसके ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में प्रदूषण की रोकथाम केवल स्थानीय स्वच्छता का विषय नहीं, बल्कि व्यापक गंगा संरक्षण कार्यक्रम से भी जुड़ी हुई है।
एनजीटी की कार्यवाही से यह सवाल भी सामने आया है कि चारधाम यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या के अनुपात में पर्यावरण संरक्षण संबंधी आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किस सीमा तक किया गया है। केवल शोधन संयंत्र स्थापित कर देना पर्याप्त नहीं है। उनका नियमित संचालन, वास्तविक शोधन क्षमता, सीवर नेटवर्क से जुड़ाव, शोधित जल की गुणवत्ता और ठोस कचरे के सुरक्षित निस्तारण की निगरानी भी उतनी ही आवश्यक है।
रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने इस मामले में कहा है कि अधिकरण के आदेश का विस्तृत परीक्षण किया जाना आवश्यक है। राज्य सरकार और संबंधित संस्थाओं के जवाब के बाद ही आरोपों तथा मौजूदा व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।
फिलहाल एनजीटी ने पर्यावरणीय उल्लंघन के आरोपों पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है, बल्कि संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। इसके बावजूद यह कार्यवाही हिमालयी तीर्थस्थलों में बढ़ते पर्यटन और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
केदारनाथ में आस्था के साथ पर्यावरण की रक्षा भी अनिवार्य है। तीर्थयात्रा की सफलता केवल श्रद्धालुओं की संख्या और सुविधाओं के विस्तार से नहीं, बल्कि इस बात से भी आंकी जानी चाहिए कि हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी, जलस्रोतों और प्राकृतिक स्वच्छता को कितना सुरक्षित रखा जा रहा है। आगामी सुनवाई में यह स्पष्ट होने की अपेक्षा है कि मौजूदा व्यवस्थाएं पर्यावरणीय मानकों पर कितनी खरी उतरती हैं और उनमें सुधार के लिए किन उपायों की आवश्यकता है।

