हल्दी और नई तकनीक से साफ होगा कारखानों का रंगीन गंदा पानी

भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाया विशेष फिल्टर, दो घंटे में 98 प्रतिशत तक रंग हटाने में सफलता; हानिकारक जीवाणुओं को भी नष्ट करने की क्षमता
नई दिल्ली, 13 अक्टूबर। कपड़ा उद्योग और अन्य कारखानों से निकलने वाला रंगों से दूषित पानी नदियों, तालाबों और अन्य जलस्रोतों के लिए गंभीर समस्या बना हुआ है। इस पानी में मौजूद रासायनिक रंग आसानी से नष्ट नहीं होते और लंबे समय तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अब भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसकी मदद से औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद रंगों को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें हल्दी के अर्क, विशेष प्रकार के महीन रेशों और आधुनिक कंप्यूटर तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत मोहाली स्थित नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी) के वैज्ञानिकों ने यह तकनीक विकसित की है। शोध के परिणाम अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका एडवांस्ड फंक्शनल मैटेरियल्स में प्रकाशित हुए हैं।
हल्दी के अर्क से तैयार किए विशेष कण
वैज्ञानिकों ने इस तकनीक में हल्दी के अर्क की सहायता से जिंक ऑक्साइड के अत्यंत सूक्ष्म कण तैयार किए हैं। हल्दी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले करक्यूमिन और अन्य रासायनिक तत्व इन कणों को बनाने और स्थिर रखने में मदद करते हैं। इससे निर्माण प्रक्रिया में कुछ हानिकारक रसायनों के उपयोग से बचा जा सकता है।
इन सूक्ष्म कणों को पॉलीलैक्टिक एसिड नामक ऐसे पदार्थ के बेहद महीन रेशों में लगाया गया है, जो जैविक रूप से विघटित हो सकता है। इन रेशों से एक विशेष झिल्ली या फिल्टर तैयार किया गया है।
यह फिल्टर पानी में मौजूद रंगों को तोड़ने में मदद करता है। सामान्य फिल्टर अक्सर प्रदूषक पदार्थों को पानी से अलग करते हैं, जबकि नई तकनीक का उद्देश्य रंगों के रासायनिक ढांचे को तोड़कर उनका प्रभाव कम करना है।
प्रकाश और कंपन से काम करता है फिल्टर
इस तकनीक में प्रकाश और ध्वनि से पैदा होने वाले सूक्ष्म कंपन का एक साथ उपयोग किया गया है। प्रकाश के संपर्क में आने पर फिल्टर में मौजूद जिंक ऑक्साइड के कण रासायनिक प्रतिक्रियाएं शुरू करते हैं, जो रंगों के अणुओं को तोड़ने में मदद करती हैं।
इसके साथ ही विशेष प्रकार की उच्च आवृत्ति वाली ध्वनि से उत्पन्न कंपन इस प्रक्रिया को और प्रभावी बनाते हैं। इस तरह प्रकाश और कंपन मिलकर दूषित पानी में मौजूद रंगों को तेजी से विघटित करते हैं।
दो घंटे में 98.6 प्रतिशत तक रंग हटाया
प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों के दौरान वैज्ञानिकों को उत्साहजनक परिणाम मिले। प्रकाश और पराध्वनि कंपन के संयुक्त उपयोग से इस विशेष फिल्टर ने केवल 120 मिनट में मेथिलीन ब्लू नामक रंग को 98.6 प्रतिशत और कांगो रेड नामक रंग को 96.7 प्रतिशत तक हटाने में सफलता प्राप्त की।
ये दोनों रंग वैज्ञानिक प्रयोगों में प्रदूषक हटाने की क्षमता जांचने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
फिल्टर में जीवाणुओं को निष्क्रिय करने की क्षमता भी पाई गई। परीक्षण के दौरान छह घंटे में इसने ई. कोलाई नामक जीवाणु को लगभग 75 प्रतिशत और स्टैफिलोकोकस ऑरियस नामक जीवाणु को 71 प्रतिशत तक निष्क्रिय किया।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से मिलेगी मदद
वैज्ञानिकों ने इस तकनीक के साथ मशीन लर्निंग का भी उपयोग किया है। यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी ऐसी तकनीक है, जिसमें कंप्यूटर उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर परिणामों का अनुमान लगाना सीखता है।
इसकी मदद से वैज्ञानिक यह अनुमान लगा सकते हैं कि प्रकाश की तीव्रता, उपचार का समय, कंपन की आवृत्ति, फिल्टर में मौजूद सक्रिय पदार्थ की मात्रा और पानी में रंगों की सांद्रता बदलने पर सफाई की प्रक्रिया कितनी प्रभावी होगी।
इससे भविष्य में अलग-अलग प्रकार के औद्योगिक अपशिष्ट जल के उपचार के लिए उपयुक्त परिस्थितियां निर्धारित करने में सहायता मिल सकती है।
जल प्रदूषण रोकने की दिशा में नई संभावना
इस शोध का महत्व इसलिए भी है क्योंकि कपड़ा रंगाई और अन्य उद्योगों से निकलने वाले रंगयुक्त पानी का उपचार एक बड़ी चुनौती है। कई प्रचलित विधियां प्रदूषक पदार्थों को पानी से अलग तो कर देती हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह विघटित नहीं कर पातीं।
नई तकनीक में जैविक रूप से विघटित होने वाले पदार्थों, प्राकृतिक अर्क और प्रकाश आधारित प्रक्रियाओं का उपयोग इसे पर्यावरण के अधिक अनुकूल बनाने की संभावना पैदा करता है।
हालांकि, अभी इसके परिणाम प्रयोगशाला परीक्षणों पर आधारित हैं। बड़े औद्योगिक संयंत्रों में उपयोग से पहले इसकी लागत, लंबे समय तक कार्यक्षमता, फिल्टर के पुनः उपयोग और वास्तविक औद्योगिक अपशिष्ट जल पर प्रभावशीलता की जांच आवश्यक होगी।
वैज्ञानिकों का यह शोध भविष्य में कपड़ा उद्योग सहित रंगयुक्त अपशिष्ट जल पैदा करने वाले अन्य उद्योगों के लिए कम प्रदूषणकारी जल उपचार तकनीक विकसित करने का आधार बन सकता है।

