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श्वेत लोगों पर सबसे बेहतर काम करता है यह जीवनरक्षक आनुवंशिक परीक्षण

 

 

यूरोपीय डीएनए पर आधारित आनुवंशिक भविष्यवाणी मॉडल व्यक्तिगत चिकित्सा में क्रांति ला सकती हैं, लेकिन विविध आनुवंशिक आंकड़ों की कमी बड़ी चुनौती

-एमिली बॉमगार्टनर नन की रिपोर्ट –

आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) पर आधारित चिकित्सा को भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि किसी व्यक्ति के डीएनए का विश्लेषण करके बचपन से ही यह अनुमान लगाया जा सकेगा कि उसे आगे चलकर हृदय रोग, स्तन कैंसर या मधुमेह जैसी जटिल बीमारियां होने की कितनी संभावना है। इससे समय रहते उपचार और रोकथाम संभव होगी। लेकिन इस तकनीक की एक गंभीर कमजोरी सामने आई है—यह फिलहाल मुख्यतः यूरोपीय मूल के लोगों के डीएनए पर आधारित है, जिसके कारण एशियाई, अफ्रीकी और अन्य नस्लीय समूहों के लिए इसकी सटीकता काफी कम हो जाती है।

हाल ही में अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (एनआईएच) ने दुनिया का सबसे बड़ा मानव जीनोम डेटाबेस तैयार करने की घोषणा की। संस्था का दावा है कि यह डेटाबेस व्यक्तिगत चिकित्सा (पर्सनलाइज्ड मेडिसिन) के नए युग की शुरुआत करेगा। इसी डेटाबेस के आधार पर वैज्ञानिक कई नई चिकित्सीय तकनीकें विकसित कर रहे हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है “पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर” (Polygenic Risk Score-PRS)।

क्या है पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर?

मनुष्य के जीनोम में हजारों छोटे-छोटे आनुवंशिक बदलाव होते हैं। इनमें से प्रत्येक परिवर्तन किसी बीमारी का जोखिम बहुत थोड़ा बढ़ाता या घटाता है। वैज्ञानिक इन हजारों परिवर्तनों को जोड़कर एक समग्र जोखिम स्कोर तैयार करते हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि किसी व्यक्ति में किसी विशेष बीमारी की संभावना सामान्य लोगों की तुलना में कितनी अधिक है।

यदि किसी व्यक्ति का जोखिम बहुत अधिक पाया जाता है, तो चिकित्सक दशकों पहले ही बचाव के उपाय शुरू कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, जिन लोगों में हृदय रोग का आनुवंशिक जोखिम अधिक हो, उन्हें कम उम्र से ही कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएं (स्टैटिन) दी जा सकती हैं, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक की संभावना कम हो सकती है।

सबसे बड़ी समस्या: यूरोप केंद्रित आनुवंशिक आंकड़े

इन भविष्यवाणी मॉडलों की सफलता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि उन्हें किस प्रकार के आंकड़ों पर प्रशिक्षित किया गया है।

दुनिया के सबसे बड़े आनुवंशिक डेटाबेसों में शामिल ब्रिटेन का “यूके बायोबैंक” लगभग 94 प्रतिशत श्वेत यूरोपीय प्रतिभागियों पर आधारित है। अमेरिका का “मिलियन वेटरन प्रोग्राम” भी लगभग तीन-चौथाई श्वेत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।

एनआईएच का “ऑल ऑफ अस” कार्यक्रम विशेष रूप से विविध समुदायों को शामिल करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, फिर भी इसमें लगभग आधे प्रतिभागी यूरोपीय मूल के हैं।

परिणामस्वरूप, यूरोपीय मूल के लोगों में जहां पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर काफी सटीक साबित होता है, वहीं अफ्रीकी, एशियाई, लैटिन अमेरिकी तथा अन्य समुदायों के लिए इसकी भविष्यवाणियां कई बार सिक्का उछालने जितनी ही अनिश्चित हो जाती हैं।

बढ़ सकती है स्वास्थ्य असमानता

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक इसी रूप में व्यापक रूप से लागू की गई तो पहले से मौजूद स्वास्थ्य असमानताएं और गहरी हो सकती हैं।

माउंट सिनाई इंस्टीट्यूट फॉर जीनोमिक हेल्थ की निदेशक प्रो. ईमियर केनी का कहना है कि इस समस्या पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि आनुवंशिक मॉडल विविध आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे, तो वे समान रूप से सभी लोगों को लाभ नहीं पहुंचा पाएंगे।

केवल यूरोप पर आधारित शोध क्यों पर्याप्त नहीं?

वैज्ञानिकों के अनुसार मानव विकास का इतिहास ही इसका कारण है।

आधुनिक मनुष्य की उत्पत्ति अफ्रीका में हुई। वहां रहने वाली आबादी में लाखों वर्षों के विकासक्रम के कारण अत्यधिक आनुवंशिक विविधता विकसित हुई। लगभग 50 हजार वर्ष पहले अफ्रीका से बाहर निकले अपेक्षाकृत छोटे समूहों से ही आज के अधिकांश यूरोपीय लोगों की आबादी विकसित हुई। इसलिए यूरोपीय आबादी आनुवंशिक रूप से अपेक्षाकृत कम विविध है।

मैकगिल विश्वविद्यालय के महामारी विशेषज्ञ प्रो. जे कॉफमैन का कहना है कि यदि पूरी मानवता के लिए उपयोगी आनुवंशिक अध्ययन करना हो तो केवल यूरोपीय आबादी सबसे कम उपयुक्त विकल्प है।

विविध समुदायों में शोध से मिली बड़ी खोज

अफ्रीकी मूल के लोगों पर हुए शोध से इसका महत्व पहले ही साबित हो चुका है।

वैज्ञानिकों ने पाया कि पीसीएसके-9 (PCSK9) नामक जीन में एक दुर्लभ परिवर्तन, जो मुख्यतः कुछ अश्वेत लोगों में पाया जाता है, कोरोनरी हृदय रोग का जोखिम लगभग 88 प्रतिशत तक कम कर देता है।

इसी खोज के आधार पर आज विकसित की गई पीसीएसके-9 अवरोधक दवाएं दुनिया भर के मरीजों के लिए उपयोगी साबित हो रही हैं। यदि अध्ययन केवल यूरोपीय आबादी तक सीमित रहता तो संभवतः यह महत्वपूर्ण खोज कभी सामने नहीं आती।

विश्वास की कमी भी बड़ी बाधा

विविध समुदायों को आनुवंशिक शोध में शामिल करना आसान नहीं है।

अमेरिका सहित कई देशों में अश्वेत और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ चिकित्सा अनुसंधान के दौरान अतीत में गंभीर नैतिक उल्लंघन हुए हैं। कुख्यात टस्केगी सिफलिस अध्ययन और हेनरिएटा लैक्स जैसी घटनाओं ने इन समुदायों में गहरा अविश्वास पैदा किया है।

इसी कारण कई लोग अपना आनुवंशिक डेटा शोधकर्ताओं को देने से हिचकते हैं।

दुनिया भर में बढ़ रहे हैं नए जीनोम बैंक

इस समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिक अधिक विविध आनुवंशिक डेटाबेस तैयार कर रहे हैं।

चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, पेरू, मेक्सिको, कतर और अफ्रीकी देशों में तेजी से नए जीनोम बैंक विकसित किए जा रहे हैं। अफ्रीका में “एच3अफ्रीका” (H3Africa) नामक महाद्वीपीय कार्यक्रम स्थानीय आबादी के आनुवंशिक आंकड़े एकत्र कर रहा है।

अमेरिका के माउंट सिनाई हेल्थ सिस्टम और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (यूसीएलए) ने भी अपेक्षाकृत अधिक विविध आबादी वाले बायोबैंक स्थापित किए हैं।

स्तन कैंसर पर चल रहे “कॉनफ्लुएंस” (Confluence) कार्यक्रम में 62 देशों के 300 से अधिक अध्ययनों के आंकड़े शामिल किए गए हैं, जिनमें चार लाख से अधिक कैंसर रोगियों तथा 15 लाख से अधिक नियंत्रण समूहों की जानकारी उपलब्ध है।

भविष्य की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल विविध आनुवंशिक आंकड़े जुटाना ही पर्याप्त नहीं होगा। सामाजिक-आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, आयु, लिंग और पर्यावरण जैसे अनेक कारक भी बीमारी के जोखिम को प्रभावित करते हैं।

इसके बावजूद वैज्ञानिक आशावादी हैं कि जैसे-जैसे अधिक विविध आबादी के आनुवंशिक आंकड़े उपलब्ध होंगे, पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर की सटीकता बढ़ेगी और यह तकनीक वास्तव में पूरी मानवता के लिए समान रूप से उपयोगी बन सकेगी।

हालांकि शोधकर्ताओं का मानना है कि वर्तमान स्थिति में इन आनुवंशिक भविष्यवाणी मॉडलों को सार्वभौमिक रूप से समान सटीकता वाला नहीं माना जा सकता। इसलिए व्यक्तिगत चिकित्सा के इस नए युग को सफल बनाने के लिए दुनिया की सभी नस्लीय और भौगोलिक आबादियों की समान भागीदारी सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा।

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