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रहस्यमयी रूपकुंड की सुंदरता और बिखरे नरकंकाल देख अचंभित हुए बड़ी जात यात्री

 

साढ़े 16 हजार फीट की ऊंचाई पर साफ मौसम ने खोले उच्च हिमालय के अद्भुत नजारे

-हरेंद्र बिष्ट की रिपोर्ट-
थराली/देवाल, 19 सितम्बर। नंदादेवी बड़ी जात यात्रा में शामिल यात्रियों को इस बार उच्च हिमालय में साफ मौसम के कारण प्रकृति के ऐसे दुर्लभ और मनोहारी दृश्य देखने को मिल रहे हैं, जो आमतौर पर यात्रा के दौरान बादलों और खराब मौसम के कारण ओझल रहते हैं। शनिवार को यात्रा जब दुनिया के रहस्यमयी स्थानों में शुमार रूपकुंड पहुंची तो यहां की प्राकृतिक सुंदरता के साथ चारों ओर बिखरे मानव कंकालों को देखकर यात्री अचंभित रह गए।
समुद्र तल से करीब साढ़े 16 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड अपने रहस्यमयी मानव कंकालों के कारण दुनिया भर में चर्चित है। दुर्गम हिमालय के बीच स्थित इस झील तक पहुंचना अपने आप में कठिन चुनौती है।

शनिवार को बड़ी जात के यात्री यहां पहुंचे तो साफ मौसम ने उनकी यात्रा को और यादगार बना दिया। झील और उसके आसपास के हिमालयी दृश्यों के साथ जगह-जगह दिखाई देने वाले नरकंकाल यात्रियों के लिए कौतूहल का केंद्र बने रहे। यात्रियों ने यहां जमकर फोटोग्राफी की और इसे मां नंदा की कृपा बताया कि उन्हें इतने अनुकूल मौसम में उच्च हिमालय और रूपकुंड को इतने करीब से देखने का अवसर मिला।

आमतौर पर नंदादेवी राजजात, छोटी जात अथवा लोकजात यात्रा अगस्त के दूसरे पखवाड़े से शुरू होकर सितंबर के पहले या दूसरे सप्ताह तक पूरी हो जाती है। इस अवधि में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौसम अक्सर खराब रहता है। बादल, कोहरा और बारिश यात्रियों की राह कठिन बनाने के साथ ही हिमालय के विहंगम दृश्यों को भी ढक देते हैं। इस कारण श्रद्धालु मां नंदा की पूजा-अर्चना तो कर लेते हैं, लेकिन इस क्षेत्र में प्रकृति द्वारा बिखेरी गई अद्भुत सुंदरता को पूरी तरह निहारने का अवसर कम ही मिल पाता है।

इस बार स्थिति अलग है। सिद्धपीठ कुरुड़ से पांच सितंबर को शुरू हुई श्री नंदादेवी बड़ी जात सितंबर के दूसरे पखवाड़े में उच्च हिमालयी क्षेत्र से गुजरते हुए होमकुंड की ओर बढ़ रही है और मौसम लगातार यात्रियों का साथ दे रहा है। 17 सितंबर को यात्रा समुद्र तल से करीब 11,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित वेदनी बुग्याल पहुंची तो साफ आसमान और चारों ओर फैले प्राकृतिक दृश्यों को देखकर यात्री अभिभूत हो उठे। यात्रियों भूपेंद्र बिष्ट ‘भुप्पी’ और डॉ. कृपाल भंडारी ने बताया कि 17 सितंबर की रात साफ आसमान में चांद और तारों का नजारा अद्भुत था। यात्रियों को ऐसा महसूस हुआ मानो वे किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गए हो।

अगली सुबह भी मौसम बेहद खुशगवार रहा। दूर-दूर तक फैले बुग्याल, पर्वत शृंखलाएं और उच्च हिमालयी क्षेत्र के बदलते प्राकृतिक रंग यात्रियों के आकर्षण का केंद्र बने रहे। यात्रियों ने इन दृश्यों को अपनी आंखों और कैमरों में कैद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसी दौरान बधाण की नंदादेवी की डोली भी लोकजात के लिए वेदनी पहुंची। उसके साथ आए श्रद्धालु भी यहां के प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत हुए। पूजा-अर्चना और जात के बाद बधाण की डोली वेदनी से वापस लौट गई, जबकि बड़ी जात आगे बढ़ती रही।

बड़ी जात के यात्री करीब 12,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित पातरनचौनियां और लगभग 14,500 फीट की ऊंचाई वाले कैलवाविनायक और बगुवाबासा क्षेत्र से गुजरे। यहां से दिखाई देने वाले उच्च हिमालय के मनोरम दृश्यों ने यात्रियों की कठिन यात्रा की थकान मानो दूर कर दी। शनिवार को यात्रा अपने 15वें पड़ाव और दूसरे निर्जन पड़ाव पातरनचौनियां से 16वें तथा तीसरे निर्जन पड़ाव शीला समुद्र के लिए रवाना हुई।

इसी कठिन मार्ग में जब बड़ी जात करीब साढ़े 16 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड पहुंची तो यात्रियों के लिए यह यात्रा का सबसे रोमांचक अनुभव बन गया। एक ओर रहस्यमयी झील और चारों तरफ फैला उच्च हिमालय का अनुपम सौंदर्य था, तो दूसरी ओर झील के आसपास दिखाई देने वाले सदियों पुराने मानव कंकाल उन्हें हैरत में डाल रहे थे। यात्रियों का कहना था कि मां नंदा की कृपा से उन्हें साफ मौसम में वेदनी से लेकर रूपकुंड और आगे शीला समुद्र की ओर बढ़ते हुए उच्च हिमालय की ऐसी छटा देखने को मिली, जिसे वे जीवन भर नहीं भूल पाएंगे।

 

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