अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक संघर्ष-विराम समझौता, जिनेवा में शुक्रवार को होंगे हस्ताक्षर

The deal was expected to halt fighting for 60 days, open the Strait of Hormuz and lift the U.S. naval blockade on Iranian ports. But it would leave the thorniest nuclear issues for another day.
वाशिंगटन/तेहरान/जिनेवा। मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में तीसरे विश्व युद्ध की आहट के बीच वैश्विक कूटनीति के मोर्चे से इस दशक की सबसे बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। लंबे समय से एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रारंभिक और ऐतिहासिक संघर्ष-विराम (Cease-fire) समझौते पर सहमति बन गई है। महीनों तक पर्दे के पीछे चली बेहद गुप्त वार्ताओं और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के बाद, दोनों परमाणु और सैन्य महाशक्तियां युद्ध की विभीषिका को टालने और कूटनीति को एक मौका देने पर राजी हुई हैं।
इस ऐतिहासिक सहमति पत्र (MoU) पर दोनों देशों के शीर्ष प्रतिनिधि आने वाले शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर में आधिकारिक रूप से हस्ताक्षर करेंगे।
समझौते के मुख्य बिंदु और शर्तें:
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60 दिनों का पूर्ण संघर्ष-विराम: समझौते के तहत दोनों देश तत्काल प्रभाव से अगले 60 दिनों के लिए एक-दूसरे के खिलाफ या अपने समर्थित गुटों के माध्यम से सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाइयों को पूरी तरह रोक देंगे। इस युद्ध-विराम का दायरा लेबनान और सीरियाई मोर्चों तक भी विस्तारित रहेगा, जहाँ पिछले कुछ समय से तनाव चरम पर था।
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होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से हटेगी नाकेबंदी: वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से इस समझौते का सबसे क्रांतिकारी हिस्सा यह है कि दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री व्यापार मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए फिर से पूरी तरह खोल दिया जाएगा। इसके साथ ही, ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को तत्काल प्रभाव से हटा लिया जाएगा।
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कतर और पाकिस्तान की ‘बैकचैनल कूटनीति’: इस बेहद जटिल और असंभव से दिखने वाले समझौते को अमलीजामा पहनाने में खाड़ी देश कतर और भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने मुख्य मध्यस्थ (Mediators) की भूमिका निभाई है। दोनों देशों के राजनयिकों ने महीनों तक वाशिंगटन और तेहरान के बीच ‘शटल डिप्लोमेसी’ के जरिए संदेशों का आदान-प्रदान किया, जिसके बाद इस सहमति पत्र को अंतिम रूप दिया जा सका।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल पर असर:
इस समझौते की खबर आते ही वैश्विक तेल बाजारों में हलचल तेज हो गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने और ईरानी बंदरगाहों से नाकेबंदी हटने से दुनिया भर में कच्चे तेल (Crude Oil) की आपूर्ति सुगम हो जाएगी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे भारत सहित दुनिया भर के विकासशील देशों को महंगाई से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
चुनौतियाँ और अनसुलझे सवाल:
हालांकि इस समझौते को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक मील का पत्थर माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एक अस्थायी संघर्ष-विराम (Temporary Truce) है। इस समझौते में कई बेहद जटिल और दीर्घकालिक मुद्दों को भविष्य की वार्ताओं पर छोड़ दिया गया है, जिनमें शामिल हैं:
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ईरान का परमाणु कार्यक्रम: ईरान के यूरेनियम संवर्धन और परमाणु ठिकानों के भविष्य पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
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स्थायी आर्थिक प्रतिबंध: ईरान पर लगे अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को स्थायी रूप से हटाने की रूपरेखा अगले चरणों की बातचीत में तय होगी।
इजरायल का रुख और क्षेत्रीय समीकरण:
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब मध्य पूर्व में जमीन पर स्थितियाँ बेहद तनावपूर्ण हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह द्वारा किए गए रॉकेट हमलों के जवाब में बेरूत पर इजरायली हवाई हमले लगातार जारी हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इजरायल इस द्विपक्षीय अमेरिकी-ईरानी वार्ता का हिस्सा नहीं था। इस समझौते पर तेल अवीव (इजरायल) ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, जिससे इस बात का सस्पेंस बना हुआ है कि क्या इजरायल इस संघर्ष-विराम का पालन करेगा या नहीं।

अमेरिका और ईरान का टेबल पर आना यह दिखाता है कि दोनों ही देश एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध के आर्थिक और सैन्य नुकसान को उठाने के पक्ष में नहीं थे। जहाँ अमेरिका पर वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी से बचाने का दबाव था, वहीं ईरान अपनी चरमराती आर्थिक स्थिति के बीच अमेरिकी नाकेबंदी से मुक्ति चाहता था। यदि शुक्रवार को जिनेवा में यह हस्ताक्षर बिना किसी बाधा के संपन्न हो जाते हैं, तो यह न केवल मध्य पूर्व में शांति का नया अध्याय लिखेगा, बल्कि वैश्विक कूटनीति में कतर और पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव को भी रेखांकित करेगा।
