महिला आरक्षण और परिसीमन का नया दौर: क्या पर्वतीय राज्यों की राजनीतिक फिर घटेगी
-जयसिंह रावत-
लोकसभा में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण और परिसीमन संबंधी विधेयकों के साथ उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों के सामने नई चुनौतियां
आज संसद में महिला आरक्षण के साथ ही परिसीमन से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक पेश होने जा रहे हैं। यह घटनाक्रम केवल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने का विषय नहीं है, बल्कि देश के संघीय ढांचे और राज्यों के राजनीतिक संतुलन पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। विशेष रूप से उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों के लिए यह एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है, क्योंकि यदि परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किया गया, तो पर्वतीय क्षेत्रों की विधानसभा सीटों में और कमी आने की आशंका है। खासकर डबल इंजन की व्यवस्था इस मामले में निराशाजनक हों सकती है क्योंकि दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की तरह उत्तराखंड सरकार से राजनीतिक अन्याय का विरोध करने की अपेक्षा ही बेमानी होगी। डबल इंजन की सरकार हर अन्याय को माहिमामंडित ही करेगी।
महिला आरक्षण के साथ सीटों में वृद्धि का प्रस्तावित फार्मूला
केंद्र सरकार द्वारा जिस फार्मूले पर विचार किए जाने की चर्चा है, उसके अनुसार लोकसभा की सीटों में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि की जा सकती है। इसके बाद बढ़ी हुई सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। गणितीय दृष्टि से देखें तो यदि किसी राज्य की लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत वृद्धि की जाती है, तो बढ़ी हुई कुल संख्या का एक-तिहाई हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित करने पर मूल सीटों का लगभग आधा हिस्सा महिलाओं के हिस्से में आ सकता है।
वर्तमान में लोकसभा की कुल 543 निर्वाचित सीटें हैं। यदि इनमें 50 प्रतिशत की वृद्धि की जाती है, तो यह संख्या लगभग 815 तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में करीब 270 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। यह व्यवस्था महिला प्रतिनिधित्व को एक नई ऊंचाई तक पहुंचा सकती है, क्योंकि वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी लगभग 15 प्रतिशत के आसपास ही है।
इस प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि सभी राज्यों की सीटों में समान अनुपात से वृद्धि की जाएगी, जिससे किसी राज्य का प्रतिनिधित्व दूसरे की तुलना में कम नहीं होगा। उदाहरण के लिए यदि उत्तर प्रदेश की वर्तमान 80 सीटें 50 प्रतिशत बढ़कर 120 हो जाती हैं, तो उसी अनुपात में अन्य राज्यों की सीटें भी बढ़ेंगी। इससे क्षेत्रीय असंतुलन की आशंका कुछ हद तक कम हो सकती है।
परिसीमन की पृष्ठभूमि और 2026 के बाद की संभावनाएं
भारत में लोकसभा और विधानसभा सीटों का अंतिम व्यापक परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर 2006 में किया गया था। इसके बाद संविधान में किए गए प्रावधानों के अनुसार 2026 तक सीटों की संख्या को स्थिर रखा गया है। अब 2026 के बाद परिसीमन की प्रक्रिया फिर से शुरू होने की संभावना है, और यही वह बिंदु है जहां से कई राज्यों की चिंताएं उभर रही हैं।
परिसीमन का मूल सिद्धांत जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करना है। लेकिन देश के विभिन्न राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की दर अलग-अलग रही है। दक्षिण भारत और पर्वतीय राज्यों ने अपेक्षाकृत बेहतर जनसंख्या नियंत्रण किया है, जबकि कुछ उत्तरी राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाया गया, तो कुछ राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी और कुछ का प्रतिनिधित्व घट सकता है।
उत्तराखंड का अनुभव: 2002 से 2006 तक सीटों का बदलता संतुलन
उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवम्बर 2000 को हुआ था। राज्य गठन के बाद पहला विधानसभा चुनाव 2002 में कराया गया। उस समय सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया था। उस व्यवस्था में पर्वतीय क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए 70 विधानसभा सीटों में से 40 सीटें पर्वतीय जिलों को और 30 सीटें मैदानी जिलों को दी गई थीं।
यह व्यवस्था राज्य गठन के मूल उद्देश्य के अनुरूप थी, क्योंकि उत्तराखंड का लगभग 85 से 86 प्रतिशत भूभाग पर्वतीय है, जबकि मैदानी क्षेत्र 15 प्रतिशत से भी कम है। पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याएं—जैसे दुर्गम भौगोलिक स्थिति, सीमित संसाधन और विकास की चुनौतियां—राजनीतिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से ही प्रभावी ढंग से उठाई जा सकती थीं।
लेकिन 2006 में 2001 की जनगणना के आधार पर हुए परिसीमन ने इस संतुलन को बदल दिया। इसके बाद पर्वतीय क्षेत्रों की सीटें घटकर 34 रह गईं, जबकि मैदानी क्षेत्रों की सीटें बढ़कर 36 हो गईं। इस प्रकार 86 प्रतिशत भूभाग वाले पर्वतीय क्षेत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व में पीछे चले गए।
पलायन और घटती जनसंख्या: भविष्य की बड़ी चुनौती
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार हो रहे पलायन ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। विभिन्न सरकारी और स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार, 2011 तक राज्य के हजारों गांव आंशिक या पूर्ण रूप से खाली हो चुके थे।
पलायन आयोग की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में 1700 से अधिक गांव पूरी तरह खाली हो चुके थे, जबकि 3800 से अधिक गांवों की आबादी 50 प्रतिशत से भी कम रह गई थी। यह स्थिति केवल सामाजिक और आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी सीधा प्रभाव डालती है।
यदि भविष्य में परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किया गया, तो यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि राज्य विधानसभा की कुल 70 सीटें तो यथावत रह सकती हैं, लेकिन पर्वतीय जिलों की सीटों में और कमी आ सकती है। दूसरी ओर देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों की सीटें बढ़ने की संभावना है।
पर्वतीय राज्य के गठन का मूल उद्देश्य और वर्तमान चुनौती
उत्तराखंड का गठन केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं किया गया था। इसके पीछे पर्वतीय क्षेत्रों को राजनीतिक शक्ति प्रदान करने का स्पष्ट उद्देश्य था। लंबे जनांदोलन के बाद बने इस राज्य से अपेक्षा की गई थी कि पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं को प्राथमिकता दी जाएगी और क्षेत्रीय असमानताओं को कम किया जाएगा।
यदि भविष्य में परिसीमन के कारण पर्वतीय क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व लगातार घटता गया, तो यह आशंका स्वाभाविक है कि राज्य गठन का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ सकता है। यह केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन का भी प्रश्न बन जाएगा।
यह चिंता केवल उत्तराखंड की नहीं
पर्वतीय और सीमावर्ती राज्यों की यह चिंता केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और मिजोरम जैसे राज्यों में भी भौगोलिक क्षेत्र विशाल है, लेकिन जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है।
इन राज्यों का सामरिक और पर्यावरणीय महत्व अत्यंत अधिक है। यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण किया गया, तो इन क्षेत्रों की राजनीतिक आवाज कमजोर पड़ सकती है, जिसका प्रभाव राष्ट्रीय नीति और सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। अपनी गणना अपने गांव ” संगठन के संयोजक जोतसिंह बिष्ट के अनुसार अगर परिसिमन में जनसंख्या आधार में 25 प्रतिशत विचलन की व्यवस्था हों तो उत्तराखंड के पहाड़ों की खिसकती राजनीतिक शक्ति को रोका जा सकता है। इससे पहले यहाँ 1 लाख की जन संख्या पर 10 % विचलन था। मतलब मैदानी इलाकों में एक विदजानसभा सीट 1 लाख 10 हजार तक तो पहाड़ में 90 हजार की जनसंख्या ता एक सीट बनी थी।
संभावित समाधान और नीति विकल्प
इस चुनौती से निपटने के लिए केवल जनसंख्या को ही आधार मानना पर्याप्त नहीं हो सकता। भौगोलिक क्षेत्र, दुर्गमता और सीमावर्ती स्थिति जैसे कारकों को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है। दुनिया के कई देशों में प्रतिनिधित्व तय करते समय भौगोलिक विशेषताओं को भी महत्व दिया जाता है।
इसके साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों के लिए न्यूनतम सीटों की संख्या सुनिश्चित करने जैसे उपायों पर भी विचार किया जा सकता है। यदि कानून के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाए कि पर्वतीय जिलों की सीटें एक निश्चित सीमा से कम न हों, तो राजनीतिक संतुलन बनाए रखा जा सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता पलायन रोकने की है। यदि पर्वतीय क्षेत्रों से जनसंख्या का पलायन जारी रहा, तो भविष्य में हर परिसीमन पर्वतीय क्षेत्रों के लिए नुकसानदेह साबित होगा। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत सुविधाओं को पर्वतीय क्षेत्रों तक पहुंचाना इस दिशा में अनिवार्य कदम होगा।
संसद में उठने वाले फैसलों का दूरगामी प्रभाव
आज संसद में प्रस्तुत होने वाले महिला आरक्षण और परिसीमन संबंधी विधेयक केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि देश के संघीय ढांचे और क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करने वाले ऐतिहासिक निर्णय साबित हो सकते हैं।
महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाना निस्संदेह लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसके साथ-साथ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि पर्वतीय और सीमावर्ती क्षेत्रों की राजनीतिक शक्ति कमजोर न हो।
उत्तराखंड जैसे राज्यों के लिए यह समय केवल प्रतीक्षा का नहीं, बल्कि अपनी चिंताओं को स्पष्ट और संगठित रूप में सामने रखने का है। यदि परिसीमन की प्रक्रिया में भौगोलिक और क्षेत्रीय वास्तविकताओं को नजरअंदाज किया गया, तो यह न केवल पर्वतीय क्षेत्रों के लिए, बल्कि पूरे संघीय ढांचे के संतुलन के लिए चुनौती बन सकता है।
