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भारत में चुनावी चकाचौंध के पीछे ‘धनबल’ का खेल; ADR की रिपोर्ट ने खोली राजनीतिक फंडिंग की परतें

Individuals and companies can legally donate to political parties, with disclosure requirements for contributions above INR 20,000. However, party disclosures are routinely underreported, parties can hide donor identities through multiple small contributions or cash payments. Corporate funding, initially capped at 7.5 per cent of average profits under the Companies Act (2013), became virtually limitless after the Finance Act (2017), which also removed the requirement to disclose beneficiary parties. This change enabled opacity in political funding and undermined citizens’ Right to Know, contrary to democratic principles of equality and transparency.

नई दिल्ली | 12 मार्च.भारत के चुनावी लोकतंत्र के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती ‘धनबल’ (Money Power) है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और मेलबर्न विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से जारी एक नई शोध रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि कैसे अपारदर्शी और अनियंत्रित धन भारतीय राजनीति की जड़ें खोखला कर रहा है। 10 मार्च 2026 को नई दिल्ली में जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दशकों के सुधार प्रस्तावों के बावजूद, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और कमजोर कानूनी प्रवर्तन के कारण अपराध, धन और राजनीति का अपवित्र गठबंधन आज भी अटूट है।

1. पारदर्शिता की कमी: ‘हिमशैल का केवल सिरा’

ADR की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा जो डेटा सार्वजनिक किया जाता है, वह वास्तविक राजनीतिक फंडिंग का केवल एक छोटा सा हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार, चुनावी खर्च का एक बड़ा हिस्सा आधिकारिक रिपोर्टिंग के दायरे से बाहर रहता है। यह ‘अदृश्य पैसा’ चुनावी मैदान में एक असमान स्थिति पैदा करता है, जहाँ जनसेवा के बजाय धन की शक्ति यह तय करती है कि सत्ता की चाबी किसके पास होगी।

2. मुख्य निष्कर्ष: कानून की खामियाँ और चुनावी चंदा

रिपोर्ट में भारत के राजनीतिक वित्त ढांचे का गहराई से विश्लेषण किया गया है। मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:

  • कानूनी खामियाँ: ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (1951)’ और ‘आयकर अधिनियम (1961)’ जैसे कानून राजनीतिक दलों को जवाबदेह बनाने में विफल रहे हैं। चुनाव आयोग (ECI) के पास वर्तमान में किसी दोषी पार्टी का पंजीकरण रद्द करने की वैधानिक शक्ति नहीं है, जिसका राजनीतिक दल भरपूर फायदा उठाते हैं।

  • कॉर्पोरेट फंडिंग का एकाधिकार: 2017 के वित्त अधिनियम के बाद कॉर्पोरेट फंडिंग की सीमा हटा दी गई थी। अब कंपनियाँ अपने मुनाफे का कितना भी हिस्सा बिना किसी सार्वजनिक खुलासे के राजनीतिक दलों को दे सकती हैं, जो लोकतांत्रिक पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है।

  • चुनावी बॉन्ड (Electoral Bonds) का काला अध्याय: रिपोर्ट में चुनावी बॉन्ड योजना को ‘संस्थागत अपारदर्शिता’ करार दिया गया है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2024 में इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया था, लेकिन इसने चुनावी समानता को जो नुकसान पहुँचाया है, उसकी भरपाई में लंबा समय लगेगा।

3. ‘अज्ञात स्रोत’ और चुनावी खर्च का बढ़ता पैमाना

राजनीतिक दलों की आय का एक बड़ा हिस्सा आज भी ‘अज्ञात स्रोतों’ से आता है। 20,000 रुपये से कम के चंदे के नाम पर दल दाताओं की पहचान छिपा लेते हैं।

खर्च और मुफ्त उपहार (Freebies):

चुनावों के दौरान उम्मीदवारों के खर्च पर तो सीमा है, लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च पर कोई ऊपरी सीमा नहीं है। यही कारण है कि विज्ञापनों, यात्राओं और रैलियों पर बेहिसाब पैसा खर्च किया जाता है।

चौंकाने वाला आंकड़ा: 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान, चुनाव आयोग ने केवल ढाई महीने के भीतर 88,890 मिलियन रुपये मूल्य की अवैध शराब, नकदी और ड्रग्स जब्त किए थे। यह आंकड़ा चुनावी भ्रष्टाचार की भयावहता को दर्शाता है।


ADR की प्रमुख सिफारिशें: कैसे सुधरेगा तंत्र?

ADR ने व्यवस्था में सुधार के लिए 10 सूत्रीय एजेंडा पेश किया है:

क्षेत्र सिफारिश
पार्टी विनियमन राजनीतिक दलों को ‘RTI एक्ट’ के दायरे में लाया जाए और उनके लिए एक व्यापक कानून बने।
निजी चंदा सभी नकद चंदे प्रतिबंधित हों और केवल डिजिटल लेनदेन को अनिवार्य बनाया जाए।
चुनावी खर्च राजनीतिक दलों के कुल चुनावी खर्च पर एक निश्चित सीमा (Ceiling) तय की जाए।
चुनाव आयोग ECI को पार्टियों का पंजीकरण रद्द करने और चुनाव रद्द करने की कानूनी शक्ति दी जाए।
पेड न्यूज ‘पेड न्यूज’ को चुनावी अपराध घोषित कर उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने का प्रावधान हो।

निष्कर्ष: आगे की राह

रिपोर्ट के अंत में कहा गया है कि जब तक राजनीतिक दलों के खातों का ऑडिट CAG जैसी स्वतंत्र संस्था से नहीं कराया जाता और दाताओं की जानकारी रीयल-टाइम में सार्वजनिक नहीं की जाती, तब तक चुनावी शुद्धता एक सपना बनी रहेगी। डिजिटल मीडिया पर होने वाले खर्च की निगरानी के लिए भी नए नियमों की सख्त आवश्यकता है।

यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं, नागरिक समाज और आम जनता के लिए एक चेतावनी है कि यदि समय रहते चुनावी फंडिंग में सुधार नहीं किए गए, तो भारत की लोकतांत्रिक समानता केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगी।

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