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आस्था के बोझ तले दबता पर्यावरण: केदारनाथ में एक हफ्ते में 1 हजार किलो प्लास्टिक कचरा

 

-उषा रावत द्वारा 

 देहरादून, 30 अप्रैल । केदारनाथ धाम में उमड़ रही रिकॉर्ड तीर्थयात्रियों की भीड़ के बीच जहां प्रशासन स्वच्छता को लेकर अपनी “सफलता” गिना रहा है, वहीं एक गंभीर सवाल भी खड़ा हो रहा है—क्या यह सचमुच सफलता है, या आस्था के नाम पर बढ़ते पर्यावरणीय संकट का संकेत?

यात्रा शुरू होने के महज एक सप्ताह के भीतर ही धाम क्षेत्र से करीब 1,000 किलो प्लास्टिक कचरा एकत्रित किया गया है। यह आंकड़ा खुद इस बात की गवाही देता है कि तीर्थयात्रा के दौरान पर्यावरण पर कितना भारी दबाव पड़ रहा है। इस कचरे में सबसे बड़ी हिस्सेदारी पानी की प्लास्टिक बोतलों की है, जो श्रद्धालुओं द्वारा बड़े पैमाने पर उपयोग के बाद खुले में फेंक दी जाती हैं।

नगर पंचायत केदारनाथ ने 3,000 वर्गफीट क्षेत्र में मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) स्थापित कर कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में छांटने और कॉम्पैक्ट करने की व्यवस्था जरूर की है। कॉम्पेक्टर मशीन के जरिए प्लास्टिक को गठरियों में बदलकर निस्तारित करने की प्रक्रिया भी अपनाई जा रही है। लेकिन मूल सवाल यही है कि आखिर इतना कचरा पैदा ही क्यों हो रहा है?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कचरा एकत्रित करना समाधान नहीं है, बल्कि कचरे के स्रोत पर रोक लगाना अधिक जरूरी है। तीर्थयात्रियों का पंजीकरण करते समय उन्हें पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक क्यों नहीं किया जाता? सिंगल यूज प्लास्टिक पर सख्ती से प्रतिबंध क्यों नहीं लागू किया जाता? यदि शुरुआत में ही स्पष्ट दिशा-निर्देश और नियंत्रण हो, तो इस समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है।

धाम में 55 सफाई कर्मियों की तैनाती और दो शिफ्टों में सफाई व्यवस्था के बावजूद हर दिन बढ़ता कचरा यह संकेत देता है कि समस्या केवल प्रबंधन की नहीं, बल्कि व्यवहार और नीति की भी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा पर्यावरण संरक्षण और प्लास्टिक उपयोग से बचने की अपीलें अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जब तक इन अपीलों को ज़मीनी स्तर पर सख्ती और जन-जागरूकता के साथ नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक हालात में ठोस सुधार की उम्मीद कम ही है।

उत्तराखंड, जिसे देवभूमि और नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए जाना जाता है, वहां इस तरह का प्लास्टिक प्रदूषण भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है। केदारनाथ धाम की यह स्थिति साफ संकेत देती है कि अब केवल सफाई नहीं, बल्कि सख्त रोकथाम और जिम्मेदार तीर्थयात्रा की जरूरत है।

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