1976 की मिश्रा समिति की चेतावनी मान ली होती तो शायद न झेलनी पड़ती जोशीमठ भू-धंसाव त्रासदी
– प्रकाश कपरुवाण
ज्योतिर्मठ, 28 जून। आदि जगद्गुरु शंकराचार्य की तपस्थली ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) के ऐतिहासिक, धार्मिक और पौराणिक महत्व के साथ-साथ इसकी अत्यंत संवेदनशील भू-संरचना को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1976 में तत्कालीन गढ़वाल मंडल आयुक्त महेश चंद्र मिश्रा की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। समिति ने जोशीमठ की भूगर्भीय स्थिति का विस्तृत अध्ययन कर नगर की सुरक्षा के लिए अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। यदि उन सिफारिशों पर समय रहते अमल किया गया होता तो वर्ष 2023 में जोशीमठ को भयावह भू-धंसाव त्रासदी का सामना शायद नहीं करना पड़ता।
विडंबना यह है कि 2023 की आपदा के बाद भारत सरकार के निर्देश पर देश की आठ प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाओं ने आधुनिक तकनीकों से जो व्यापक अध्ययन किया, उसकी अधिकांश सिफारिशें भी लगभग वही हैं जो 50 वर्ष पहले मिश्रा समिति ने दी थीं।
मिश्रा समिति ने अलकनंदा नदी के तट पर मजबूत तटबंध बनाने, अनियंत्रित खनन और मलबा (टिपिंग) डालने पर रोक लगाने, नगर के निचले हिस्से में विस्फोटक गतिविधियों को प्रतिबंधित करने, नालों का वैज्ञानिक उपचार, सुदृढ़ ड्रेनेज एवं सीवर प्रणाली विकसित करने तथा भवन निर्माण को भूमि की भार-वहन क्षमता के अनुरूप नियंत्रित करने की सिफारिश की थी।
समिति की रिपोर्ट इतनी प्रभावशाली मानी गई कि 1990 के दशक में जब सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) हेलंग-मारवाड़ी बाईपास निर्माण पर अड़ा था, तब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी मिश्रा समिति की रिपोर्ट को आधार बनाते हुए इस परियोजना पर रोक लगा दी थी।
इसके बावजूद उत्तर प्रदेश और बाद में उत्तराखंड सरकार ने समिति की अधिकांश सिफारिशों को गंभीरता से लागू नहीं किया। परिणामस्वरूप वर्ष 2023 में जोशीमठ में व्यापक भू-धंसाव शुरू हुआ। अनेक मकान, होटल, गौशालाएं और अन्य भवन इसकी चपेट में आ गए तथा सैकड़ों परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए व्यापक सर्वेक्षण कर खतरे वाले क्षेत्रों को चिह्नित किया गया। प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर विस्थापित किया गया तथा क्षतिग्रस्त भवनों का मुआवजा दिया गया। इसके बाद भारत सरकार ने देश की आठ शीर्ष वैज्ञानिक संस्थाओं से जोशीमठ का विस्तृत भू-वैज्ञानिक अध्ययन कराया। आधुनिक तकनीकों से तैयार रिपोर्ट में नगर की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण उपाय सुझाए गए।
वैज्ञानिकों की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद भारत सरकार ने जोशीमठ के संरक्षण एवं पुनर्वास कार्यों के लिए लगभग 1,600 करोड़ रुपये स्वीकृत किए। इस योजना के अंतर्गत अलकनंदा तट पर तटबंध निर्माण, ढलानों (स्लोप) का संरक्षण, आधुनिक सीवर एवं ड्रेनेज व्यवस्था का निर्माण तथा मुआवजा प्राप्त कर चुके जर्जर भवनों को ध्वस्त कर उनका मलबा नगर से बाहर निर्धारित डंपिंग जोन तक पहुंचाने जैसे कार्य प्रस्तावित हैं।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिस प्रकार 1976 की मिश्रा समिति की चेतावनियों की अनदेखी का परिणाम 2023 की त्रासदी के रूप में सामने आया, क्या इस बार वैज्ञानिक संस्थाओं की सिफारिशों के अनुरूप सभी सुरक्षात्मक कार्य पूरी गंभीरता और गुणवत्ता के साथ किए जा रहे हैं? यदि आधी सदी पहले सुझाए गए उपाय समय पर लागू हो गए होते तो संभवतः जोशीमठ आज इस भीषण संकट से बच सकता था।
फिलहाल, देश की शीर्ष वैज्ञानिक संस्थाओं की सिफारिशों के आधार पर स्वीकृत भारी-भरकम धनराशि का पारदर्शी और प्रभावी उपयोग होना अत्यंत आवश्यक है। अब भू-धंसाव से प्रभावित लोगों सहित पूरे प्रदेश की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य और केंद्र सरकार की निगरानी में चल रहे ये सुरक्षात्मक कार्य जोशीमठ के भविष्य को कितना सुरक्षित बना पाते हैं।
