जंतर-मंतर में गालियाँ: गाली-गलौज का समाजशास्त्र
— देवेंद्र कुमार बुडाकोटी
हाल ही में प्रश्नपत्र लीक के विरोध में आयोजित एक प्रदर्शन के दौरान पोस्टरों, बैनरों, नारों और सोशल मीडिया रीलों में व्यापक रूप से अपमानजनक और अशोभनीय भाषा का प्रयोग देखने को मिला। सार्वजनिक आंदोलनों में इस प्रकार की गाली-गलौज आखिर क्या संकेत देती है? क्या यह पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी, पारिवारिक संस्कारों के क्षरण, शिष्टाचार में गिरावट और नैतिक मूल्यों के ह्रास का द्योतक है? क्या सार्वजनिक स्थानों पर किशोरों और युवाओं द्वारा इस तरह की भाषा का प्रयोग असभ्य और असंस्कृत व्यवहार नहीं है? क्या यह हमारे घरों और शिक्षण संस्थानों में बच्चों को दिए जा रहे संस्कारों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न नहीं लगाता?
नैतिक मूल्य किसी भी समाज की सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला होते हैं। इनका पहला पाठ परिवार में मिलता है, जबकि विद्यालय और समाज उन्हें सुदृढ़ करते हैं। पहले यदि बच्चे या युवा सार्वजनिक स्थानों पर अभद्र भाषा का प्रयोग करते थे, तो बड़े-बुज़ुर्ग तत्काल उन्हें टोकते और सुधारते थे। आज स्थिति बदल चुकी है। अधिकांश लोग हस्तक्षेप से बचते हैं, क्योंकि उन्हें विवाद या अप्रत्याशित प्रतिक्रिया का भय रहता है।
इस संदर्भ में एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी द्वारा सुनाई गई घटना उल्लेखनीय है। उन्होंने सड़क पर एक व्यक्ति को अपनी पत्नी की पिटाई करते देखा और बीच-बचाव किया। किंतु उनकी चिंता की सराहना करने के बजाय उस महिला ने ही उनसे कहा, “आप कौन होते हैं मेरे और मेरे पति के बीच हस्तक्षेप करने वाले?” यह घटना बताती है कि सामाजिक हस्तक्षेप की परंपरा किस प्रकार कमजोर पड़ती जा रही है।
आज अनेक लोग मित्रों और सहकर्मियों के बीच सामान्य बातचीत में भी गाली-गलौज का सहज प्रयोग करते हैं। बच्चे घर, बाज़ार, सड़क, बस, ट्रेन और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी भाषा सुनते हैं। वे बड़ों की टेलीफोन पर होने वाली बातचीत से भी अनजाने में इन्हें सीख लेते हैं। अनेक माता-पिता यह मानकर चलते हैं कि उनके बच्चे इन शब्दों को न तो समझते हैं और न ही उनका प्रयोग करते हैं, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। आज स्कूल जाने वाले अनेक बच्चे ऐसी गालियों से परिचित हैं और अपने साथियों के बीच उनका प्रयोग भी करते हैं। स्टैंड-अप कॉमेडी और सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और सामान्य बना दिया है, जिससे कम उम्र के बच्चे लगातार ऐसी भाषा के संपर्क में आ रहे हैं।
जब आम नागरिक सार्वजनिक स्थानों, विशेषकर विरोध प्रदर्शनों में, इस प्रकार के अपमानजनक नारे सुनते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से आहत और असहज महसूस करते हैं।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो प्रत्येक समाज में अपमानजनक शब्दों का अपना अलग शब्दकोश होता है। विभिन्न संस्कृतियों में प्रचलित अनेक गालियाँ रक्त-संबंधों के भीतर यौन संबंधों (अनाचार) से जुड़ी होती हैं, जिन्हें लगभग सभी समाजों में वर्जित माना गया है। अनेक गालियाँ माँ, बहन और बेटी जैसे संबंधों को लक्ष्य बनाती हैं। अन्य गालियाँ यौन अभिविन्यास, स्त्री-पुरुष जननांगों अथवा मानव जीवन के अत्यंत निजी पक्षों पर आधारित होती हैं।
भारत सहित अनेक पारंपरिक समाजों में यौन संबंधों को विवाह संस्था के भीतर ही स्वीकार्य माना गया है। इसी कारण “कुत्ता”, “कुतिया” और “वेश्या” जैसे शब्द अपमानसूचक गालियों के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इसी प्रकार “दलाल” नकारात्मक अर्थ रखता है, जबकि “भड़वा” जैसे शब्द वेश्यावृत्ति और मानव तस्करी से जुड़े होने के कारण और अधिक अपमानजनक माने जाते हैं।
वैचारिक अथवा राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, किंतु प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों अथवा किसी भी सार्वजनिक पदाधिकारी के लिए अभद्र और अश्लील भाषा का प्रयोग लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
इतिहास साक्षी है कि नारों ने स्वतंत्रता संग्राम, किसान आंदोलनों, श्रमिक संघर्षों और छात्र आंदोलनों को ऊर्जा, दिशा और प्रेरणा दी है। पहले की पीढ़ियों के नारे रचनात्मकता, गरिमा और शालीनता के प्रतीक थे। इसके विपरीत हाल के वर्षों में, विशेषकर जेन-ज़ेड के कुछ आंदोलनों में, अश्लील, अपमानजनक और अभद्र भाषा का प्रयोग बढ़ता दिखाई देता है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और अधिक बढ़ावा दिया है। कुछ लोग कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले वर्दीधारी कर्मियों के प्रति भी अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने लगे हैं।
यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह परिवार और समाज में शिष्टाचार तथा सभ्यता के निरंतर ह्रास का कारण बन सकती है। इसके साथ ही यह कानून-व्यवस्था के लिए नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकती है और सामाजिक सौहार्द को भी प्रभावित कर सकती है।
निस्संदेह प्रश्नपत्र लीक एक गंभीर समस्या है और उस पर कठोर कार्रवाई आवश्यक है। किंतु इसके समानांतर भारत के युवाओं की शिक्षा-पद्धति, मूल्यपरक शिक्षा और नैतिक विकास पर भी गंभीरता से ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
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लेखक समाजशास्त्री हैं, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र हैं तथा उनके शोध का उल्लेख नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन की पुस्तकों में किया गया है।

