जुगाड़ के सहारे जिंदगी पार : हर मानसून बच्चों और ग्रामीणों की जिंदगी दांव पर
Every monsoon, thousands of people in Uttarakhand risk their lives because of the lack of safe bridges. A Times of India report highlights how schoolchildren in Kopa village cross a reservoir by boat to attend school. Similar hardships exist across the state. In Bageshwar, students use hand-operated trolleys to cross rivers, while in Uttarkashi’s Bhankwad village, two women lost their lives in separate trolley accidents in 2023 and 2025. In Chamoli’s Pindar Valley, villages still depend on makeshift trolleys after bridges were washed away in the 2013 floods. Safe bridges remain essential for education, healthcare, and livelihoods.
कहीं नाव, कहीं ट्रॉली, कहीं उफनती नदी… स्कूल, अस्पताल और बाजार तक पहुंचना आज भी एक जंग

–जयसिंह रावत
उत्तराखंड में मानसून केवल बारिश नहीं लाता, बल्कि हजारों ग्रामीणों के लिए जीवन और मौत के बीच रोज होने वाली जद्दोजहद भी लेकर आता है। राज्य के अनेक दुर्गम इलाकों में आज भी पुल या तो कभी बने ही नहीं, या आपदाओं में बह जाने के बाद दोबारा नहीं बन सके। परिणाम यह है कि स्कूली बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और मरीज उफनती नदियों को पार करने के लिए ट्रॉलियों, छोटी नावों, रस्सियों और अस्थायी जुगाड़ों पर निर्भर हैं। हर बरसात के साथ उनका सफर किसी रोमांच नहीं, बल्कि मौत से मुकाबला बन जाता है।
हाल ही में द टाइम्स ऑफ इंडिया (देहरादून संस्करण) ने इस दर्दनाक तस्वीर को प्रमुखता से प्रकाशित किया है। रिपोर्ट बताती है कि ऊधमसिंह नगर जिले के कोपा गांव के 40-50 बच्चे प्रतिदिन हरिपुरा जलाशय को लकड़ी की छोटी नाव से पार कर स्कूल पहुंचते हैं। वहां न पुल है और न ही सरकारी नाविक। कई बार बच्चों को खुद ही नाव खेनी पड़ती है। तेज हवाओं और ऊंची लहरों के बीच यह सफर किसी भी समय हादसे में बदल सकता है। ग्रामीण पिछले 15 वर्षों से पुल की मांग कर रहे हैं, लेकिन आज तक उनकी सुनवाई नहीं हुई।
ट्रॉली ही बनी जीवनरेखा
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में अनेक गांवों के लिए ट्रॉली ही नदी पार करने का एकमात्र साधन है। बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र में छह गांवों के छात्र आज भी रामगंगा नदी पर हाथ से चलने वाली ट्रॉली से स्कूल जाते हैं। वर्ष 2018 में झूला पुल बाढ़ में बह गया था, लेकिन आठ वर्ष बाद भी नया पुल नहीं बन पाया। बच्चे रोज ट्रॉली से नदी पार करते हैं और अभिभावक पूरे समय किसी अनहोनी की आशंका में रहते हैं।
पिथौरागढ़ के बंगापानी, धारचूला और अन्य सीमांत क्षेत्रों में भी गौरीगंगा जैसी तेज बहाव वाली नदियों को ट्रॉलियों के सहारे पार करना आम बात है। उत्तरकाशी के सेक्कू गांव में भूस्खलन ने सड़क और पैदल रास्ते नष्ट कर दिए हैं। नैनीताल जिले के चुकुम गांव का वीडियो हाल ही में वायरल हुआ, जिसमें बच्चे सिर पर स्कूल बैग रखकर उफनती कोसी नदी पैदल पार करते दिखाई दिए।
जब ट्रॉली ही बन गई मौत का कारण
उत्तरकाशी जिले के मोरी ब्लॉक का भंक्वाड़ गांव इस व्यवस्था की भयावह कीमत चुका चुका है। टोंस नदी पर लगी ट्रॉली से नदी पार करते समय वर्ष 2023 और फिर 2025 में दो अलग-अलग महिलाओं की नदी में गिरकर मौत हो गई। इन घटनाओं ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया, लेकिन आज भी वहां सुरक्षित पुल का इंतजार खत्म नहीं हुआ है।
13 साल बाद भी नहीं बने पुल
चमोली जिले की पिंडर घाटी में वर्ष 2013 की भीषण आपदा कई पुलों को बहाकर ले गई थी। इसके बावजूद हरमनी, ओडर और हरमल जैसे गांवों के लोग आज भी स्थायी पुलों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ग्रामीण पिंडर नदी को ट्रॉली जैसे स्थानीय जुगाड़ों के सहारे पार करते हैं। बरसात के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने पर यह सफर और अधिक खतरनाक हो जाता है।
उत्तरकाशी जिले की नीला घाटी के स्युना गांव में भी लोग आज तक ट्रॉली के सहारे नदी पार कर रहे हैं। बीमार व्यक्ति, गर्भवती महिलाएं, स्कूली बच्चे और बुजुर्ग सभी इसी जोखिम भरी व्यवस्था पर निर्भर हैं। आपात स्थिति में अस्पताल तक पहुंचना कई बार असंभव हो जाता है।
शिक्षकों की भी रोज परीक्षा
दुर्गम क्षेत्रों में केवल बच्चे ही नहीं, शिक्षक भी जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंचते हैं। नैनीताल जिले के गेरीखेत प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाध्यापिका और सहायक शिक्षिका रोज जंगलों और भूस्खलन संभावित पहाड़ियों से पैदल गुजरकर विद्यालय पहुंचती हैं, क्योंकि गांव तक आज भी मोटर मार्ग नहीं है।
जहां सरकार नहीं पहुंची, वहां लोगों ने बनाया पुल
कुछ जगहों पर स्थानीय लोगों ने खुद पहल की। नैनीताल के सिरोड़ी गांव में वर्ष 2021 की आपदा में एकमात्र पुल बह गया था। वर्षों तक सरकारी मदद नहीं मिलने पर क्षेत्र पंचायत सदस्य नीलम मेहरा और उनके पति ने अपनी निजी बचत से 60 फुट लंबा लोहे का पैदल पुल बनवाकर ग्रामीणों की समस्या का समाधान किया। यह उदाहरण बताता है कि इच्छाशक्ति हो तो रास्ता निकल सकता है।
पुल केवल निर्माण नहीं, जीवन का आधार
उत्तराखंड के पहाड़ों में पुल केवल एक ढांचा नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और जीवन से जुड़ा बुनियादी आधार हैं। पुल न होने का अर्थ है कि बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाएंगे, मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंचेंगे, गर्भवती महिलाओं का सुरक्षित प्रसव संकट में पड़ेगा और किसानों की उपज बाजार तक नहीं पहुंचेगी।
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट ने एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को सामने रखा है, जिसे पहाड़ के लोग वर्षों से जी रहे हैं। कोपा, कपकोट, भंक्वाड़, स्युना, सेक्कू, हरमनी, ओडर और हरमल जैसे गांव बताते हैं कि उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों में विकास की असली कसौटी चौड़ी सड़कें नहीं, बल्कि सुरक्षित पुल हैं। जब तक हर गांव को सुरक्षित संपर्क नहीं मिलेगा, तब तक हर मानसून बच्चों के स्कूल जाने का रास्ता और ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी मौत के झूले पर ही झूलती रहेगी।
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(संदर्भ: The Times of India, देहरादून संस्करण, 1 अगस्त 2026, रिपोर्ट: “Every monsoon, kids undertake perilous journeys to reach school”. साथ ही उत्तरकाशी, चमोली, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और नैनीताल के विभिन्न वर्षों में प्रकाशित समाचार एवं क्षेत्रीय घटनाक्रम।)**
