विश्वविख्यात पर्वतारोही निरमल ‘निम्स’ पुर्जा की असमय विदाई
-विशांत अग्रवाला
कराकोरम की दुर्गम पर्वतमालाओं में स्थित 8,047 मीटर ऊंची ब्रॉड पीक पर आए भीषण हिमस्खलन ने विश्व पर्वतारोहण जगत को गहरा आघात पहुंचाया है। इस दुर्घटना में विश्वविख्यात पर्वतारोही, पूर्व ब्रिटिश स्पेशल फोर्स अधिकारी और नेपाल मूल के नीरमल “निम्स” पुर्जा सहित दस पर्वतारोहियों की मृत्यु हो गई। यह केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे कठिन पर्वत अभियानों में बढ़ते जोखिमों की एक गंभीर चेतावनी भी है।
रिकॉर्ड बनाने वाला असाधारण पर्वतारोही
नेपाल के म्याग्दी जिले में 1983 में जन्मे नीरमल पुर्जा ने साधारण जीवन से असाधारण ऊंचाइयों तक का सफर तय किया। ब्रिटिश सेना की ब्रिगेड ऑफ गुरखा में 16 वर्षों तक सेवा देने के बाद वे ब्रिटेन की प्रतिष्ठित स्पेशल बोट सर्विस (SBS) में शामिल होने वाले पहले गुरखा बने। वर्ष 2018 में उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिष्ठित एमबीई (Member of the Order of the British Empire) सम्मान से सम्मानित किया गया।
उनका पर्वतारोहण करियर 2012 में एवरेस्ट बेस कैंप की यात्रा से शुरू हुआ। वहीं से उनका जीवन बदल गया और उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को अपना लक्ष्य बना लिया।
जिसने पर्वतारोहण का इतिहास बदल दिया
वर्ष 2019 में नीरमल पुर्जा ने मात्र 6 महीने 6 दिन में दुनिया की सभी 14 आठ हजार मीटर से ऊंची चोटियों पर चढ़कर इतिहास रच दिया। इससे पहले यह रिकॉर्ड लगभग आठ वर्षों का था।
इसके बाद उन्होंने एक और असंभव समझे जाने वाले लक्ष्य को पूरा किया। वर्ष 2024 में उन्होंने सभी 14 आठ हजार मीटर से ऊंची चोटियों को बिना पूरक ऑक्सीजन के केवल दो वर्ष पांच महीने में पूरा किया।
उनकी उपलब्धियां यहीं नहीं रुकीं—
*2021 में सर्दियों में पहली बार के-2 शिखर पर सफल चढ़ाई करने वाली नेपाली टीम का हिस्सा बने।
* एवरेस्ट, ल्होत्से और मकालू पर मात्र दो दिन 30 मिनट में चढ़ाई कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
*उन्होंने कुल 57 सफल आठ हजार मीटर शिखर आरोहण किए, जिनमें 29 बिना ऑक्सीजन के थे।
उनके जीवन पर आधारित नेटफ्लिक्स की चर्चित डॉक्यूमेंट्री “14 Peaks: Nothing Is Impossible” ने उन्हें विश्वभर में लोकप्रिय बनाया।
अंतिम अभियान बना आखिरी सफर
21 जुलाई 2026 को नीरमल पुर्जा ने बिना ऑक्सीजन के गैशरब्रुम-2 (8,035 मीटर) पर सफल चढ़ाई कर अपना 57वां आठ हजार मीटर आरोहण पूरा किया। इसके बाद उन्होंने अंतिम समय में ब्रॉड पीक पर चढ़ाई का निर्णय लिया।
30 जुलाई को शिखर के समीप भीषण हिमस्खलन आ गया। पूरी अंतरराष्ट्रीय टीम इसकी चपेट में आ गई। बचाव अभियान खराब मौसम और लगातार हिमस्खलन के खतरे के कारण बेहद कठिन रहा। अंततः पुष्टि हुई कि अभियान में शामिल सभी दस पर्वतारोहियों की मृत्यु हो गई।
दुनिया भर से श्रद्धांजलि
इस दुर्घटना में नेपाल के छह, पाकिस्तान, चीन, अमेरिका और ओमान के एक-एक पर्वतारोही की जान गई। विश्व के प्रसिद्ध इतालवी पर्वतारोही रेनहोल्ड मेसनर सहित अनेक दिग्गजों ने नीरमल पुर्जा को आधुनिक पर्वतारोहण का महानायक बताया।
दुर्घटना से कुछ दिन पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा था—
“मैं पहाड़ों को कभी हल्के में नहीं लेता। मैं केवल सुरक्षित ऊपर और नीचे लौटने की प्रार्थना करता हूं।”
आज यह संदेश उनकी अंतिम विरासत बन गया है।
क्या बढ़ रहा है हिमालय का खतरा?
हाल के वर्षों में हिमालय और कराकोरम क्षेत्र में पर्वतारोहण दुर्घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं, बर्फ की परतें अस्थिर हो रही हैं और हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। मौसम भी पहले की तुलना में अधिक अप्रत्याशित हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक उपकरणों और बेहतर तकनीक के बावजूद प्रकृति के सामने मनुष्य की सीमाएं आज भी बनी हुई हैं। ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, तेज हवाएं, अचानक बदलता मौसम और हिमस्खलन जैसे खतरे किसी भी अनुभवी पर्वतारोही के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं।
एक प्रेरणा, जो हमेशा जीवित रहेगी
नीरमल पुर्जा ने केवल रिकॉर्ड नहीं बनाए, बल्कि यह भी साबित किया कि दृढ़ इच्छाशक्ति, अनुशासन और साहस से असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं। उनकी मृत्यु पर्वतारोहण जगत के लिए अपूरणीय क्षति है, लेकिन उनकी उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के पर्वतारोहियों को प्रेरित करती रहेंगी।
उनकी जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि शिखर जीतना महान है, लेकिन पर्वत के प्रति विनम्र रहना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।
