हर मानसून में ढहते पुल: कौन जिम्मेदार ? इंजीनियरिंग या इंजीनियर ?
सुरक्षित पुलों के बिना हिमालयी विकास का सपना अधूरा
– जयसिंह रावत
उत्तराखंड में पुल केवल कंक्रीट, स्टील और सीमेंट से बनी संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि पहाड़ के लोगों के लिए जीवनरेखा हैं। इन्हीं पुलों से मरीज अस्पताल पहुंचते हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं, किसान अपनी उपज बाजार तक ले जाते हैं, पर्यटक चारधाम पहुंचते हैं और आपदा के समय राहत एवं बचाव दल प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचते हैं। इसलिए जब कोई पुल ढहता है तो केवल एक ढांचा नहीं टूटता, बल्कि पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, सामाजिक जीवन और प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होती है। विडंबना यह है कि उत्तराखंड में लगभग हर मानसून में किसी न किसी पुल के बहने, क्षतिग्रस्त होने या निर्माणाधीन पुल के ढहने की खबर सामने आती है, लेकिन हर घटना के बाद जांच, बयान और आश्वासन का वही सिलसिला दोहराया जाता है।
विशेषज्ञ उठा रहे सवाल
प्रख्यात वास्तुकार एवं टाउन प्लानर गौतम भाटिया ने अपने एक लेख “When Bridges Keep Collapsing, It’s Time to Question How India Builds” में यही मूल प्रश्न उठाया है कि आखिर भारत में पुल बार-बार क्यों गिर रहे हैं? उनके अनुसार यह केवल इंजीनियरिंग की विफलता नहीं, बल्कि पूरी निर्माण संस्कृति, ठेकेदारी व्यवस्था, गुणवत्ता नियंत्रण और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। उनका कहना है कि जब सार्वजनिक परियोजनाओं में गुणवत्ता की जगह सबसे कम लागत वाली निविदा निर्णायक बन जाती है, तब दुर्घटनाएं लगभग तय हो जाती हैं। उत्तराखंड की परिस्थितियां उनके इस विश्लेषण की पुष्टि करती प्रतीत होती हैं।
उत्तराखंड में हादसों का लंबा इतिहास
उत्तराखंड में पुलों के क्षतिग्रस्त होने की घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं। वर्ष 2012 में श्रीनगर (गढ़वाल) के समीप निर्माणाधीन चौरास पुल ढह गया था। बाद में तकनीकी अध्ययन में डिजाइन और निर्माण संबंधी गंभीर खामियां सामने आईं। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा में मंदाकिनी, अलकनंदा और भागीरथी घाटियों के अनेक मोटर पुल और पैदल पुल बह गए, जिससे कई गांव हफ्तों तक देश से कटे रहे। वर्ष 2021 में ऋषिगंगा–धौलीगंगा आपदा में भी कई पुल और संपर्क मार्ग नष्ट हो गए। जुलाई 2022 में रुद्रप्रयाग के नरकोटा में ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर निर्माणाधीन पुल भारी वर्षा के दौरान ढह गया। हाल में देहरादून के नंदा की चौकी क्षेत्र में लगभग 16 करोड़ रुपये की लागत से बना नया पुल पहली ही बरसात में क्षतिग्रस्त हो गया। यह घटना विशेष रूप से चिंताजनक इसलिए है क्योंकि इस बार सवाल पुराने पुलों की जर्जरता का नहीं, बल्कि नए निर्माण की गुणवत्ता का है।
ऑडिट रिपोर्ट ने भी दी थी चेतावनी
गुजरात के मोरबी पुल हादसे के बाद उत्तराखंड सरकार ने राज्य के पुलों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराया था। इस ऑडिट में राज्य के 3,262 पुलों में से 2,618 पुलों का निरीक्षण किया गया। रिपोर्ट में 36 पुलों को यातायात के लिए पूरी तरह असुरक्षित घोषित किया गया, जबकि बड़ी संख्या में अन्य पुलों की तत्काल मरम्मत और सुदृढ़ीकरण की सिफारिश की गई। सरकार ने ‘ब्रिज बैंक’ बनाने और पुराने पुलों को चरणबद्ध ढंग से बदलने की घोषणा भी की थी।
लेकिन आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि चार वर्ष बाद उन 36 असुरक्षित पुलों का क्या हुआ? कितनों का पुनर्निर्माण हुआ? कितनों की मरम्मत हुई? और कितने आज भी लोगों के लिए खतरा बने हुए हैं? यदि सरकार हर वर्ष पुलों की अद्यतन “ब्रिज हेल्थ रिपोर्ट” सार्वजनिक करे, तो जनता भी जान सकेगी कि जिस पुल से वह प्रतिदिन गुजर रही है, वह कितना सुरक्षित है।
क्या केवल बारिश जिम्मेदार है?
हर दुर्घटना के बाद प्रशासन का पहला तर्क होता है कि अत्यधिक वर्षा या बाढ़ के कारण पुल क्षतिग्रस्त हुआ। लेकिन यदि केवल बारिश ही कारण होती, तो समान परिस्थितियों में सभी पुल क्यों नहीं गिरते?
भारतीय सड़क कांग्रेस (आईआरसी) के दिशा-निर्देशों और अनेक संरचनात्मक इंजीनियरों के अध्ययन बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में पुलों की विफलता के पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं। इनमें नदी के बहाव और स्कॉर (पुल के पायों के आसपास मिट्टी का कटाव) का गलत आकलन, कमजोर भू-तकनीकी जांच, निर्माण सामग्री की खराब गुणवत्ता, निर्माण के दौरान अपर्याप्त निगरानी, समय पर रखरखाव का अभाव, क्षमता से अधिक भार तथा सबसे कम बोली वाली ठेकेदारी प्रणाली प्रमुख हैं। गौतम भाटिया भी अपने लेख में इसी व्यवस्था को मूल समस्या बताते हैं।
हिमालय के लिए अलग इंजीनियरिंग चाहिए
आईआईटी रुड़की सहित अनेक विशेषज्ञ संस्थान लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालय दुनिया की सबसे युवा और भूगर्भीय दृष्टि से सबसे अस्थिर पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यहां पुलों की डिजाइन मैदानी क्षेत्रों जैसी नहीं हो सकती। बादल फटना, ग्लेशियर झीलों का फटना (जीएलओएफ), मलबा बाढ़, भूस्खलन, तीव्र भूकंप और नदियों के प्रवाह में अचानक बदलाव जैसी परिस्थितियों को डिजाइन का आधार बनाना होगा। जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसलिए दशकों पुराने वर्षा और बाढ़ के आंकड़ों के आधार पर तैयार डिजाइन अब पर्याप्त नहीं माने जा सकते।
निर्माण से अधिक जरूरी रखरखाव
भारत में नई परियोजनाओं के उद्घाटन को विकास का प्रतीक माना जाता है, लेकिन पुराने पुलों की नियमित जांच शायद ही कभी सार्वजनिक चर्चा का विषय बनती है। अमेरिका, जापान और यूरोप के अनेक देशों में प्रत्येक पुल का डिजिटल हेल्थ कार्ड बनाया जाता है। आधुनिक सेंसर पुलों में आने वाली दरार, कंपन, झुकाव और भार की लगातार निगरानी करते हैं तथा स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा नियमित संरचनात्मक ऑडिट कराया जाता है। उत्तराखंड में भी ऐसी प्रणाली अपनाने की आवश्यकता है, विशेषकर उन पुलों पर जो चारधाम यात्रा, सीमांत क्षेत्रों और आपदा संवेदनशील इलाकों में स्थित हैं।
अब क्या किया जाना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य के प्रत्येक पुल का डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए। मानसून से पहले और बाद में अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट हो। 25 से 30 वर्ष पुराने पुलों की विशेष निगरानी की जाए। ड्रोन, सेंसर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निरीक्षण तकनीक अपनाई जाए। निर्माण एजेंसियों, डिजाइन सलाहकारों और निगरानी अधिकारियों की जवाबदेही व्यक्तिगत स्तर पर तय हो। सबसे कम बोली के बजाय गुणवत्ता आधारित निविदा प्रणाली लागू की जाए तथा प्रत्येक पुल की सुरक्षा स्थिति सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाए।
विकास की असली परीक्षा
उत्तराखंड आज चारधाम ऑल वेदर रोड, सुरंगों, रोपवे और आधुनिक सड़क परियोजनाओं के नए दौर से गुजर रहा है। लेकिन यदि इन परियोजनाओं की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी—पुल—ही सुरक्षित नहीं होंगे, तो पूरा विकास ढांचा कमजोर साबित होगा। गौतम भाटिया का संदेश उत्तराखंड के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पूरे देश के लिए। पुलों की मजबूती केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं, बल्कि सुशासन, पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही की कसौटी है।
हर मानसून में पुलों के गिरने की खबरें अब सामान्य नहीं मानी जानी चाहिए। असली प्रश्न यह नहीं कि अगला पुल कब ढहेगा, बल्कि यह है कि क्या हमने पिछले हादसों से वास्तव में कोई सबक सीखा है,
