जननेता, रणनीतिकार और कम्युनिस्ट आंदोलन के स्तंभ- हरकिशन सिंह सुरजीत
(23 मार्च 1916 – 1 अगस्त 2008)
— अनन्त आकाश
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के शीर्ष नेताओं में शामिल कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत का नाम उन विरले राजनेताओं में लिया जाता है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर स्वतंत्र भारत की राजनीति तक अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता, संगठन क्षमता और दूरदर्शी राजनीतिक समझ की अमिट छाप छोड़ी। 23 मार्च 1916 को पंजाब में जन्मे सुरजीत का निधन 1 अगस्त 2008 को हुआ। उनका लगभग साढ़े सात दशक लंबा सार्वजनिक जीवन संघर्ष, त्याग और जनप्रतिबद्धता का अद्वितीय उदाहरण है।
भगत सिंह की शहादत से प्रेरित होकर सुरजीत किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। मात्र 16 वर्ष की आयु में, मार्च 1932 में उन्होंने होशियारपुर जिला न्यायालय पर तिरंगा फहराया। इस साहसिक कदम के लिए उन्हें गिरफ्तार कर किशोर सुधार गृह भेजा गया। रिहाई के बाद उनका संपर्क पंजाब के शुरुआती कम्युनिस्ट नेताओं से हुआ और 1934 में वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने। 1935 में उन्होंने कांग्रेस समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की तथा 1938 में पंजाब किसान सभा के सचिव चुने गए।
ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पंजाब से निष्कासित कर दिया, जिसके बाद वे सहारनपुर पहुंचे और ‘चिंगारी’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वे भूमिगत रहे, लेकिन 1940 में गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें लाहौर किले में एकांत कारावास में रखा गया और बाद में देओली नजरबंदी शिविर भेजा गया, जहां वे 1944 तक रहे। देश के विभाजन के समय उन्होंने पंजाब में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
स्वतंत्रता आंदोलन और जनसंघर्षों के दौरान उन्होंने लगभग दस वर्ष जेल में बिताए, जिनमें आठ वर्ष अंग्रेजी शासन के दौरान थे। इसके अतिरिक्त वे आठ वर्ष भूमिगत रहकर भी आंदोलन का नेतृत्व करते रहे। संघर्ष और त्याग उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान रहे।
जनवरी 1954 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तीसरी कांग्रेस में उन्हें केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो का सदस्य चुना गया। 1964 में पार्टी विभाजन के दौरान उन्होंने संशोधनवाद का विरोध करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसी वर्ष वे सीपीआई (एम) के पोलित ब्यूरो के सदस्य बने और चार दशकों तक पार्टी की नीतियों, कार्यक्रमों और रणनीति के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाते रहे।
किसान आंदोलन उनके राजनीतिक जीवन का आधार था। उन्होंने पंजाब में किसानों के अधिकारों के लिए अनेक संघर्षों का नेतृत्व किया तथा लंबे समय तक अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष और महासचिव रहे। किसानों के बीच उनकी गहरी पैठ और संगठन क्षमता ने वाम आंदोलन को मजबूत आधार प्रदान किया।
सुरजीत केवल एक संगठनकर्ता ही नहीं, बल्कि देश के सबसे कुशल राजनीतिक रणनीतिकारों में भी गिने जाते थे। 1989, 1996 और 2004 में गैर-भाजपा सरकारों के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे धर्मनिरपेक्ष राजनीति के प्रबल समर्थक थे और जीवनभर सांप्रदायिकता का डटकर विरोध करते रहे। उनका मानना था कि भारत की लोकतांत्रिक और बहुलतावादी पहचान की रक्षा ही राष्ट्रीय एकता की सबसे मजबूत नींव है।
पंजाब में उग्रवाद और खालिस्तानी आतंकवाद के दौर में उन्होंने साहसपूर्वक सांप्रदायिक और अलगाववादी शक्तियों का मुकाबला किया। जम्मू-कश्मीर और असम जैसे जटिल राष्ट्रीय प्रश्नों पर भी उन्होंने संवाद, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता के पक्ष में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। सीपीआई (एम) के अंतरराष्ट्रीय विभाग का उन्होंने लगभग तीन दशकों तक नेतृत्व किया। वियतनाम के मुक्ति संघर्ष, फिलिस्तीनी जनता के अधिकारों तथा क्यूबा के समर्थन जैसे अंतरराष्ट्रीय जनआंदोलनों के प्रति उन्होंने लगातार एकजुटता व्यक्त की और विश्वभर की वामपंथी एवं प्रगतिशील पार्टियों के साथ मजबूत संबंध स्थापित किए।
सोवियत संघ के विघटन के बाद जब विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन वैचारिक संकट से गुजर रहा था, तब सुरजीत ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद की वैज्ञानिक समीक्षा, आत्मालोचन और बदलते समय के अनुरूप वैचारिक विकास पर विशेष बल दिया। उनका विश्वास था कि किसी भी विचारधारा की जीवंतता उसकी आलोचनात्मक समीक्षा और जनता के अनुभवों से सीखने में निहित होती है।
वे दो बार पंजाब विधानसभा के सदस्य तथा राज्यसभा के सदस्य भी रहे। भूमि सुधार, पंजाब की राजनीति और कम्युनिस्ट आंदोलन पर उन्होंने कई महत्वपूर्ण पुस्तकें और असंख्य लेख लिखे। सीपीआई (एम) के महासचिव के रूप में उन्होंने लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और जनपक्षधर राजनीति को नई दिशा देने का कार्य किया।
कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सिद्धांत, संघर्ष और जनसेवा यदि एक साथ चलें तो राजनीति केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का प्रभावी औजार बन सकती है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि ।
