क्रांतिकारी हैं कैंसर की नई दवाएं, लेकिन मरीजों को क्यों नहीं मिल पा रहा इनका लाभ?

टारगेटेड जीन थेरेपी कैंसर को रोकने में बेहद प्रभावी साबित हो रही है, लेकिन इन उपचारों की भारी लागत और चिकित्सा प्रणाली में बदलाव की धीमी गति के कारण यह आज भी कई मरीजों की पहुंच से दूर है।
(न्यूयॉर्क टाइम्स की स्वास्थ्य और विज्ञान रिपोर्टर जीना कोलाटा की रिपोर्ट पर आधारित)
थकान और एक चौंकाने वाला सच जॉन एबर्स अपने परिवार के साथ स्कीइंग ट्रिप का आनंद ले रहे थे, लेकिन अत्यधिक थकान ने उनके इस ट्रिप का मजा किरकिरा कर दिया था। 46 वर्षीय जॉन पेशे से एक कमर्शियल मधुमक्खी पालक (Beekeeper) हैं। वह उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, “मैंने अपनी पत्नी की तरफ देखा और कहा, ‘यार, मुझे अपनी फिटनेस बेहतर करने की जरूरत है।'”
लेकिन महज चार हफ्ते से भी कम समय में जॉन को पता चला कि समस्या उनके फिटनेस स्तर से कहीं ज्यादा खौफनाक थी। उनकी आंत (colon) की दीवार में एक ट्यूमर पनप चुका था जो अब उनके लिम्फ नोड्स (लसीका ग्रंथियों) तक फैल गया था। उन्हें स्टेज 3 का कोलोरेक्टल (आंत का) कैंसर था।
कीमोथेरेपी का दर्द और अनजाने विकल्प इलाज के लिए, जॉन एबर्स ने ग्रैंड रैपिड्स, मिशिगन स्थित ‘कैंसर एंड हेमेटोलॉजी सेंटर्स’ में एक स्थानीय ऑन्कोलॉजिस्ट (कैंसर विशेषज्ञ) से संपर्क किया। उन्हें इलाज के तौर पर कीमोथेरेपी लिखी गई। जैसा कि क्लिनिक के एक प्रतिनिधि ने भी माना कि कैंसर के इलाज में यही मानक प्रक्रिया (Standard of care) है, भले ही यह अक्सर मरीज को शारीरिक रूप से पूरी तरह से तोड़ देती है। जॉन एबर्स के लिए भी कीमोथेरेपी के दर्द और इसके दुष्प्रभावों को बर्दाश्त करना लगभग नामुमकिन हो गया था।
लेकिन उस समय उन्हें जो सबसे जरूरी बात नहीं बताई गई, वह यह थी कि उनके लिए इलाज का एक और विकल्प भी मौजूद था— एक ऐसा रास्ता जिसकी शुरुआत कैंसर के जेनेटिक मेकअप (आनुवंशिक संरचना) की सीक्वेंसिंग से होती है।
क्या है जेनेटिक टेस्टिंग और ‘टारगेटेड जीन थेरेपी’? यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो अंसचुट्ज कैंसर सेंटर के डॉ. क्रिस्टोफर लियू के अनुसार, जेनेटिक टेस्टिंग (आनुवंशिक जांच) से यह पता लगाया जा सकता था कि क्या मेडिकल साइंस में ऐसी दवाएं उपलब्ध हैं जो सीधे और सटीक रूप से जॉन एबर्स के कैंसर पर हमला कर सकती हैं। ‘टारगेटेड ड्रग्स’ (लक्षित दवाएं) उन मरीजों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं जो कीमोथेरेपी नहीं करवाना चाहते, जिन्हें कीमोथेरेपी से गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं, या जिनका कैंसर शरीर में बुरी तरह फैल चुका है।

कोलोरेक्टल कैंसर एलायंस नामक संस्था के चिकित्सा वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. लियू कहते हैं, “अगर जॉन एबर्स की ‘बायोमार्कर टेस्टिंग’ (Biomarker testing) हुई होती, तो उनके कैंसर के इलाज के लिए नई, कहीं अधिक प्रभावी और संभावित रूप से कम नुकसानदेह थेरेपी का विकल्प खुल सकता था।”
मरीजों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा यह क्रांतिकारी इलाज? जीन और डीएनए आधारित इन नई दवाओं ने कैंसर के इलाज में एक बड़ी क्रांति ला दी है। ये लक्षित दवाएं केवल कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाती हैं, जिससे स्वस्थ कोशिकाओं को कम से कम नुकसान पहुंचता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि मरीजों को इनका फायदा क्यों नहीं मिल पा रहा है? इसके पीछे कुछ मुख्य कारण हैं:
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चिकित्सा प्रणाली में धीमी गति: विज्ञान बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन कई बार स्थानीय अस्पतालों और डॉक्टरों तक इन नई और जटिल दवाओं के प्रोटोकॉल पहुंचने में काफी समय लग जाता है। वे अभी भी पुरानी और पारंपरिक ‘स्टैंडर्ड ऑफ केयर’ (जैसे सर्जरी और कीमोथेरेपी) पर ही निर्भर रहते हैं।
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जागरूकता का अभाव: अक्सर मरीजों (और कई बार खुद चिकित्सकों) को यह पता ही नहीं होता कि इलाज शुरू करने से पहले ‘जेनेटिक टेस्टिंग’ या ‘बायोमार्कर टेस्टिंग’ कराना कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।
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अत्यधिक लागत: इन नई दवाओं और उससे पहले होने वाले जेनेटिक टेस्ट्स की कीमत बहुत ज्यादा होती है, जिसे उठाना आम मरीजों के लिए आसान नहीं होता। कई बीमा कंपनियां भी आसानी से इन नई उपचार पद्धतियों को कवर नहीं करतीं।
जब तक कैंसर के इलाज में बायोमार्कर टेस्टिंग को प्राथमिक हिस्सा नहीं बनाया जाता और इन नई दवाओं की लागत को वहन करने योग्य नहीं किया जाता, तब तक मेडिकल साइंस की इस सबसे बड़ी क्रांति का लाभ जॉन एबर्स जैसे अनगिनत मरीजों तक पहुंचना एक चुनौती ही बना रहेगा।a
