अरुणाचल में चीनी घुसपैठ के फर्जी वीडियो से दुष्प्रचार, सेना ने खोली पोल

नई दिल्ली, 28 अक्टूबर। भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिकों की कथित घुसपैठ और कुछ भारतीय क्षेत्रों पर चीन का नियंत्रण स्थापित होने के दावों को भ्रामक बताते हुए सोशल मीडिया पर प्रसारित तीन वीडियो की वास्तविकता उजागर की है। सेना के आधिकारिक तथ्य-जांच अभियान में सामने आया है कि इन वीडियो में पुराने दृश्यों, डिजिटल रूप से बदली गई सामग्री और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से तैयार कथित बयानों का इस्तेमाल किया गया है। इनका उद्देश्य अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर तनाव और चीनी सैन्य गतिविधियों को लेकर गलत धारणा पैदा करना बताया गया है।
दैनिक अख़बारों में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सेना ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया खाते पर इन वीडियो का खंडन करते हुए इन्हें शरारती तत्वों द्वारा फैलाया जा रहा भ्रामक दुष्प्रचार बताया है। सेना ने स्पष्ट किया है कि वीडियो में दिखाए गए दृश्य और उनके साथ जोड़े गए दावे वास्तविक घटनाओं से मेल नहीं खाते। कुछ मामलों में मूल वीडियो किसी दूसरे स्थान और अलग समय की घटनाओं से संबंधित पाए गए हैं।
वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के नाम से गढ़ा गया बयान
दुष्प्रचार का पहला मामला एक ऐसे वीडियो से जुड़ा है, जिसमें भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल गिरीश कालिया के नाम से अरुणाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों पर चीन का नियंत्रण स्थापित होने संबंधी बयान प्रसारित किया गया। वीडियो को इस तरह प्रस्तुत किया गया, मानो किसी वरिष्ठ भारतीय सैन्य अधिकारी ने स्वयं चीन के कब्जे की पुष्टि की हो।
सेना की तथ्य-जांच में यह दावा गलत पाया गया। सेना के अनुसार, वीडियो में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार सामग्री का इस्तेमाल कर लेफ्टिनेंट जनरल गिरीश कालिया के नाम से ऐसे कथन जोड़े गए, जो उन्होंने दिए ही नहीं थे। इस प्रकार के वीडियो को सामान्यतः ‘डीपफेक’ कहा जाता है। इसमें किसी व्यक्ति के वास्तविक चित्र या आवाज का इस्तेमाल कर ऐसे कथन प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता।
सेना ने बताया कि संबंधित मूल वीडियो 27 अक्टूबर 2023 का है। उस समय गिरीश कालिया जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में सेना की 28 इन्फैंट्री डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग थे। वीडियो वहां आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन का था, जिसमें उन्होंने नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ रोकने के लिए की गई सैन्य कार्रवाइयों की जानकारी दी थी।
उस संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने घुसपैठ की 10 कोशिशें विफल किए जाने, 27 आतंकवादियों के मारे जाने तथा हथियार, युद्ध सामग्री और मादक पदार्थ बरामद किए जाने की जानकारी दी थी। इस पुराने संवाददाता सम्मेलन के दृश्यों को बदलकर अरुणाचल प्रदेश में चीनी कब्जे से संबंधित कथित बयान के रूप में प्रसारित किया गया।
इससे स्पष्ट होता है कि वीडियो में दिखाई देने वाला सैन्य अधिकारी और मूल संवाददाता सम्मेलन वास्तविक थे, लेकिन उनके नाम से प्रसारित नया दावा वास्तविक नहीं था।
कजाखस्तान के सैन्य अभ्यास को अरुणाचल में टकराव बताया
दूसरा मामला अरुणाचल प्रदेश के तक्सिंग क्षेत्र में भारतीय और चीनी सैनिकों के कथित आमने-सामने आने से संबंधित है। सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो के साथ दावा किया गया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच तनाव बढ़ गया है और भारतीय सेना को अत्यधिक सतर्क कर दिया गया है।
भारतीय सेना की जांच में सामने आया कि यह वीडियो अरुणाचल प्रदेश का नहीं, बल्कि कजाखस्तान के विशेष अभियान बलों के सैन्य अभ्यास का है। इस अभ्यास के दृश्यों को गलत स्थान और संदर्भ से जोड़कर भारत-चीन सीमा पर सैन्य टकराव का प्रमाण बताने का प्रयास किया गया।
इस प्रकार एक दूसरे देश में आयोजित सैन्य अभ्यास को भारतीय सीमा की घटना के रूप में प्रस्तुत किया गया। सेना ने संबंधित दावे को भ्रामक बताया है।
सिक्किम में व्यापारिक वाहनों को बताया चीनी सेना की घुसपैठ
एक अन्य वीडियो में चीन के वाहनों को भारतीय सीमा में प्रवेश करते दिखाकर दावा किया गया कि चीनी सैनिक बिना अनुमति भारतीय क्षेत्र में घुस आए हैं। कुछ सोशल मीडिया संदेशों में यह आरोप भी लगाया गया कि भारतीय समाचार माध्यम इस घटना को छिपा रहे हैं।
सेना ने स्पष्ट किया कि वीडियो में दिखाई देने वाले वाहन चीनी कंपनी जेएसी के व्यावसायिक वाहन हैं। ये सिक्किम के नाथू ला दर्रे के उस क्षेत्र में दिखाई दे रहे थे, जो भारत और चीन के बीच निर्धारित सीमा व्यापार केंद्र है।
नाथू ला भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। यहां निर्धारित द्विपक्षीय व्यवस्थाओं और नियामक प्रक्रियाओं के अंतर्गत व्यापारिक गतिविधियां संचालित होती हैं। सेना के अनुसार, अधिकृत व्यापार मार्ग पर व्यावसायिक वाहनों की आवाजाही को चीनी सेना की घुसपैठ बताना तथ्यों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करना है।
सेना की तथ्य-जांच में यह भी सामने आया कि 26 अक्टूबर को सुबह 8 बजकर 26 मिनट से दोपहर 12 बजकर 56 मिनट के बीच 12 सोशल मीडिया खातों से एक जैसी भ्रामक सामग्री प्रसारित की गई थी। सेना ने इसे समन्वित तरीके से गलत सूचना फैलाने का उदाहरण बताया।
सेवानिवृत्त सैन्य कमांडर का बयान भी बदला
सेना ने एक और वीडियो का खंडन किया है, जिसमें पश्चिमी कमान के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार के नाम से अरुणाचल प्रदेश के संबंध में कथित चेतावनी प्रसारित की गई थी।
वीडियो में ऐसा दिखाने का प्रयास किया गया कि उन्होंने अरुणाचल प्रदेश को भारत के लिए अगला बड़ा सैन्य टकराव क्षेत्र बनने की आशंका व्यक्त की है।
सेना के अनुसार, यह वीडियो भी डिजिटल रूप से बदला गया था। इसका मूल दृश्य 30 मार्च 2026 को पंचकूला के चंडीमंदिर में आयोजित उनके संवाददाता सम्मेलन का था। सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले हुई इस बातचीत में उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर, ऑपरेशन राहत, सैन्य तैयारियों तथा पश्चिमी कमान की विभिन्न गतिविधियों पर चर्चा की थी।
सेना ने स्पष्ट किया कि उन्होंने अरुणाचल प्रदेश को भारत का अगला बड़ा सैन्य संघर्ष क्षेत्र बनने संबंधी कोई बयान नहीं दिया था।
सेना के तथ्य-जांच खाते के अनुसार, इस वीडियो को प्रसारित करने वाले कुछ खातों की पहचान पाकिस्तानी दुष्प्रचार खातों के रूप में की गई है। हालांकि, इस आरोप को संबंधित खातों के बारे में सेना का निष्कर्ष समझना चाहिए।
भ्रामक वीडियो को लेकर राजनीतिक विवाद
इन वीडियो के प्रसार ने राजनीतिक विवाद भी पैदा कर दिया है। कांग्रेस प्रवक्ता ऋतु चौधरी द्वारा संबंधित सामग्री साझा किए जाने के बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस पर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय में गलत सूचना फैलाने का आरोप लगाया और सार्वजनिक माफी की मांग की।
भारतीय जनता पार्टी के अन्य नेताओं ने भी आरोप लगाया कि बिना सत्यापन के ऐसे वीडियो प्रसारित करने से सेना की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास को नुकसान पहुंच सकता है।
दूसरी ओर, इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सीमा सुरक्षा से संबंधित सरकारी दावों पर सवाल उठाना और फर्जी वीडियो को वास्तविक प्रमाण के रूप में प्रसारित करना दो अलग बातें हैं। किसी भी राजनीतिक दल या नागरिक को राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी विषयों पर सवाल उठाने का अधिकार है, लेकिन उसके समर्थन में प्रस्तुत सामग्री की प्रामाणिकता आवश्यक है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से दुष्प्रचार की नई चुनौती
इन घटनाओं ने आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग से उत्पन्न गंभीर चुनौती को सामने रखा है। अब किसी वास्तविक सैन्य अधिकारी के पुराने वीडियो में उसकी आवाज और होंठों की गतिविधियों को बदलकर ऐसा बयान तैयार करना संभव हो गया है, जो देखने और सुनने में वास्तविक प्रतीत हो।
विशेष रूप से सैन्य अधिकारियों के कथित बयान अधिक प्रभावशाली होते हैं, क्योंकि आम नागरिक उन्हें आधिकारिक और विश्वसनीय जानकारी मान सकते हैं। यदि ऐसी सामग्री में सीमा पर कब्जे, सैनिकों की आपूर्ति बाधित होने अथवा युद्ध की आशंका जैसे दावे शामिल हों तो उसका प्रभाव और गंभीर हो सकता है।
इस पूरे प्रकरण में तीन प्रकार की भ्रामक सामग्री सामने आई है। पहले प्रकार में वास्तविक सैन्य अधिकारी के वीडियो को बदलकर फर्जी बयान जोड़ा गया। दूसरे में किसी अन्य देश के सैन्य अभ्यास को भारतीय सीमा की घटना बताया गया। तीसरे में अधिकृत व्यापारिक गतिविधियों को सैन्य घुसपैठ के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि हर भ्रामक वीडियो पूरी तरह नकली होना आवश्यक नहीं है। कई बार वास्तविक दृश्यों को गलत समय, स्थान या संदर्भ से जोड़कर भी झूठी कहानी तैयार की जा सकती है।
भारतीय सेना ने लोगों से अपील की है कि वे संवेदनशील सैन्य घटनाओं से संबंधित वीडियो को साझा करने से पहले उनके मूल स्रोत, समय, स्थान और आधिकारिक संदर्भ की जांच करें।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। सेना की तथ्य-जांच से संबंधित वायरल वीडियो और उनके साथ जोड़े गए दावे गलत साबित हुए हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत-चीन सीमा से जुड़े सभी विवाद समाप्त हो गए हैं अथवा सीमा की प्रत्येक स्थिति का स्वतंत्र सत्यापन हो चुका है। लेकिन जिन विशिष्ट घटनाओं को इन वीडियो के माध्यम से प्रमाणित करने का प्रयास किया गया, उनके समर्थन में प्रस्तुत दृश्य प्रामाणिक नहीं पाए गए।

