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आयुर्वेद हड्डियों को मजबूत बनाने और कमज़ोरी को रोकने के लिए समग्र उपाय प्रदान करता है

The Ministry of Ayush promotes Ayurveda’s holistic approach—balanced diet, lifestyle, activity and traditional therapies—to prevent osteoporosis, a silent disease that weakens bones and raises fracture risk, especially in the elderly and post-menopausal women. Ayurveda links bone health to Asthi dhatu and Vata balance. Rasayana therapies, medicated oil massage, herbal formulations and nutrient-rich foods support strong bones. Early intervention, combined with modern check-ups when needed, aids healthy ageing.

— उषा रावत –

आयुष मंत्रालय के अनुसार, आयुर्वेद संतुलित आहार, स्वस्थ जीवनशैली, शारीरिक सक्रियता और पारंपरिक उपचार पद्धतियों के माध्यम से हड्डियों के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। ऑस्टियोपोरोसिस हड्डियों से संबंधित एक ऐसी स्थिति है, जिसमें हड्डियों का घनत्व और मजबूती कम होने लगती है। इससे हड्डियों के टूटने का जोखिम बढ़ जाता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे विकसित होती है और शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। इसी कारण इसे ‘खामोश बीमारी’ कहा जाता है। कई मामलों में इसका पता पहली बार फ्रैक्चर होने के बाद चलता है। कूल्हे, कलाई और रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर इसके सामान्य परिणामों में शामिल हैं।

उम्र बढ़ने के साथ ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम बढ़ता है। विशेष रूप से रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में हड्डियों का घनत्व तेजी से कम हो सकता है। कम शारीरिक गतिविधि, पोषण की कमी, कैल्शियम और विटामिन-डी की कमी, कम वजन तथा कुछ अन्य जीवनशैली और चिकित्सकीय कारण भी हड्डियों की कमजोरी का जोखिम बढ़ा सकते हैं।

आयुर्वेद में निवारक दृष्टिकोण

आयुर्वेद में हड्डियों को ‘अस्थि धातु’ से जोड़ा गया है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण के अनुसार, बढ़ती उम्र के साथ शरीर में होने वाले क्षय को नियंत्रित करने के लिए उचित आहार, दिनचर्या और जीवनशैली महत्वपूर्ण हैं। वात दोष के असंतुलन को भी अस्थि स्वास्थ्य से संबंधित माना जाता है।

केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) के महानिदेशक प्रो. रविनारायण आचार्य ने कहा कि ऑस्टियोपोरोसिस तेजी से बढ़ती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। आयुर्वेद में उपलब्ध निवारक और पुनर्स्थापनात्मक ज्ञान के माध्यम से इसके प्रभाव को कम करने की दिशा में काम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि शीघ्र हस्तक्षेप, संतुलित आहार और अनुकूल जीवनशैली मजबूत हड्डियों तथा स्वस्थ उम्र बढ़ने का स्वाभाविक आधार प्रदान करते हैं।

सीसीआरएएस ने ऑस्टियोपोरोसिस के प्रबंधन से जुड़े आयुर्वेदिक उपायों पर वैज्ञानिक अध्ययन भी किए हैं। इनमें लाक्षा गुग्गुलु और प्रवाल पिष्टी जैसे आयुर्वेदिक योगों का अध्ययन शामिल है। परिषद ने हड्डियों और मांसपेशियों से संबंधित विकारों में आयुर्वेदिक हस्तक्षेपों की भूमिका पर भी शोध किया है।

रसायन चिकित्सा और स्नेहन

आयुर्वेद में रसायन चिकित्सा यानी कायाकल्प संबंधी उपायों को शरीर की क्षमता बनाए रखने और उम्र से संबंधित क्षय को कम करने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। इसके अलावा स्नेहन यानी औषधीय तेलों से मालिश भी पारंपरिक आयुर्वेदिक पद्धति का हिस्सा है।

महानारायण तेल, दशमूल तेल और चंदनबाला लक्षादि तेल जैसे औषधीय तेलों का पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता रहा है। इनका प्रयोग व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह से किया जाना चाहिए।

आयुर्वेदिक परंपरा में लाक्षा गुग्गुलु, महायोगराज गुग्गुलु, प्रवाल पिष्टी और मुक्ता शुक्ति भस्म जैसे योगों का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि, किसी भी औषधि का सेवन स्वयं से शुरू करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।

आहार और व्यायाम भी महत्वपूर्ण

हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए संतुलित और पोषक आहार महत्वपूर्ण है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में कुलत्थी यानी घोड़ा चना, शुंठी यानी अदरक, रसोना यानी लहसुन, मुनगा और कुष्मांडा जैसे खाद्य पदार्थों के साथ अनार, आम और अंगूर जैसे फलों को आहार में शामिल करने का उल्लेख मिलता है।

आधुनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण से भी पर्याप्त कैल्शियम, विटामिन-डी और प्रोटीन का सेवन हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए आहार व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और पोषण संबंधी जरूरतों के अनुरूप होना चाहिए।

नियमित और उम्र के अनुरूप शारीरिक गतिविधि भी हड्डियों तथा मांसपेशियों को मजबूत रखने में मदद करती है। योग और हल्का व्यायाम शरीर का संतुलन और लचीलापन बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं। इससे गिरने और उससे जुड़े फ्रैक्चर के जोखिम को कम करने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि, पहले से हड्डियों की कमजोरी या फ्रैक्चर की समस्या वाले लोगों को व्यायाम शुरू करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

समय रहते पहचान जरूरी

विश्व ऑस्टियोपोरोसिस दिवस का उद्देश्य केवल बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाना नहीं, बल्कि लोगों को यह समझाना भी है कि हड्डियों की देखभाल समय रहते शुरू की जानी चाहिए। विशेष रूप से बुजुर्गों और रजोनिवृत्ति के बाद की महिलाओं को हड्डियों के स्वास्थ्य के प्रति अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।

नियमित शारीरिक सक्रियता, संतुलित पोषण, पर्याप्त कैल्शियम और विटामिन-डी, स्वस्थ वजन तथा गिरने से बचाव के उपाय हड्डियों को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जिन लोगों में ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम अधिक है, उन्हें चिकित्सकीय सलाह के अनुसार हड्डियों के घनत्व की जांच और आवश्यक उपचार कराना चाहिए।

आयुर्वेद का समग्र दृष्टिकोण निवारक देखभाल और स्वस्थ जीवनशैली पर जोर देता है। वहीं, ऑस्टियोपोरोसिस की पहचान और उपचार में आधुनिक चिकित्सकीय जांच एवं विशेषज्ञ की सलाह भी महत्वपूर्ण है। दोनों दृष्टिकोणों का उपयोग व्यक्ति की जरूरत के अनुसार विशेषज्ञ मार्गदर्शन में किया जाए तो उम्र बढ़ने के साथ हड्डियों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

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अधिक जानकारी के लिए, ऑस्टियोपोरोसिस पर CCRAS IEC प्रकाशन यहां देखा जा सकता है: https://ccras.nic.in/wp-content/uploads/2024/06/Osteoporosis.pdf

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