पर्यावरणब्लॉग

कार्बन संकट की नई चेतावनी: क्या जंगल और समुद्र बचा सकते हैं गर्म होती धरती?

A September 2026 UN Environment Programme report warns that exceeding the 1.5°C global warming limit above pre-industrial levels is nearly inevitable soon, intensifying risks to health, food, water, glaciers, oceans, and ecosystems. At a New Delhi conference, India’s leaders stressed differentiated historical responsibilities and community-based solutions. Forests/land ecosystems and oceans absorbed roughly 31% and 23% of human CO₂ emissions (2010–2019), acting as vital carbon sinks via trees and phytoplankton. Afforestation helps but cannot alone offset ongoing fossil-fuel emissions; protecting mature forests and restoring natural systems is more effective. Solutions require rapidly cutting emissions while safeguarding and regenerating these natural sinks, as their capacity has limits.-Jay S. Rawat

 

जयसिंह रावत
जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया जिस खतरे को कुछ दशक पहले भविष्य की आशंका मान रही थी, वह अब सामने खड़ी वास्तविकता बनता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की 2 सितंबर 2026 को जारी नई रिपोर्ट ‘लिमिटिंग ओवरशूट’ ने चेतावनी दी है कि औद्योगिक-पूर्व काल की तुलना में वैश्विक तापमान वृद्धि का 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करना अगले कुछ वर्षों में लगभग अपरिहार्य हो गया है। तापमान जितना अधिक और जितने लंबे समय तक इस सीमा से ऊपर रहेगा, मानव स्वास्थ्य, खाद्य और जल सुरक्षा, हिमनदों, समुद्रों तथा पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरा उतना ही बढ़ेगा।

इसी चेतावनी के बीच 19-20 सितंबर को नई दिल्ली में राष्ट्रीय हरित अधिकरण के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘पर्यावरण और जलवायु गतिकी का भविष्य’ में जलवायु संकट और पर्यावरणीय न्याय पर गंभीर मंथन हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी विकासशील देशों पर डालना उचित नहीं है, क्योंकि भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन आज भी वैश्विक औसत के आधे से कम है। उन्होंने विकसित और विकासशील देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी के अंतर को भी रेखांकित किया। सम्मेलन के समापन पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जलवायु सहनशीलता बढ़ाने के लिए समुदाय-केंद्रित उपायों और पारंपरिक ज्ञान पर बल दिया।

यह बहस एक बुनियादी प्रश्न सामने लाती है। वातावरण में पहले से जमा और लगातार बढ़ रही कार्बन डाइऑक्साइड का क्या किया जाए? क्या बड़े पैमाने पर पेड़ लगाकर पृथ्वी को गर्म होने से बचाया जा सकता है? और आखिर पृथ्वी से कार्बन डाइऑक्साइड सोखने तथा ऑक्सीजन पैदा करने में सबसे बड़ी भूमिका किसकी है—जंगलों की या महासागरों की?
धरती के दो विशाल कार्बन भंडार
प्रकृति के पास वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की अद्भुत व्यवस्था है। इसके दो बड़े आधार हैं—भूमि पर जंगल, वनस्पति और मिट्टी तथा दूसरी ओर महासागर। आईपीसीसी के अनुसार 2010 से 2019 के दौरान मानव गतिविधियों से निकली कार्बन डाइऑक्साइड का लगभग 31 प्रतिशत स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र और 23 प्रतिशत महासागरों ने सोख लिया। करीब 46 प्रतिशत वातावरण में रह गया। यानी प्रकृति के इन दोनों विशाल कार्बन भंडारों ने मिलकर आधे से अधिक मानवीय कार्बन उत्सर्जन को वातावरण में जमा होने से रोका। इनके बिना पृथ्वी कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रही होती।

पेड़ प्रकाश संश्लेषण के दौरान वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं। उसका कार्बन उनके तनों, शाखाओं, पत्तियों और जड़ों के साथ मिट्टी में जमा होता जाता है और इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन निकलती है। इसलिए प्राकृतिक वनों की रक्षा और नष्ट जंगलों का पुनर्जीवन जलवायु परिवर्तन से लड़ने के सबसे प्रभावी प्राकृतिक उपायों में शामिल है।
लेकिन जंगल इस कहानी का केवल एक हिस्सा हैं। दूसरा विशाल संसार समुद्र की सतह के नीचे है।
महासागरों में असंख्य सूक्ष्म प्रकाश-संश्लेषी जीव पाए जाते हैं, जिन्हें फाइटोप्लैंकटन कहा जाता है। सूर्य के प्रकाश की सहायता से ये भी पेड़ों की तरह कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते और ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं। इसलिए पृथ्वी को ऑक्सीजन देने का श्रेय केवल जंगलों को देना वैज्ञानिक दृष्टि से अधूरा है। समुद्री सूक्ष्म वनस्पतियां वैश्विक ऑक्सीजन उत्पादन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें समाया कुछ कार्बन समुद्री खाद्य शृंखला और मृत जैविक पदार्थ के जरिए गहरे समुद्र में पहुंच जाता है और लंबे समय तक वहां रह सकता है।
क्या वनीकरण सबसे बड़ा समाधान है?
यहीं सबसे महत्वपूर्ण अंतर समझने की जरूरत है। वनीकरण जलवायु संकट के प्रमुख समाधानों में अवश्य है, लेकिन अकेला समाधान नहीं है। हम कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस लगातार जलाते रहें और यह उम्मीद करें कि लगाए गए पेड़ सारा अतिरिक्त कार्बन सोख लेंगे, तो यह संभव नहीं है।
एक पेड़ को बड़ा होकर पर्याप्त कार्बन जमा करने में वर्षों और जंगल को विकसित होने में दशकों लगते हैं। दूसरी ओर जीवाश्म ईंधन कुछ मिनटों में वह कार्बन वातावरण में छोड़ देता है जिसे प्रकृति ने लाखों वर्षों में भूमिगत संचित किया था। जंगल की आग, सूखा, बढ़ता तापमान और कटाई दशकों से जमा कार्बन को फिर वातावरण में पहुंचा सकते हैं।
इसीलिए पुराने प्राकृतिक जंगल की रक्षा केवल नए पौधे लगाने से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। प्राकृतिक वन में कार्बन सिर्फ पेड़ों में नहीं बल्कि जड़ों, मिट्टी और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में जमा रहता है। वृक्षारोपण में भी केवल पौधों की संख्या सफलता का पैमाना नहीं हो सकती। स्थानीय जलवायु के अनुकूल मिश्रित प्रजातियां और प्राकृतिक वन पुनर्जीवन अधिक टिकाऊ उपाय हैं।
हिमालय में यह प्रश्न और संवेदनशील है। यहां जंगल केवल कार्बन सोखने वाली मशीनें नहीं हैं। वे जलस्रोतों, मिट्टी, ढलानों की स्थिरता, जैव विविधता और स्थानीय आजीविका से जुड़े हैं। इसलिए हिमालय में वनीकरण का अर्थ किसी भी खाली भूमि पर किसी भी प्रजाति के पेड़ लगा देना नहीं, बल्कि प्राकृतिक वन समुदायों और क्षतिग्रस्त जलागम क्षेत्रों को पुनर्जीवित करना होना चाहिए।
1.5 डिग्री के आगे क्या होगा?
संयुक्त राष्ट्र की ताजा चेतावनी का सबसे चिंताजनक पक्ष यही है। वर्ष 2024 पहला ऐसा कैलेंडर वर्ष था जिसमें औसत वैश्विक तापमान औद्योगिक-पूर्व स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा। वैज्ञानिक दीर्घकालीन जलवायु परिवर्तन को किसी एक वर्ष से नहीं मापते, फिर भी यह स्पष्ट संकेत है कि दुनिया खतरनाक सीमा के करीब पहुंच चुकी है।

तापमान बढ़ने के साथ अत्यधिक गर्मी, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, जंगल की आग, हिमनदों का पिघलना और समुद्र का स्तर बढ़ने जैसी घटनाओं की तीव्रता बढ़ सकती है। खाद्य और जल सुरक्षा प्रभावित होगी और जैव विविधता पर दबाव बढ़ेगा। इससे एक दुष्चक्र भी पैदा हो सकता है। आईपीसीसी ने चेताया है कि जलवायु परिवर्तन भविष्य में भूमि और महासागरों की अतिरिक्त कार्बन सोखने की क्षमता को कमजोर कर सकता है।

न पेड़ अकेले बचाएंगे, न तकनीक
इस संकट का समाधान दो मोर्चों पर एक साथ करना होगा। पहला, वातावरण में नया कार्बन डालने की गति तेजी से घटानी होगी। इसके लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने, स्वच्छ ऊर्जा बढ़ाने, ऊर्जा दक्षता सुधारने और अनावश्यक उपभोग घटाने की आवश्यकता है। दूसरा, पृथ्वी की प्राकृतिक कार्बन सोखने वाली प्रणालियों—जंगलों, मिट्टी, आर्द्रभूमियों, घास के मैदानों और महासागरों—को बचाना और पुनर्जीवित करना होगा।
इसे एक साधारण उदाहरण से समझा जा सकता है। कमरे में खुला नल लगातार पानी भर रहा हो तो केवल पानी निकालते रहने से कमरा सूखा नहीं रह सकता। पहले नल की धार कम करनी होगी और साथ-साथ जमा पानी भी निकालना होगा। जीवाश्म ईंधन से होने वाला उत्सर्जन वह खुला नल है और जंगल तथा महासागर पानी निकालने वाली प्राकृतिक व्यवस्था।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि उत्सर्जन घटाएं या पेड़ लगाएं। दोनों करने होंगे।
धरती के ‘फेफड़े’ केवल जंगल नहीं हैं। वन, मिट्टी और महासागर मिलकर पृथ्वी की जीवन-रक्षा प्रणाली बनाते हैं। लेकिन इन प्राकृतिक प्रणालियों की भी सीमा है। मनुष्य यदि वातावरण में कार्बन छोड़ने की रफ्तार लगातार बढ़ाता रहा तो प्रकृति अनंतकाल तक उसकी भरपाई नहीं कर सकती।
संयुक्त राष्ट्र की नवीनतम चेतावनी का शायद सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी यही है—1.5 डिग्री की सीमा पार होना हार मान लेने का कारण नहीं, बल्कि कार्रवाई तेज करने की अंतिम चेतावनी है। जंगल बचाना और बढ़ाना अनिवार्य है, महासागरों को स्वस्थ रखना उतना ही जरूरी है, मगर सबसे पहली शर्त उस कार्बन की धारा को कम करना है जिसे मानव सभ्यता स्वयं वातावरण में छोड़ रही है।

(नोट : लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं जिनसे एडमिन का सहमत होना जरूरी नहीं है।–एडमिन)

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