1962 का वह युद्धबंदी चीनी सैनिक जो भारत का ही हो गया

– उषा रावत
इतिहास में युद्ध केवल सीमाओं का भूगोल नहीं बदलते, वे मनुष्यों की नियति भी बदल देते हैं। भारत-चीन युद्ध (1962) की ऐसी ही एक मार्मिक कहानी है वांग ची (Wang Qi) की। एक चीनी सैनिक, जो भारत की गिरफ्त में आया, वर्षों तक जेल में रहा, फिर अपने देश लौटने के बजाय भारत में ही बस गया। उसने भारतीय समाज में अपना परिवार बनाया, स्थानीय संस्कृति को अपनाया और उसकी अगली पीढ़ियाँ भारतीय बनकर बड़ी हुईं। लेकिन छह दशक बाद भी उसके परिवार की पहचान पर सवाल खड़े हैं।
हाल में यह मामला तब फिर चर्चा में आया, जब मध्य प्रदेश के बालाघाट में रहने वाले वांग ची के पोते-पोतियों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया गया। राजस्व अधिकारियों का तर्क है कि जाति का निर्धारण पितृवंश से होता है और उनके दादा भारतीय जाति व्यवस्था का हिस्सा नहीं थे।
1962 के युद्ध से मध्य प्रदेश के एक गांव तक
वांग ची चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) से जुड़े थे। उनके अनुसार वे सैन्य सर्वेक्षण इंजीनियर थे। जनवरी 1963 में वे अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए और भारतीय सेना ने उन्हें पकड़ लिया। युद्ध समाप्त हो चुका था, इसलिए उन्हें औपचारिक युद्धबंदी (POW) का दर्जा नहीं मिला, बल्कि जासूसी के संदेह में वर्षों तक जेल में रखा गया। विभिन्न अभिलेखों में उनकी कैद की अवधि सात से आठ वर्ष बताई गई है।
रिहाई के बाद उनके सामने सबसे बड़ा प्रश्न था—अब कहाँ जाएँ?
चीन क्यों नहीं लौटे?
यह प्रश्न आज भी लोगों को आकर्षित करता है। उस समय भारत और चीन के संबंध बेहद तनावपूर्ण थे और दोनों देशों के बीच सामान्य राजनयिक प्रक्रियाएँ बहाल नहीं हुई थीं। दूसरी ओर, चीन में सांस्कृतिक क्रांति का दौर चल रहा था। लंबे समय तक विदेशी कैद में रहे सैनिकों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। ऐसे वातावरण में वांग ची का तत्काल चीन लौटना आसान नहीं था। कई रिपोर्टों में यह भी उल्लेख मिलता है कि वे स्वयं भी अनिश्चित भविष्य को लेकर चिंतित थे।
भारतीय संस्कृति में घुलता-मिलता एक चीनी सैनिक
रिहाई के बाद वांग ची मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के तिरोड़ी गांव में आकर बस गए। गांव वालों ने उन्हें नया नाम ‘राज बहादुर’ दे दिया। उन्होंने एक स्थानीय युवती सुशीला से विवाह किया और परिवार बसाया। उनके बच्चे भारतीय स्कूलों में पढ़े, हिंदी और स्थानीय बोली बोलते हुए बड़े हुए। खेती-किसानी, छोटे-मोटे काम और ग्रामीण जीवन का हिस्सा बनते-बनते वे पूरी तरह स्थानीय समाज में रच-बस गए।
यह सांस्कृतिक आत्मसात (Assimilation) का दुर्लभ उदाहरण है। जन्म से चीनी होने के बावजूद उनका सामाजिक जीवन पूरी तरह भारतीय हो गया। त्योहार, भाषा, खान-पान, रिश्ते और जीवन-शैली—सब भारतीय। उनके बच्चे कभी चीन में नहीं पले-बढ़े, बल्कि भारत को ही अपना देश मानते रहे।
जब अतीत ने फिर दस्तक दी
करीब 54 वर्ष बाद, 2017 में भारत और चीन की पहल से वांग ची अपने पैतृक गांव चीन जा सके। वहां उनका भावनात्मक स्वागत हुआ और वे दशकों बाद अपने भाई-बहनों से मिले। लेकिन इससे उनकी परेशानियाँ समाप्त नहीं हुईं। चीन में उनसे यह तक कहा गया कि वे पहले यह साबित करें कि वे वास्तव में पीएलए के सैनिक थे। उधर भारत में वे विदेशी नागरिक के रूप में दर्ज रहे। इस तरह वे वर्षों तक दो देशों के बीच पहचान के संकट में फँसे रहे।
अब तीसरी पीढ़ी भी पहचान के संकट में
आज वांग ची के बेटे विष्णु वांग और उनके बच्चे भारतीय समाज में रहते हैं। बच्चों का जन्म भारत में हुआ, शिक्षा भारत में हुई और उनका सामाजिक जीवन पूरी तरह भारतीय है। फिर भी अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र नहीं मिलने से वे सरकारी योजनाओं और आरक्षण के लाभ से वंचित हो सकते हैं। यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि नागरिकता, वंश, सामाजिक पहचान और भारतीय कानून के जटिल संबंधों पर भी प्रश्न खड़ा करता है।
वांग ची की कहानी यह बताती है कि युद्ध समाप्त होने के बाद भी उसके प्रभाव पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। एक सैनिक जिसने दुश्मन देश में अपना घर बनाया, भारतीय संस्कृति को अपनाया और यहीं परिवार बसाया, उसकी तीसरी पीढ़ी आज भी अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही है। इतिहास की किताबों में यह केवल 1962 के युद्ध का एक प्रसंग नहीं, बल्कि सीमाओं से परे मानवीय रिश्तों और पहचान की जटिल यात्रा का जीवंत दस्तावेज है।
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संदर्भ: यह फीचर द टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार पी. नवीन की हालिया रिपोर्ट तथा वांग ची पर 2017, 2024 और 2025 में प्रकाशित संबंधित समाचारों पर आधारित है।
