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नेपाल में हिमस्खलन के बाद जलप्रलय, 157 की मौत; सैकड़ों लापता, 133 भारतीयों का भी संपर्क टूटा

 

काठमांडू, 27 अगस्त। नेपाल के उत्तरी हिमालयी क्षेत्र में चीन की तिब्बत सीमा से सटे रसुवा जिले में बुधवार को आई विनाशकारी आकस्मिक बाढ़ ने अभूतपूर्व तबाही मचाई है। गुरुवार तड़के तक उपलब्ध नवीनतम सूचनाओं के अनुसार नेपाल में कम से कम 157 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी तीन लोगों की मौत और 265 लोगों के लापता होने की सूचना है। इस तरह सीमा के दोनों ओर अब तक कम से कम 160 मौतों की पुष्टि हुई है। राहत और खोज अभियान जारी रहने के कारण मृतकों की संख्या और बढ़ने की आशंका है।

इस आपदा का सबसे चिंताजनक पहलू बड़ी संख्या में पर्यटकों और कैलाश मानसरोवर यात्रियों का संपर्क से बाहर होना है। नेपाल पर्यटन बोर्ड और अन्य अधिकारियों के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार 403 लोग लापता बताए गए हैं, जिनमें 341 विदेशी नागरिक हैं। इनमें 133 भारतीय, 47 अमेरिकी, 34 ऑस्ट्रेलियाई, 33 ब्रिटिश और 24 कनाडाई नागरिक शामिल हैं। भारतीयों में बड़ी संख्या कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नेपाल के रास्ते तिब्बत जाने वाले तीर्थयात्रियों की बताई जा रही है। हालांकि अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ‘लापता’ अथवा ‘संपर्क से बाहर’ लोगों की सूची लगातार सत्यापित की जा रही है, इसलिए इसे अंतिम हताहत संख्या नहीं माना जाना चाहिए।

 

आखिर कैसे आई इतनी भयावह बाढ़?

प्रारंभिक वैज्ञानिक जांच से सामने आ रहा है कि यह सामान्य मानसूनी बाढ़ नहीं थी। नेपाल के जल विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार रसुवा क्षेत्र में मंगलवार और बुधवार को ऐसी भारी वर्षा नहीं हुई थी जो इतने बड़े सैलाब का कारण बन सके। उपग्रह चित्रों में चीन-नेपाल सीमा के ऊपरी हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों का विशाल हिमस्खलन दिखाई दिया है।

प्रारंभिक आकलन के अनुसार हिमस्खलन और भूस्खलन का मलबा ल्हेंदे नदी में गिरा और उसने नदी का प्रवाह रोक दिया। इससे बर्फ, मलबे और पानी की एक अस्थायी झील बन गई। जब यह प्राकृतिक बांध टूटा तो जमा पानी, चट्टानें, मिट्टी और बर्फ अत्यधिक वेग से नीचे की ओर दौड़ पड़े और भोटेकोशी तथा आगे त्रिशूली नदी में विनाशकारी बाढ़ में बदल गए। उपग्रह चित्रों के आधार पर यह अवरोध नेपाल-चीन मैत्री पुल से लगभग 20 किलोमीटर ऊपर बना था।

इसी दौरान बुधवार सुबह 8 बजकर 37 मिनट पर तिब्बती क्षेत्र में 4.4 तीव्रता का भूकंप भी दर्ज किया गया था। इसका केंद्र गोसाईंकुंड से करीब 47 किलोमीटर उत्तर में था। वैज्ञानिक इस संभावना की जांच कर रहे हैं कि भूकंप ने हिमस्खलन को प्रेरित किया हो, लेकिन अभी इसे निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं किया गया है। इसलिए आपदा को सीधे भूकंप का परिणाम कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

कुछ ही मिनटों में बह गया तिमुरे बाजार

बाढ़ बुधवार सुबह करीब नौ बजे नेपाल-चीन सीमा के पास तिमुरे और रसुवागढ़ी क्षेत्र में पहुंची। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार लोगों को संभलने का लगभग कोई समय नहीं मिला। रसुवा के मुख्य सीमा शुल्क अधिकारी राजेंद्र ढुंगाना ने ‘काठमांडू पोस्ट’ को बताया कि उन्हें पहले लगा कि भूकंप आया है, लेकिन बाहर निकलने पर उन्होंने ऊपर से आती पानी और मलबे की विशाल दीवार देखी। कुछ ही क्षणों में तिमुरे बाजार का बड़ा हिस्सा बह गया। सीमा शुल्क क्षेत्र में खड़े 300 से अधिक वाहन और ट्रक भी सैलाब में बह गए।

तिमुरे के बाद सैलाब स्याफ्रुबेसी की ओर बढ़ा और फिर भोटेकोशी-त्रिशूली नदी तंत्र के साथ नुवाकोट और धादिंग की ओर फैल गया। सोल, अक्करे बाजार और आसपास की कई बस्तियों में सैकड़ों मकान बहने अथवा मलबे में दबने की खबर है। कुछ स्थानों पर जो मकान खड़े दिखाई दे रहे हैं, उनकी निचली मंजिलें मिट्टी और चट्टानों से भर गई हैं।

19 पुल और करीब 40 किलोमीटर सड़क तबाह

प्रारंभिक सरकारी आकलन के अनुसार बाढ़ ने कम से कम 19 वाहन योग्य पुलों और करीब 40 किलोमीटर राजमार्ग को नष्ट कर दिया है। नुवाकोट के बेत्रावती से रसुवागढ़ी सीमा तक महत्वपूर्ण सड़क का बड़ा हिस्सा बह गया है। इस मार्ग के टूटने से चीन के साथ नेपाल का महत्वपूर्ण स्थल व्यापार मार्ग भी गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है।

सड़कों और पुलों के साथ बिजली, दूरसंचार, बैंकिंग और जलविद्युत ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचा है। नवीनतम प्रारंभिक आकलन में नौ जलविद्युत परियोजनाओं और नौ वाणिज्यिक बैंक शाखाओं के नष्ट अथवा गंभीर रूप से प्रभावित होने की बात सामने आई है। अनेक जलविद्युत कर्मचारी भी संपर्क से बाहर हैं।

चेतावनी तंत्र भी बह गया

इस त्रासदी ने हिमालयी नदियों की पूर्व चेतावनी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। नेपाल के बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग के अनुसार ऊपरी भोटेकोशी क्षेत्र में लगाए गए स्वचालित नदी निगरानी केंद्र इतनी तेजी से आए सैलाब में स्वयं बह गए और समय रहते चेतावनी नहीं भेज सके।

बाढ़ की सूचना नेपाल के संबंधित विभाग को सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर मिली और चार मिनट के भीतर निचले क्षेत्रों के लिए चेतावनी जारी कर दी गई, लेकिन तब तक बाढ़ रसुवा के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले चुकी थी।

यह पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी नदी तंत्र में 8 जुलाई 2025 को भी अचानक बाढ़ आई थी। बाद की वैज्ञानिक जांच में उस घटना का कारण तिब्बत क्षेत्र में एक हिमनदीय झील से अचानक पानी निकलना पाया गया था। पिछले साल की बाढ़ में कम से कम 11 लोगों की मौत हुई थी और नेपाल-चीन को जोड़ने वाला मैत्री पुल भी बह गया था।

भारतीय कैलाश यात्रियों को लेकर चिंता

आपदा के समय बड़ी संख्या में यात्री रसुवागढ़ी के रास्ते चीन में प्रवेश कर कैलाश मानसरोवर जाने की तैयारी में थे। शुरुआती सूचनाओं में करीब 390 यात्रियों का संपर्क टूटने की बात सामने आई थी। बाद में नेपाल पर्यटन बोर्ड द्वारा तैयार सूची में 133 भारतीय नागरिकों के लापता अथवा संपर्क से बाहर होने की जानकारी सामने आई।

यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। संपर्क टूटने का अर्थ आवश्यक रूप से मृत्यु अथवा बाढ़ में बह जाना नहीं है। सड़क, बिजली और दूरसंचार नेटवर्क ध्वस्त होने से भी अनेक यात्रियों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। इसलिए भारतीय यात्रियों की वास्तविक स्थिति का सत्यापन नेपाल और भारतीय अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है।

रात भर चला खोज और बचाव अभियान

नेपाल सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल को बड़े पैमाने पर राहत एवं बचाव कार्य में लगाया गया है। हेलीकॉप्टरों और ड्रोन की सहायता भी ली जा रही है, लेकिन कई स्थानों पर सड़कें और पुल बह जाने तथा नदी में पानी और मलबा अधिक होने के कारण बचाव दलों का पहुंचना कठिन बना हुआ है। कुछ इलाकों में हेलीकॉप्टरों के उतरने की जगह तक उपलब्ध नहीं है।

बाढ़ में सुरक्षाकर्मी भी बड़ी संख्या में प्रभावित हुए हैं। नेपाली अधिकारियों के अनुसार सेना, पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के कई जवान अब भी संपर्क से बाहर हैं। जलविद्युत परियोजनाओं के कर्मचारियों तथा सीमा शुल्क और अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों की भी तलाश की जा रही है।

नेपाल सरकार ने प्रभावित लोगों का निःशुल्क उपचार, मृतकों के परिवारों को नियमानुसार आर्थिक सहायता तथा क्षतिग्रस्त सड़क, बिजली और दूरसंचार सेवाओं को शीघ्र बहाल करने का निर्णय लिया है। प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है।

नेपाल ने भारत और चीन से भी राहत एवं बचाव में सहयोग मांगा है। संयुक्त राष्ट्र ने भी राहत सामग्री और कर्मियों को जुटाने की बात कही है।

भारत में भी सतर्कता

नेपाल से निकलने वाली नदियों में अचानक बढ़े पानी को देखते हुए भारत में भी सीमावर्ती क्षेत्रों में सतर्कता बढ़ाई गई है। बिहार में लगभग 5,000 लोगों को एहतियात के तौर पर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। नदी तटवर्ती क्षेत्रों में प्रशासन को जलस्तर पर लगातार नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं।

हिमालय के लिए बड़ी चेतावनी

यह आपदा केवल नेपाल की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर चेतावनी भी है। वैज्ञानिकों का प्रारंभिक निष्कर्ष बताता है कि ऊंचे हिमालय में बर्फ, हिमनद, अस्थिर चट्टानों और झीलों से पैदा होने वाली घटनाएं नीचे बसे क्षेत्रों में कुछ ही मिनटों में विनाशकारी बाढ़ में बदल सकती हैं। इस घटना में पानी के साथ बड़ी मात्रा में चट्टान, मिट्टी और हिमखंड आने से उसकी विनाशकारी शक्ति कई गुना बढ़ गई।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मृतकों और लापता लोगों की संख्या लगातार बदल रही है। 27 अगस्त की सुबह तक उपलब्ध सबसे नवीन और विश्वसनीय रिपोर्टों में नेपाल में 157 मौतों की पुष्टि हुई है। सैकड़ों लोगों का अभी पता नहीं चल पाया है। इसलिए आने वाले घंटों में हताहतों के आंकड़े में बड़ा बदलाव संभव है। राहत दलों की पहली प्राथमिकता अब भी मलबे और कटे हुए इलाकों में फंसे लोगों तक पहुंचना तथा लापता पर्यटकों, तीर्थयात्रियों, स्थानीय निवासियों और कर्मचारियों का पता लगाना है।

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