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फार्म-7 के दुरुपयोग पर कार्रवाई की मांग, फर्जी आपत्तियां बिना जांच स्वीकार न करने का आग्रह

काशीपुर, 20 अगस्त। उत्तराखंड में एसआईआर-2026 के तहत विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों में दर्ज मतदाताओं के खिलाफ फार्म-7 के माध्यम से बड़ी संख्या में गलत, बेनामी और फर्जी आपत्तियां दर्ज किए जाने की शिकायतों के बीच सूचना अधिकार कार्यकर्ता, समाजसेवी एवं 45 कानूनी पुस्तकों के लेखक नदीम उद्दीन एडवोकेट ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को शिकायत और कानूनी सुझाव भेजे हैं। उन्होंने फर्जी एवं गलत आपत्तियों पर मुकदमा दर्ज कराने तथा बिना पुष्टि और जांच के किसी भी आपत्ति को स्वीकार न करने का अनुरोध किया है।

नदीम उद्दीन ने बताया कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजी शिकायत में इस समस्या से निपटने और पात्र मतदाताओं के संवैधानिक मताधिकार की रक्षा के लिए कई सुझाव दिए गए हैं। इसके साथ सर्वाधिक आपत्तियों वाली विधानसभा सीटों के फार्म-10 का अध्ययन कर पांच से अधिक आपत्तियां दर्ज कराने वाले लोगों की संख्या और अधिक आपत्तियां लगाने वाले प्रमुख आपत्तिकर्ताओं के नामों का विश्लेषण भी संलग्न किया गया है।

उन्होंने सुझाव दिया कि आपत्तिकर्ता की पात्रता की जांच किए बिना किसी आपत्ति को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। आपत्ति की पुष्टि और जांच के बाद ही उसका निस्तारण किया जाए। साथ ही गलत एवं मिथ्या आपत्ति दर्ज कराने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। उन्होंने ऑनलाइन और ऑफलाइन बेनामी फार्म-7 दाखिल करने वालों के खिलाफ गंभीर अपराधों के मामले दर्ज कराने के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने का भी अनुरोध किया है।

शिकायत के अनुसार, निर्वाचन पंजीयन नियम, 1960 के नियम 13 के तहत आपत्तिकर्ता का संबंधित विधानसभा क्षेत्र का मतदाता होना और विधिवत फार्म-7 भरना आवश्यक है। नदीम उद्दीन का कहना है कि फर्जी हस्ताक्षर या किसी दूसरे व्यक्ति के नाम से ऑनलाइन फार्म भरना विधिवत फार्म दाखिल करना नहीं माना जा सकता। इसलिए आपत्तिकर्ता की पहचान और आपत्ति की पुष्टि संबंधित भाग के बीएलओ एवं पर्यवेक्षण अधिकारी द्वारा उसके निवास पर जाकर तथा गणना प्रपत्र में दर्ज मोबाइल नंबर के माध्यम से की जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि जिन आपत्तियों की पुष्टि नहीं हो पाती, उन्हें नियम 17 के तहत पात्रता पूरी न करने के आधार पर निरस्त किया जाना चाहिए। इससे दूसरे व्यक्तियों के नाम से दाखिल की गई फर्जी आपत्तियों को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज किया जा सकेगा और अधिकारियों का समय भी बचेगा।

नदीम उद्दीन के अनुसार, जिन आपत्तियों की पुष्टि हो जाती है, उनका निस्तारण नियम 19 के तहत आपत्तिकर्ता और जिस मतदाता के खिलाफ आपत्ति की गई है, उसे नोटिस देकर तथा नियम 20 के तहत जांच के बाद किया जाना चाहिए। बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल करने वाले आपत्तिकर्ताओं से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपनी आपत्ति के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने को कहा जाना चाहिए। आपत्तिकर्ता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को संबंधित मतदाता के समक्ष रखते हुए उसे अपना पक्ष और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाए। इसके बाद ही आपत्ति सही या गलत होने का निर्णय किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जानबूझकर झूठी एवं गलत आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति फार्म-7 में गलत कथन कर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत दंडनीय अपराध करते हैं। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों को मुकदमा दर्ज कराने के निर्देश दिए जाने चाहिए।

शिकायत में ऑनलाइन बेनामी और फर्जी आपत्तियां दाखिल करने के मामलों में आईटी एक्ट की धारा 66सी और 66डी के साथ भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया है। नदीम उद्दीन के अनुसार, किसी अन्य मतदाता के फर्जी हस्ताक्षर बनाकर ऑफलाइन फार्म-7 जमा करने वालों के खिलाफ भी कूटरचना सहित लागू कानूनी प्रावधानों के तहत मुकदमा दर्ज कराया जाना चाहिए।

उन्होंने मुख्य निर्वाचन अधिकारी से मांग की है कि फार्म-7 के दुरुपयोग को रोकने के लिए सभी संबंधित निर्वाचन अधिकारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि एसआईआर प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहें और फर्जी आपत्तियों के कारण निर्वाचन तंत्र पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

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