Earthquake early warning – An illusion : भूकंप की पूर्व चेतावनी – एक भ्रम

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–by Piyoosh Rautela Nov 20, 2022–

पिछले कुछ दिनों में पश्चिमी नेपाल के साथ ही पिथौरागढ़ में आये छोटे-बड़े भूकम्पों के बाद से यहाँ उत्तराखण्ड में संचालित भूकम्प पूर्व-चेतावनी तंत्र की प्रभाविकता व उपयोगिता पर संचार माध्यमों के साथ ही अन्य विभिन्न मंचो पर वाद-विवाद जारी हैं। 

कौन से भूकम्प में, कहाँ, किसे व कितने पहले अलर्ट मिला?

किस भूकम्प में अलर्ट नहीं मिला?

अब तक इस सब पर कितना पैसा व्यय किया गया?

प्रश्न अनेको हैं, और सच पूछो तो प्रश्न किया जाना या सकारात्मक आलोचना अच्छी भी हैं।

ठीक हैं एक तंत्र स्थापित किया गया है और निश्चित ही क्षेत्र में आये हर भूकम्प के बाद इस तंत्र की  प्रभाविकता की समीक्षा करते हुवे इसे और प्रभावी बनाने के उपाय किये जाने चाहिये।

पर यक्ष प्रश्न तो यह हैं कि क्या हमने इस भूकम्प पूर्व-चेतावनी तंत्र को क्षेत्र में भूकम्प सुरक्षा की गारंटी समझ लिया हैं?

और क्या इस चेतावनी व्यवस्था के अपनी पूरी क्षमता पर काम करने से हमारी भूकम्प सम्बन्धित सभी समस्याओ का समाधान हो जायेगा?

अगर इन दो में से किसी एक का भी उत्तर हाँ में हैं, तो स्पष्ट है कि हम सही राह पर नहीं हैं या फिर राह भटक गये हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में यहाँ यह समझना जरूरी हैं कि जिस चेतावनी की यहाँ बात की जा रही हैं वह भूकम्प  के झटके महसूस होने से कुछ 20, 25 या 35 सेकंड पहले ही मिल पायेगी और भूकम्प के अभिकेन्द्र के पास-पड़ोस के काफी बड़े इलाके के लिये इस तंत्र से किसी भी प्रकार की कोई भी चेतावनी उपलब्ध नहीं होगी।

फिर इस चेतावनी के बावजूद भी घर, मकान, सड़क, पुल, अस्पताल, मन्दिर, मस्जिद, स्कूल, दुकान व अन्य संरचनाये तो भूकम्प में क्षतिग्रस्त व ध्वस्त होंगी ही।

भूकम्प सुरक्षित तकनीक का उपयोग कर सावधानीपूर्वक बनायी गयी अवसंरचनाये तो शायद खड़ी रह जाये, पर मेरे-आपके पास पड़ोस में दिन-रात हो रहे बेतरतीब निर्माण का क्या? उन सब का तो भगवान ही मालिक हैं। बहुत सम्भव हैं कि भूकम्प की चेतावनी मिल जाने के बाद भी उन असुरक्षित अवसंरचनाओं से सभी के लिये सुरक्षित निकल पाना सम्भव ना हो।

ऐसे में जरूरी हैं कि वर्तमान में स्थापित भूकम्प पूर्व-चेतावनी तंत्र पर हो रहे व्यर्थ के वाद-विवाद से हमारा ध्यान भूकम्प सुरक्षा के मूलभूत पक्षों से न भटके और हम अब तक अब तक लापरवाही से भगवान भरोसे छोड़ दिये गये पक्षों पर गम्भीरता से काम करना शुरू कर दे। जितनी जल्दी, उतना बेहतर।

नये निर्माण की सुरक्षा

जो पहले से बनी अवसंरचनाये है उनकी भूकम्प सुरक्षा सुनिश्चित की जानी भी जरूरी है, परन्तु उससे कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि हम लग-पड़ कर जैसे भी हो, यह सुनिश्चित करे कि क्षेत्र में आगे जो भी अवसंरचना बने भूकम्प सुरक्षित ही बने।

इस परिप्रेक्ष्य में ज्यादातर स्थितियों में अपने कर्तव्यों की इति श्री हम भवन निर्माण उपविधि बना कर कर लेते हैं। इनका अनुपालन हो रहा हैं या नहीं, उससे हमारा ज्यादा सरोकार होता ही नहीं हैं और फिर इस सब पर पानी फेरने के लिये हम आये दिन व खुलेआम Compounding का खेल भी तो खेलते ही रहते हैं।

आपको यह कुछ अटपटा सा लग सकता हैं पर Compounding दंड के नाम पर कुछ पैसे ले कर नियम विरुद्ध बनी अवसंरचनाओं को नियमित कर देने से ज्यादा और कुछ नहीं हैं। ऐसे में देखा जाये तो यह व्यवस्था नियमो की अवहेलना करने वालो के लिये किसी पुरुस्कार से कम नहीं हैं और इससे लोग नियमो की अनदेखी करने को प्रोत्साहित ही होते हैं। आखिर उनको पता जो होता है कि ले दे कर मामला रफा-दफा हो जायेगा।

जन जागरूकता

यहाँ से शुरू होती हैं जागरूकता की आवश्यकता और इसके लिये जरूरी है कि करदाताओं के पैसों से भारी-भरकम निवेश कर के तैयार किये गये घातकता व जोखिम आंकलनों को सरकारी दफ्तरों की बन्द अलमारियों से बाहर निकाला जाये और उनका प्रचार-प्रसार किया जाये।

आखिर यह जानना तो हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार हैं कि उसके प्रियजनों पर किस जोखिम का कितना खतरा है और उससे किस प्रकार का नुकसान हो सकता हैं। अगर हम जान बूझ कर इस जानकारी को छिपाते है तो हम होने वाली क्षति के लिये कानूनी रूप से उत्तरदायी है।

फिर यह भी तो गलत नहीं है कि सरल व स्पष्ट भाषा व प्रारूप में सम्भावित नुकसान के साथ-साथ नुकसान को कम करने के तरीकों व इसके लिये वांछित व्यय के बारे में जानने के बाद तो शायद ही कोई हो जो इन उपायों के उपयोग पर विचार ही ना करे।

इस सब के साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है की भूकम्प के समय हर कोई, चाहे जहाँ भी क्यों न हो अपनी स्वयं की सुरक्षा सुनिश्चित करे. इसके लिये हर किसी को पता होना चाहिये की उसे भूकम्प के समय क्या करना हैं, क्या नहीं करना हैं। इन सभी जानकारियों के प्रचार-प्रसार के लिये वृहद, सतत व नियोजित जागरूकता कार्यक्रम  का होना जरूरी हैं और इस कार्यक्रम की धुरी पर कोई सर्व-स्वीकार्य Brand Ambassador होना चाहिये।

अब इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहेंगे कि हम पर्यटन के नाम पर तो नामी-गिरामी सितारों को सहज ही घेर लेते है पर लोगो की सुरक्षा के लिये ऐसा करते समय हमें यह सब फिजूलखर्ची लगने लगता हैं। सच माने तो जन जागरूकता पर किया गया व्यय वास्तव में सुरक्षा पर किया गया निवेश हैं और यह हमें निसंकोच करना चाहिये।

भू – उपयोग नियोजन

भूकम्प सुरक्षित निर्माण तो ठीक है पर यह सुनिश्चित करना भी तो जरूरी हैं कि जहाँ निर्माण हो रहा हैं वह स्थान सुरक्षित हैं। मैदानी क्षेत्र में कुछ इलाकों में भूकम्प की स्थिति में Liquefaction का खतरा हो सकता हैं। ऐसे इलाकों में भूकम्प के कम्पन भूमि की दृढ़ता पर अत्यन्त प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं और इस स्थिति में अवसंरचनाये भूमि में धस भी  सकती हैं।

ऐसा विगत में 27 मार्च 1964 को आये 9.2 परिमाण के Alaska भूकम्प16 जून 1964 को आये 7.6 परिमाण के Nigata भूकम्प17 अक्टूबर 1989 को आये 6.9 परिमाण के Loma Prieta भूकम्प17 जनवरी 1995 को आये 6.9 परिमाण के Kobe या Great Hanshin भूकम्प तथा 4 सितम्बर 2010 को आये 7.1 परिमाण के Canterbury  भूकम्प में हुवा ही था।

इसी प्रकार भूकम्प की स्थिति में ज्यादातर स्थितियों में ऊर्जा पृथ्वी में अवस्थित कमजोर सतहों के द्वारा अवमुक्त होती हैं और इन्हे भू-वैज्ञानिक Thrust या Fault कहते हैं। Main Boundary  Thrust (MBT) या फिर Main Central Thrust (MCT) तो आपने सुना ही होगा। यह ऐसी ही कमजोर सतहें हैं जिनके सापेक्ष भूकम्प में ऊर्जा अवमुक्त हो सकती हैं. यही कारण है कि क्षेत्र में आने वाले ज्यादातर भूकम्पों का अभिकेन्द्र इन सतहों के आस-पास ही होया हैं।

अब आपको शायद अब तक किसी ने बताया नहीं हैं, पर MBT हमारी राजधानी देहरादून से हो कर गुजरता हैं – राजपुर में शहंशाही आश्रम के पास से। यह जान लेने के बाद आप और कुछ करे या ना करें पर इस सक्रिय Thrust के समीप बहुमंजिला इमारतें बनाये जाने के औचित्य के साथ ही उनकी सुरक्षा के बारे में एक बार तो जरूर सोचेंगे और सच कहें तो उद्देश्य भी यही हैं।

जब आप सोचेंगे तो सुरक्षा भी मागेंगे और शायद परिवर्तन वहीं से आरम्भ होगा।

अभी के लिये तो यही कहा जा सकता हैं कि Liquefaction के साथ ही क्षेत्र में अवस्थित MBT या MCT जैसी प्रमुख कमजोर सतहों से प्रभावित हो सकने वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर वहाँ निर्माण कार्यो को नियन्त्रित किया जाना चाहिये।

और इनके साथ ही यहाँ हिमालय में अनेको सक्रिय या Active Fault भी है जिनके नजदीक भूकम्प की स्थिति में ज्यादा नुकसान हो सकता हैं। अब इन सब के मानचित्रीकरण व चिन्हीकरण में समय लगेगा, पर जो चिन्हित हैं उनके समीप तो निर्माण कार्य विनयमित किये ही जा सकते हैं और ऐसा भू-उपयोग सम्बन्धित नियमावली प्रख्यापित कर के सहज ही किया जा सकता हैं।

पुरानी अवसंरचनाओं का सुदृढ़ीकरण

इसके बाद बारी आती हैं पुरानी अवसंरचनाओं की। इन्हे भूकम्प सुरक्षित तो निश्चित ही बनाया जा सकता हैं पर यह प्रक्रिया नयी अवसंरचनाओं को भूकम्प सुरक्षित बनाने जितनी सरल नहीं हैं।

परन्तु यदि हमने जागरूकता पर व्यवस्थित व नियोजित रूप से निवेश किया हैं तो निश्चित ही इससे पुरानी अवसंरचनाओं को सुरक्षित बनाने की विधि या  सुदृढ़ीकरण का भी प्रचार-प्रसार होगा, इसकी माँग बढ़ेगी और जल्द ही बाजार में अवसंरचनाओं के सुदृढ़ीकरण  के सस्ते व सुलभ विकल्प भी उपलब्ध हो ही जायेंगे।

अपनी तरफ से सरकार इन तकनीकों के प्रचार-प्रसार के साथ ही लोगो को इनके उपयोग के लिये प्रोत्साहित करने के लिये विशेष योजनाये चला सकती हैं और इन योजनाओ में सस्ते ऋण, आर्थिक अनुदान व कर छूट को भी सम्मिलित किया जा सकता हैं।

वैसे देखा जाये तो सुदृढ़ीकरण की भी अपनी सीमायें हैं और उसके बाद यह काम तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण व आर्थिक दृष्टिकोण से अव्यवहारिक होने लगता हैं। फिर जब काम कीमत में नयी संरचना बन जाये तो ऐसे में सुदृढ़ीकरण का कोई औचित्य रह भी नहीं जाता हैं। ऐसा तो केवल सांस्कृतिक, धार्मिक या ऐतिहासिक महत्व की संरचनाओं के लिये ही किया जा सकता हैं। सुदृढ़ीकरण के अव्यवहारिक होने की स्थिति में संरचनाओं के पुनर्निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिये विशेष योजनाये बनायीं जा सकती हैं।

सार्वजनिक स्थानों में सुरक्षा

भूकम्प की स्थिति में प्रभावितो की संख्या का निर्धारण उस समय भूकम्प से क्षतिग्रस्त संरचना में उपस्थित व्यक्तियों की संख्या के द्वारा होता हैं; भूकम्प के समय प्रभावित संरचना में जितने ज्यादा व्यक्ति होंगे, प्रभावितो की संख्या भी उतनी ही ज्यादा होगी। एक साथ और एक ही जगह पर बड़ी संख्या में लोगो के घायल या हताहत होने से समाज पर अत्यधिक प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता हैं और इससे उबरने में काफी लम्बा समय भी लग सकता हैं।

अतः ऐसी संरचनाओं की भूकम्प सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता हैं जहाँ पर सामान्यतः भीड़-भाड़ रहती हैं, जैसे कि थिएटर, मॉल, अस्पताल, स्कूल, सरकारी दफ्तर, होटल व रेस्टोरेंट।

भूकम्प सुरक्षा सम्बन्धित सुरक्षा मानकों के अनुपालन को इन सभी प्रतिष्ठानों के संचालन की मूलभूत शर्त बना कर इन स्थानों में उनस्थित व्यक्तियों की भूकम्प सुरक्षा सहज ही सुनिश्चित की जा सकती हैं।

आपदा बीमा

इतना सब कर लेने के बाद भी भूकम्प आयेगा और एक सीमा के बाद उससे नुकसान भी होगा। ऐसे में भूकम्प के बाद उसके प्रभावों से उबरने और अर्थव्यवस्था को तेजी से पटरी में लाने के बारे में भी सोचना जरूरी हैं। इसके लिये जरूरी है कि आपदा बीमा को प्रोत्साहित किया जाये और सच मानिये यह बहुत सस्ता हैं।

भवनों के लिये आपदा बीमा की दर मात्र रू. 0.315 प्रति रू. 1000 प्रति वर्ष जो हैं।

मतलब साफ़ है कि केवल रू. 3150 का निवेश कर के आप साल भर के लिये अपने घर का आपदाओं के लिये रू. 1.0 करोड़ का बीमा करवा सकते है और वो भी 12 प्रतिकूल स्थितियों के लिये  जैसे कि (i) आग या Fire, (ii) बज्रपात या Lightning, (iii) अचानक ध्वस्त होना या Implosion, (iv) विस्फोट या Explosion, (v) भूकम्प या Earthquake, (vi) आंधी या Storm, (vii) तूफ़ान या Tempest, (viii) बाढ़ या Flood, (ix) जल भराव या Inundation, (x) प्रक्षेपास्त्र परीक्षण या Missile test operations, (xi) जंगल की आग या Bushfire तथा (xii) पानी की टंकी का फटना या Bursting of overhead tank.

अब इतने के बाद तो आपको घर का बीमा करवा ही लेना चाहिये। उन्हें तो जरूरी ही जो बहुमंजिला इमारतों में रहते हैं।

अब यदि आप पास-पड़ोस में हो रही चोरी-चकारी की चिन्ता से भी निजात चाहते हो तो रू. 0.3 प्रति रू. 1000 प्रति वर्ष की दर पर अपने घर का सेंधमारी या Burglary का बीमा भी करवा सकते हो। मतलब रू. 3000 के निवेश पर घर का रू. 1.0 करोड़ का सामान एक साल के लिये सुरक्षित।

वैसे देखा जाये तो बीमा एक महत्वपूर्ण जोखिम हस्तान्तरण उपकरण हैं और कई देशो में इसे आपदा न्यूनीकरण उपाय के रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा हैं। हमारे देश में भी सरकार चिन्हित वर्ग के परिवारों को स्वास्थ्य व फसल बीमा सुविधा का लाभ दे ही रही हैं। साथ ही परिवहन क्षेत्र में भी टिकट के सापेक्ष यात्रियों को बीमा लाभ से आच्छादित किया ही जाता हैं।

ऐसे में अगर सरकार चाहे तो वाहनों के बीमा की तरह ही घरो व अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिये

Earthquake early warning – An illusion

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–by Piyoosh Rautela Nov 20, 2022–

After a series of earthquakes in the recent past in western Nepal and Pithoragarh, the earthquake early warning (EEW) system operated in Uttarakhand has been the focus of most seismic safety related debates.

Obsessed with the glitter and fancy of early warning most disaster risk reduction (DRR) enthusiasts often tend to consider it the ultimate goal to be realised, and fail to appreciate that it is only the tip of the iceberg in realisation of an  earthquake resilient community.

This results in gross neglect of the main constituents of seismic safety that include:

(i) Seismic safety of new construction through stern implementation and volunnrty compliance of construction norms.

(ii) Mass awareness for voluntary compliance and household safety.

(iii)  Land use restrictions for regulating construction in the proximity of active faults and in areas likely to witness liquefaction.

(iv) Seismic safety of places routinely witnessing mass congregation interlacing compliance of safety norms with their operating permission norms.

(v) Seismic safety of existing built environment by promoting retrofitting and reconstruction.

(vi) Risk transfer for prompt and effective post-earthquake recovery.

It needs to be realised that EEW is going to be effective only after compliance is ensured on the above points.

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