दूसरे दिन भी रंग नहीं जम पाया ऐतिहासिक गौचर मेले में

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-गौचर से दिग्पाल गुसांईं-

जनपद चमोली के गौचर मैदान में 14 नवंबर से सात दिनों तक चलने वाले एक मात्र ऐतिहासिक राजकीय गौचर औद्योगिक विकास एवं सांस्कृतिक मेले में दूसरे दिन भी रंग नहीं जम पाया है।

सन् 1943 से शुरू हुए गौचर मेले में दूर दराज क्षेत्र के लोग तमाम घर गृहस्थी के कार्यों से निवृत्त होकर फुर्सत के छणों में गौचर मेला देखने के साथ ही जमकर खरीदारी भी करते थे। मेले में हर साल उच्च कोटि के खेल तमाशों का आंनद लेने से कोई वंचित न रह जाए इस लिए शुरुआती दिनों से ही लोगों की भीड़ मेले पर चार चांद लगा देते थे।

इस बार मेले के उद्घाटन अवसर पर भी लोगों ने खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है। गत वर्ष शुरू दिन से पुलिस को भीड़ काबू करने में पसीना छुड़ाना पड़ा था। मेले में आकर्षण बढ़े इसके लिए तोरणद्वारों के साथ ही मुख्य द्वार को विशेष रूप से सजाया जाता था। इस बार इसमें भी खानापूर्ति की गई है। सांस्कृतिक मंच को भारी विरोध के बाद भी गत वर्ष की तर्ज़ पर बनाया गया। जिसे लोग सुरक्षा की दृष्टि से कतई ठीक नहीं मान रहे हैं।

मेले में साउंड सिस्टम भी घटिया बताया जा रहा है। मंच में दर्शको के बैठने के लिए खुर्शियों की संख्या तो बढ़ाई गई है लेकिन सिर छुपाने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। खेल तमाशे भी घिसे पिटे किस्म के लगाए गए हैं। इस बार कारण जो भी रहा हो प्रदर्शनी कक्ष कई खाली पड़े हुए हैं।

व्यापार संघ अध्यक्ष राकेश लिंगवाल , कांग्रेस नगर अध्यक्ष सुनील पंवार आदि का कहना है। मेले की व्यवस्थाओं में खाना पूर्ति की गई है। मेले को हाशिए पर धकेलने का काम किया गया है। इन लोगों का कहना है कि मेले आयोजन की बैठकों में जो मुद्दे उठाए गए थे उन पर कहीं से भी अमल नहीं किया गया है। चिन्हित पार्किंग स्थलों को कभी तक अतिक्रमण मुक्त नहीं किया गया है। मेला समिति का यही रवैया रहा तो यह मेला पूरी तरह से हाशिए पर चले जाएगा।

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